राज्यों के लिए संवैधानिक अधिकारों और दायित्वों की सूची
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अंतरराष्ट्रीय उद्देश्य वाली यह संवैधानिक शोध-परियोजना फ्रांस में एक महत्वाकांक्षी सातवें गणराज्य को प्रेरित करने के लिए जन्मी है। फिर भी इसमें किसी पश्चिमी अहंकार या पाखंड का भाव नहीं है। साइप्रस और बोलिविया जैसी विविध जड़ों से पोषित एक साधारण नागरिक के रूप में मैं अपने देश की स्वयं को पुनः आविष्कृत करने की अक्षमता देखता हूँ, जो एक अप्रचलित राजनीतिक ढाँचे में जकड़ा है। यह विश्व की संस्कृतियों और मिथकों के प्रति विनम्र और सीमाहीन अवलोकन का परिणाम है—विश्व की बुद्धिमत्ताओं से प्रेरणा लेने के साथ आत्मनिरीक्षण करना, सामान्य समझ की ओर लौटना और अन्य संस्कृतियों के सार को ग्रहण करना। Georges Koussouros
I. महान विभाजन: राज्य-पादरित्व से चिंतनशील समाज तक
राज्य की लूथरवादी क्रांति
हम उस राज्य की अवधारणा के अंत की घोषणा करते हैं जिसे हमारे ऊपर स्थित पिता के रूप में देखा जाता है। यह न पारंपरिक लोकतंत्र है, न राज्य-विहीन लोकतंत्र: यह चिंतनशील समाज का आगमन है। सामाजिक शरीर की सेवा में एक तंत्रिका-तंत्र, जहाँ विधि-अभियांत्रिकी घोषणात्मक लोकतंत्र का स्थान लेती है ताकि अंततः प्रत्येक व्यक्ति का समय और स्पष्टता मुक्त हो सके।
1. मूर्तिपूजा का नया युग
आदिकाल से मानवता ने अपनी अस्तित्वगत चिंता को दूर करने के लिए अपनी संप्रभुता ऊर्ध्वाधर शक्तियों को सौंपने का प्रयास किया है। पहले देवताओं को, फिर राजाओं को, पुरोहितों को और अंततः राज्य को। हर बार वही विषाक्त समझौता दोहराया गया: काल्पनिक सुरक्षा के बदले लोगों ने सोचने की स्वतंत्रता छोड़ दी। आधुनिक राज्य इस मूर्तिपूजा का नवीनतम रूप मात्र है। उसने चर्च का स्थान ले लिया है।
2. राज्य, नया पादरित्व
आज राजनेता हमारे महापुरोहित हैं। उनका सिद्धांत आर्थिक वृद्धि है। उनकी क्षमापत्र चुनावी वादे हैं। उनका नरक सामाजिक अराजकता है। मध्ययुगीन चर्च की तरह राज्य भय से शासन करता है—बेरोजगारी का भय, असुरक्षा का भय, भविष्य का भय। और अतीत की तरह इस भय का विनिमय हमारी अधीनता से किया जाता है। राज्य एक धर्मनिरपेक्ष पादरित्व बन गया है, जो मध्ययुगीन क्षमापत्रों जितना ही काल्पनिक चुनावी उद्धार बेचता है।
3. आवश्यक विभाजन: राज्य और जनता को अलग करना
पाँच शताब्दी पहले लूथर ने बाइबिल को पादरियों के हाथों से लेकर जनता को लौटाया। उसने दैवी व्याख्या के एकाधिकार को तोड़ा। आज सातवाँ गणराज्य वही कार्य करता है: वह राज्य और जनता को अलग करता है। अब हमारी जगह निर्णय लेने वाला पिता-राज्य नहीं, चिंता के माध्यम से हेरफेर नहीं, और प्रकाशित सत्य की तरह थोपा गया आर्थिक सिद्धांत नहीं।
4. गणितीय सत्य और चिंतनशील समाज
लूथर ने अंधविश्वास का स्थान धर्मग्रंथों के आलोचनात्मक अध्ययन से लिया। हम घोषणात्मक लोकतंत्र का स्थान विधि-अभियांत्रिकी से लेते हैं: गणितीय कानून, प्रमाणित सत्य और मुक्त समय, ताकि प्रत्येक व्यक्ति केवल सहने के बजाय अंततः विचार कर सके। सातवाँ गणराज्य ऐसा समाज स्थापित करता है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति के पास अपने जीवन और अपने नगर के अर्थ पर प्रश्न करने के लिए समय, उपकरण और स्पष्टता हो।
II. संवैधानिक विकास
चौथी पीढ़ी: तिर्यक विधि
अब तक समाज ऊर्ध्वाधर या क्षैतिज मॉडलों के अनुसार संगठित हुए हैं। आधुनिक विश्व की जटिलता के सामने ये संरचनाएँ विफल रही हैं। सातवाँ गणराज्य तिर्यक प्रतिमान स्थापित करता है।
सूचना का अंतःसंचार: पुराने विश्व में सार्वजनिक निर्णय अलग-अलग खाँचों में बंद था। तिर्यकता इन बौद्धिक सीमाओं को नष्ट करती है: प्रत्येक सूचना सभी क्षेत्रों में उपयोगी हो सकती है और होनी चाहिए।
मानवीय साइलो का अंत: तिर्यकता सामाजिक सामंजस्य की क्रांति से जन्म लेती है। साइलो-आधारित कार्यप्रणाली समाप्त की जाती है। कानून कठोर प्रोटोकॉल से मुक्त होता है।
सारांश: तिर्यक संविधान अब किसी अंधे शिखर से व्यवस्था नहीं थोपता। सूचना की बाधाओं और प्रोटोकॉलगत पदों को समाप्त करके वह राष्ट्र को एक वैश्विक मस्तिष्कीय चयापचय में बदल देता है।
1. पहली पीढ़ी: नीचे से ऊपर की ऊर्ध्वाधरता
जिस समस्या को इसे हल करना था: सत्ता का दुरुपयोग। क्रिया: रक्षा करना। 18वीं शताब्दी में संविधान केवल वह लाल रेखा खींचने का साधन था जिसे राज्य को पार करने का अधिकार नहीं था।
2. दूसरी पीढ़ी: ऊपर से नीचे की ऊर्ध्वाधरता
जिस समस्या को इसे हल करना था: जनसंख्या की गरीबी और अस्तित्व। क्रिया: सहायता करना। 1946 के बाद संविधान संपदा के नियमन का एक उपकरण बन गया।
3. तीसरी पीढ़ी: क्षैतिजता
जिस समस्या को इसे हल करना था: ग्रह का विनाश और युद्ध। क्रिया: सहयोग करना। 1970 के दशक से संविधान आपसी सद्भाव की संधि बन जाता है।
III. सारांश: 7 संवैधानिक स्तर
राज्य की संरचना भौतिक अस्तित्व से लेकर अस्तित्वगत पूर्णता तक 7 विकासशील आयामों के इर्द-गिर्द संगठित है।
दाईं ओर खिसकाएँ ➔
संवैधानिक क्षेत्र
I. भौतिक स्तर 1 से 2
II. प्रणालीगत स्तर 3 से 4
III. संज्ञानात्मक स्तर 5 से 7
हस्तक्षेप की ज्यामिति, स्थान
बिंदु: एकात्मक हस्तक्षेप, अधिकतम सरलीकरण।
क्षैतिज: अंतःक्रिया, नेटवर्क, प्रवाहशीलता।
ऊर्ध्वाधर: गहराई, उन्नयन, अर्थ।
साइबरनेटिक लक्ष्य, कौन
भौतिक व्यक्ति: पृथक आवश्यकताएँ।
समाज: प्रवाह और सामूहिक लॉजिस्टिक्स।
अस्तित्वमीमांसक व्यक्ति: मानस, मनुष्य का कारण।
समय-पैमाना, गति
आपातकाल: तत्काल प्रतिक्रिया।
मध्यम अवधि: प्रवृत्ति और जोखिम।
दीर्घ अवधि: अस्तित्वगत प्रश्न।
लागू साइबरनेटिक नियम
प्रत्यक्ष कारणता: अभाव की पूर्ति।
यांत्रिक कारणता: अवरोधों को प्रवाही बनाना।
गहन कारणता: मूल मुक्ति।
स्तर 1: अस्तित्व
समाज-राज्य की भौतिक और जीवनाधार नींव
अनुच्छेद100 एक नए गणराज्य के निर्माण का
गणराज्य स्वयं को एक सतत लोकतांत्रिक निर्माण के रूप में स्थापित करता है, जिसका उद्देश्य नागरिकों की स्वतंत्रता, उत्तरदायित्व, बुद्धिमत्ता और सामूहिक क्षमता को बढ़ाना है।
राज्य का दायित्व है कि वह अपने समय के तकनीकी, वैज्ञानिक और विचार-विमर्श संबंधी साधनों पर आधारित होकर सामूहिक बुद्धिमत्ता को स्पष्ट करे, संचित करे और कार्यशील बनाए, ताकि प्रत्येक व्यक्ति कानूनों और उनके परिणामों को समझ सके।
I. संवैधानिक बाध्यता के रूप में सद्भावना की संरचना
प्रबुद्ध सामाजिक अनुबंध पूर्णतः संस्थागत सद्भावना के सिद्धांत पर आधारित है। प्रत्येक सार्वजनिक जनादेश और कानून-निर्माण इस सद्भावना के निरंतर प्रदर्शन के अधीन है, जो बीस मूलभूत प्रयासों में व्यक्त होती है और सार्वजनिक शक्ति के लिए साधन-संबंधी दायित्व बनाती है:
प्रबुद्ध सहमति (प्रकाश) सुनिश्चित करने के लिए: सत्यनिष्ठा (पूर्ण सूचना का प्रयास), पारदर्शिता (स्पष्टता का प्रयास), सहयोग (ज्ञान साझा करने का प्रयास), और ईमानदारी (न्यायपूर्ण विनिमय का प्रयास)।
ज्ञान को कार्यशील बनाने (कार्रवाई) के लिए: क्षमता (कार्य-सिद्धि का प्रयास), स्वैच्छिक सक्रियता (सदिच्छा का प्रयास), उत्तरदायित्व (परिश्रम का प्रयास), अनुकूलनशीलता (अनिश्चितताओं के सामने प्रयास) और पूर्वानुमेयता (विश्वसनीयता का प्रयास)।
अनुबंध की अखंडता (विश्वास) स्थापित करने के लिए: निष्ठा (वचन और कर्म की संगति का प्रयास), अखंडता (नैतिक सीधापन का प्रयास), सदाचार (नैतिक आचरण का प्रयास), और साहस (प्रतिबद्धता का प्रयास)।
सामूहिक बुद्धिमत्ता (सामंजस्य) की रक्षा के लिए: युक्तिसंगतता (सूचित संतुलन का प्रयास), निष्पक्षता (न्यायपूर्ण व्यवहार का प्रयास), चेतना (भावार्थ को समझने का प्रयास), सम्मान (समन्वय का प्रयास), सद्भावना (संरक्षण का प्रयास), एकजुटतावाद (जोखिमों को साझा करने का प्रयास) और सहिष्णुता (भिन्नताओं को समझने का प्रयास)।
II. सद्भावना-वृक्ष का निरंतर मूल्यांकन
सामान्य हित के कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों और सामूहिक बुद्धिमत्ता मंचों का संवैधानिक उद्देश्य अनुच्छेद 2 में सूचीबद्ध प्रयासों की पूर्ति को मापना, ऑडिट करना और बोधगम्य बनाना है।
निरंतर नागरिक और तकनीकी मूल्यांकन से प्रकट इन प्रयासों की बार-बार या स्पष्ट अवहेलना सद्भावना का टूटना मानी जाती है और संबंधित सार्वजनिक प्राधिकरण या कानून को दी गई सहमति को निष्प्रभावी कर देती है।
अनुच्छेद5 मानवीय संबंध के अधिकार के बारे में
मानवीय संबंध का अधिकार एक मौलिक अधिकार है, जो सामाजिक जीवन को निरंतर आदान-प्रदान का अवसर बनाकर अलगाव से लड़ने की मांग करता है.
I. प्रतिबद्धता
गणराज्य यह सुनिश्चित करता है कि सार्वजनिक और निजी स्थान तथा आवागमन नेटवर्क लोगों के बीच स्वाभाविक मुलाकातों को बढ़ाने के लिए विकसित और संरक्षित किए जाएँ।
II. प्रवाह की गतिशीलता
कानून आवागमन नेटवर्क के विनाश को रोकता है और सामाजिक संपर्क के लिए आवश्यक गतिविधियों को सुनिश्चित करने हेतु पूरे क्षेत्र में उनके विकास की मांग करता है।
III. स्थानों की व्यवस्था
समाज की व्यवस्था व्यक्तियों को अलग करने वाले मॉडल को अस्वीकार करती है ताकि प्रत्येक साझा स्थान विविध मानवीय संबंधों को स्वाभाविक रूप से प्रोत्साहित करे।
अनुच्छेद1 संवेदी साझा हित और प्राकृतिक स्वास्थ्य
गणराज्य प्राकृतिक स्वास्थ्य को मनुष्य और अविकृत जीवनदायी परिवेशों के बीच सामंजस्यपूर्ण और निरंतर संबंध का परिणाम मानता है।
I. जीवनदायी साझा हित के अविच्छेद्य घटक
श्वसन योग्य वायुमंडल, ध्वनिक संतुलन, जीवंत जल और पोषक मिट्टी राष्ट्र की जीवनदायी आधारशिला हैं। उपयोग या संपत्ति का कोई भी अधिकार इन साझा संपदाओं की अखंडता को क्षति पहुँचाते हुए प्रयोग नहीं किया जा सकता। व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं का प्रयोग दूसरों के अस्तित्व की जैविक परिस्थितियों को दूषित न करने के मूल कर्तव्य से अविभाज्य है।
II. उपचारात्मक उपायों पर मूलभूत रोकथाम की प्राथमिकता
राजनीतिक कार्रवाई ऐसी दीर्घकालिक प्रदूषण या हानियों की स्वीकृति को निषिद्ध करती है जिनकी भरपाई चिकित्सा या वित्तीय उपायों से की जाती हो। राज्य का दायित्व है कि वह हानि उत्पन्न होने से रोकने वाली पर्यावरणीय परिस्थितियों को पुनर्स्थापित करे; नियामक दुर्बलता या जानबूझकर की गई लापरवाही से जीवन-परिवेश के क्षरण को सहन करने वाले सार्वजनिक निर्णयकर्ताओं और निजी पक्षों की जिम्मेदारी निर्धारित होती है।
अनुच्छेद2 स्वस्थ वायु में साँस लेने के अधिकार का
राष्ट्र प्रत्येक व्यक्ति को ऐसी वायु में साँस लेने का मूल अधिकार सुनिश्चित करता है जो शारीरिक स्वास्थ्य, विश्राम और संज्ञानात्मक स्पष्टता के लिए हानिकारक किसी भी रासायनिक, कणीय, जैविक या गंध-संबंधी विकृति से मुक्त हो।
जैविक रूप से स्वस्थ वायुमंडल तक पहुँच गणतांत्रिक साझा विरासत का अविच्छेद्य घटक है और निजी उपयोग की स्वतंत्रता तथा वाणिज्यिक हितों पर बिना प्रतिबंध प्राथमिकता रखती है।
I. बाह्य उत्सर्जन न करने का दायित्व और स्रोत की प्राथमिकता
कोई भी व्यक्ति अपने स्थान या गतिविधि का ऐसा उपयोग नहीं कर सकता जिससे हानिकारक उत्सर्जन, धुआँ, वाष्प या कण उसकी विशिष्ट सीमा से बाहर फैलें। राज्य और स्थानीय प्राधिकरणों का दायित्व है कि वे विषैले प्रवाह को उसके स्रोत पर ही प्रतिबंधित, नियंत्रित और समाप्त करें। नियोजन और सार्वजनिक स्वच्छता के नियम पूरे आबाद क्षेत्र में निरंतर शुद्ध वायु बनाए रखने की माँग करते हैं।
II. साझा श्वसन और गंध-संबंधी हानियों का कठोर दमन
राज्य पड़ोस पर वायुजनित हानियाँ फैलाने वाले किसी भी व्यवहार को दंडित करने के लिए अत्यंत कठोर कानूनी ढाँचा स्थापित करता है। लापरवाही, संचालन या औद्योगिक और वाणिज्यिक प्रक्रियाओं से उत्पन्न स्थायी, दुर्गंधयुक्त या उत्तेजक गंधों का प्रसार दूसरों की अखंडता पर भौतिक आघात माना जाता है। कानून सरल त्वरित प्रक्रियाएँ, तत्काल रोक के आदेश और उत्सर्जक के विशेष भार पर दैनिक वित्तीय दंड उपलब्ध कराता है।
III. जीवनदायी वायुमंडल और लाभकारी सुगंधित परिवेश
सार्वजनिक कार्रवाई शुद्धिकारी वनस्पतियों और प्राकृतिक श्वसन क्षेत्रों के समावेशन द्वारा वायुमंडलीय पुनर्जीवन को सक्रिय रूप से बढ़ावा देती है और सामूहिक तंत्रिका तंत्र पर स्वस्थ प्राकृतिक तत्वों के नियामक और शांतिदायक प्रभावों को मान्यता देती है।
अनुच्छेद3 ध्वनिक शांति का
प्रत्येक मनुष्य को ऐसे संरक्षित ध्वनिक परिवेश में जीने, सोने और बौद्धिक चिंतन करने का अविच्छेद्य अधिकार है जो तंत्रिका-विश्राम और मनोवैज्ञानिक संतुलन के अनुकूल हो।
I. व्यक्तिपरक ध्वनि-हानि की अवधारणा और केवल कच्चे मापन का त्याग
ध्वनिक व्यवधानों का आकलन केवल भौतिक डेसीबल सीमा पर आधारित नहीं होगा; उसमें ध्वनि की व्यक्तिपरक प्रकृति, यांत्रिक आक्रामकता, विसंगति, आवृत्ति और अप्रत्याशितता भी सम्मिलित होगी। समान मापी गई तीव्रता पर मानसिक शांति को प्रभावित करने वाला कोई भी कृत्रिम या झटकेदार शोर दंडनीय आघात माना जाएगा।
II. पुनर्स्थापक नींद की पूर्ण सुरक्षा
रात्रिकालीन विश्राम सार्वजनिक व्यवस्था द्वारा संरक्षित एक जैविक अभयारण्य है। सामूहिक विश्राम के लिए निर्धारित घंटों में अनावश्यक शोर, गैर-आवश्यक यांत्रिक गतिविधियाँ या अनुचित व्यवधान निषिद्ध हैं और अत्यंत कठोरता से दंडित किए जाते हैं, क्योंकि वे सीधे सार्वजनिक स्वास्थ्य, प्रतिरक्षा और राष्ट्रीय शांति को प्रभावित करते हैं।
III. संयम का कर्तव्य और पड़ोसी व्यवधानों का निराकरण
दूसरों का स्थान शोर निकालने का माध्यम नहीं बन सकता। कानून निर्माताओं पर आघातजनित और वायुजनित शोर से इन्सुलेशन के परिणाम की बाध्यता तथा निवासियों पर कठोर संयम का कर्तव्य लगाता है। असावधान शोरपूर्ण व्यवहार की निरंतरता या पड़ोस की चेतावनियों की उपेक्षा करने वालों को हानिकारक उपकरणों की जब्ती, दंडात्मक भुगतान के अधीन सुधार और निवारक नागरिक व आपराधिक दंड का सामना करना पड़ सकता है।
IV. जीवंत और मधुर ध्वनि-परिदृश्य का अधिकार
राष्ट्र प्राकृतिक और सामंजस्यपूर्ण ध्वनि-परिदृश्यों के विकास को प्रोत्साहित करता है। नगर नियोजन मौन को एक दुर्लभ संसाधन के रूप में सम्मिलित करता है और वनस्पति, बहते जल तथा स्थानीय जीव-जंतुओं की उपस्थिति का आयोजन करता है ताकि शांति और रचनात्मक एकाग्रता के अनुकूल ध्वनिक वातावरण पुनर्स्थापित हो।
अनुच्छेद186 पोषण का
राष्ट्र प्रत्येक व्यक्ति को ऐसा पोषण उपलब्ध कराने की गारंटी देता है जो पूर्ण शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और संज्ञानात्मक संतुलन सुनिश्चित करे, तथा व्यवहार, मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत व सामूहिक कल्याण में भोजन की जैविक गुणवत्ता की निर्णायक भूमिका को मान्यता देता है।
पोषण मूल्य का संरक्षण और अनुकूलन सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति का केंद्रीय उद्देश्य है।
मूल्य-श्रृंखला की समग्र दृष्टि
राज्य की कार्रवाई संपूर्ण खाद्य चक्र को अविभाज्य रूप से समाहित करती है। कानून ऐसे सिद्धांत निर्धारित करता है जो आयात और स्थानीय कृषि पद्धतियों से लेकर आपूर्ति-व्यवस्था, प्रसंस्करण और अंतिम उपभोग तक श्रृंखला के प्रत्येक चरण में जैव-रासायनिक और पोषण गुणों के सर्वोत्तम संरक्षण को सुनिश्चित करें।
संवेदी और जैविक अखंडता का मानदंड
पोषण नीति भोजन की जैविक समृद्धि, स्वाद और सौंदर्यात्मक गरिमा के संयोजन को सुनिश्चित करती है, जिन्हें शारीरिक आत्मसात और मानव विकास से अविभाज्य माना जाता है।
अनुच्छेद164 स्वतंत्रताओं के विज्ञान और अभियांत्रिकी को विनियमन की पद्धति के रूप में
संस्थाओं के आदर्श-वाक्य में अंकित स्वतंत्रता का अर्थ प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता विकसित करने, प्रयोग करने और साझा प्रगति में योगदान देने की प्रभावी और सुनिश्चित शक्ति है।
हर सार्वजनिक, न्यायिक या प्रशासनिक प्राधिकरण कानून को पहल, सृजन और स्वायत्तता के पक्ष में व्यवस्थित पूर्वधारणा के अनुसार लागू और व्याख्यायित करता है।
प्रतिबंध किसी भी स्थिति में सार्वजनिक मामलों के प्रबंधन का सामान्य तरीका नहीं हो सकता।
I. स्वतंत्रताओं के विज्ञान और गैर-दमनकारी विनियमन पर अनुसंधान
राज्य स्वतंत्रताओं के विज्ञान को सार्वजनिक कार्रवाई की एक मूलभूत विधा के रूप में मान्यता देता और विकसित करता है। इसका उद्देश्य ऐसे प्रोत्साहक, सक्षमता-वर्धक और स्व-संगठित तंत्रों का अध्ययन, निर्माण और मूल्यांकन है जिनसे दमन का सहारा लिए बिना सामान्य हित के लक्ष्य प्राप्त किए जा सकें। सार्वजनिक नीतियाँ ऊर्जा को मुक्त करने, प्रारंभिक विश्वास तथा व्यक्तिगत और सामूहिक उत्तरदायित्व पर आधारित मॉडलिंग से निर्मित की जाती हैं।
II. मुक्ति के साधनों द्वारा विकल्प-निर्णय की बाध्यता
किसी भी सुधारात्मक या विनियामक उपाय को अपनाने से पहले विधायिका और कार्यपालिका नई स्वतंत्रताएँ देने, एकाधिकार हटाने या पारदर्शिता के नियम स्पष्ट करने पर आधारित समाधानों की रचना और परीक्षण करने के लिए बाध्य हैं। प्रतिबंधात्मक उपाय तभी स्वीकार्य है जब यह स्पष्ट रूप से सिद्ध हो कि मुक्ति के साधन प्रस्तुत समस्या का समाधान करने में सक्षम नहीं हैं।
III. पहल की संस्कृति के प्रशिक्षण और प्रसार का
सभी संस्थाएँ, प्रशासन और सार्वजनिक निकाय अपने अधिकारियों और कर्मचारियों को स्वतंत्रता के माध्यम से विनियमन की विधियों में प्रशिक्षित करते हैं। सार्वजनिक शासन स्थानीय प्रयोग, निरंतर अनुकूलन और नागरिकों तथा संगठनों की कार्रवाई में बाधा डालने वाली प्रशासनिक रुकावटों के क्रमिक उन्मूलन को महत्व देता है।
अनुच्छेद175 संरचनात्मक हिंसा का
प्रत्येक व्यक्ति को प्रत्यक्ष आक्रमण या संरचनात्मक हिंसा से उत्पन्न किसी भी प्रकार के आघात के विरुद्ध अपनी शारीरिक, मानसिक, भौतिक और पर्यावरणीय अखंडता के संरक्षण का मौलिक अधिकार है।
संरचनात्मक हिंसा से आशय ऐसी किसी भी संस्थागत, वित्तीय, प्रशासनिक या पारिस्थितिक प्रक्रिया से है जो जानबूझकर की गई कार्रवाई, स्पष्ट लापरवाही या शक्ति-संबंधों के दुरुपयोगपूर्ण संगठन द्वारा किसी समुदाय या व्यक्तियों की जीवन-स्थितियों, स्वास्थ्य या गरिमा में सिद्ध गिरावट उत्पन्न करे।
I. संरचनात्मक आघातों का वर्गीकरण
जैविक कानून संरचनात्मक हिंसा को चार मूल श्रेणियों के अनुसार परिभाषित और दंडित करता है:
प्रशासनिक आघात: दुरुपयोगपूर्ण प्रक्रियाओं, अधिकारों से इनकार या आवश्यक सेवाओं से पीछे हटने का जानबूझकर उपयोग, जिसके परिणामस्वरूप प्रशासित व्यक्तियों को गंभीर शारीरिक या नैतिक संकट में डाल दिया जाए।
पारिस्थितिक और स्वास्थ्य संबंधी आघात: प्रदूषणकारी या दोहनकारी गतिविधियों को जारी रखना, अनुमति देना या छिपाना, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य या पारिस्थितिक तंत्रों के जीवनदायी संतुलन को क्षति पहुँचे।
वित्तीय और शिकारी आघात: जीवनोपयोगी संसाधनों का सट्टात्मक अधिग्रहण, अनुचित आर्थिक बाध्यताओं का आरोपण या साझा और व्यक्तिगत संपत्तियों की संगठित लूट।
सामाजिक अधीनता द्वारा आघात: ऐसे कार्य और उत्पादन मॉडलों का संगठन या सहनशीलता जो श्रमिकों की गरिमा और मूलभूत सुरक्षा को क्षति पहुँचाएँ।
II. आरोपणीयता और उत्तरदायित्व
कोई व्यक्ति इस आधार पर जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता कि क्षति सामूहिक निर्णय, सेवा-प्रतिनिधान या किसी संगठन के विधिक व्यक्तित्व से उत्पन्न हुई। सार्वजनिक, अर्ध-सार्वजनिक या निजी संस्थाओं के वे नेता जिनकी रणनीतिक दिशाएँ जानबूझकर या स्पष्ट कमी के कारण संरचनात्मक हिंसा उत्पन्न करती हैं, नागरिक और आपराधिक जिम्मेदारी वहन करते हैं। राज्य और उसके अंग प्रशासनिक और संस्थागत हिंसा से हुई क्षति की पूर्ण भरपाई के संयुक्त गारंटर हैं।
III. दंड और नियंत्रण न्यायालय
संरचनात्मक हिंसा की पहचान, रोक और दंड के लिए एक उच्च न्यायालय स्थापित किया जाता है। कर्ताओं और निर्णयकर्ताओं के नागरिक अधिकारों तथा पेशेवर अभ्यास से वंचित करने वाले दंडों के अतिरिक्त यह न्यायालय निम्न आदेश दे सकता है:
संरचनात्मक हिंसा के स्रोत किसी भी मानक, अनुबंध या प्रशासनिक निर्णय की तत्काल शून्यता।
शिकारी गतिविधियों या गंभीर लापरवाही से निर्मित वित्तीय संपत्तियों की संरक्षणात्मक जब्ती और अधिग्रहण।
विफल संस्थागत या औद्योगिक प्रक्रियाओं के पुनर्गठन का दंड-सहित आदेश।
अनुच्छेद156 नागरिक विवेक का
लोक-संप्रभुता नागरिकों के विवेक और निरंतर शिक्षा पर आधारित है; केवल आवेग या सूचना की अपारदर्शिता पर आधारित किसी भी तंत्र को इससे बाहर रखा जाता है।
सार्वजनिक संस्थाओं से उत्पन्न प्रत्येक सुधार परियोजना तथा चुनावी परामर्शों के दौरान उम्मीदवारों या राजनीतिक संगठनों द्वारा प्रस्तुत प्रत्येक कार्यक्रम को सुलभ, सहज और सत्यापन योग्य रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
I. स्पष्टता की यह बाध्यता उद्देश्यों और उनके पद्धतिगत आधारों, अनुमानित वित्तीय, संगठनात्मक और पर्यावरणीय प्रभावों, तथा व्यवहार्यता की सीमाओं और प्रणालीगत बाह्य प्रभावों को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करने की माँग करती है।
II. किसी भी नागरिक या संसदीय विचार-विमर्श को तब तक वैध नहीं माना जा सकता जब तक विरोधी दृष्टिकोण वाली सूचना और अध्ययन के लिए पर्याप्त समय पहले से उपलब्ध न कराया गया हो।
III. कार्यान्वयन संबंधी प्रावधान संज्ञानात्मक पठनीयता के मानक, स्वतंत्र मूल्यांकन के प्रोटोकॉल और परियोजनाओं की स्वीकार्यता के नियम निर्धारित करते हैं।
अनुच्छेद137 भौतिक प्रत्यास्थता और स्वायत्तता का
तकनीकी या वित्तीय कमजोरियों की वृद्धि के सामने केवल आय-वितरण द्वारा सुरक्षा अपनी सीमाएँ दिखाती है। जनसंख्या की सुरक्षा के लिए अब वित्तीय साधनों की गारंटी को नागरिकों की भौतिक प्रतिरोधक क्षमता के प्रत्यक्ष और संरचनात्मक सुदृढ़ीकरण से पूरित करना आवश्यक है।
राज्य भौतिक प्रत्यास्थता के सिद्धांत को आय के पूरक राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार के रूप में मान्यता देता है और आर्थिक कमजोरियों तथा वैश्विक अस्थिरताओं के सामने नागरिक स्वायत्तता को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है।
I. राष्ट्र का संरक्षणकारी दायित्व ऐसे सार्वजनिक निवेश तंत्र विकसित करने की बाध्यता को सम्मिलित करता है जो व्यक्तियों को प्राथमिक आवश्यकताओं, आवास और ऊर्जा पर अपनी निर्भरता संरचनात्मक रूप से घटाने दें।
II. इस अधिकार को और विस्तारित करने के लिए राज्य आवश्यक भौतिक साधन और सार्वजनिक अवसंरचनाएँ निर्मित और व्यवस्थित करता है। साझा स्थान, परिवहन नेटवर्क और सामूहिक सुविधाएँ व्यक्तियों की रसद और भौतिक स्वतंत्रता को सहारा देने और सुगम बनाने के लिए संरचनात्मक रूप से अनुकूलित होनी चाहिए।
III. राज्य अपने आंतरिक प्रक्रियाओं को अनुकूलित करने और इस स्वायत्तता के निर्माण हेतु अपने कार्रवाई-साधनों को पुनर्निर्देशित करने के लिए बाध्य है। प्रशासन अपनी सेवाओं को सीधे नागरिक प्रत्यास्थता बढ़ाने वाले साधनों के रूप में निर्मित करता है।
IV. यह एक ऐसा अधिकार है जिसके लिए सार्वजनिक शक्ति अधिकतम नागरिकों की भौतिक स्वायत्तता को बढ़ावा देने हेतु सभी आवश्यक कदम उठाती है।
अनुच्छेद166 सामाजिक-आर्थिक बलिदान का
समुदाय द्वारा आर्थिक संस्थाओं को प्रदान किया गया विधिक व्यक्तित्व राष्ट्र की संज्ञानात्मक और शारीरिक क्षमता के उत्थान और संरक्षण में उनके सक्रिय योगदान के अधीन है।
I. मानवीय थकावट के हस्तांतरण का निषेध
ऐसी कोई भी वित्तीय संरचना या विनिवेश रणनीति असंवैधानिक है जिसका प्रत्यक्ष या इच्छित प्रभाव मानवीय थकावट की लागत को सार्वजनिक बजट या राष्ट्रीय एकजुटता पर स्थानांतरित करना हो।
II. समृद्धि का मापन और प्रतिस्थापनकारी बाध्यता का निषेध
सार्वजनिक शक्ति यह सुनिश्चित करती है कि राज्य के समृद्धि-सूचक केवल मानवीय जटिलता और नागरिक स्वायत्तता की वृद्धि को मापें, तथा उत्पादक नवाचार के विकल्प के रूप में समय या बजट संबंधी बाध्यता के उपयोग को निषिद्ध करती है।
अनुच्छेद153 वित्तीय और आर्थिक स्वतंत्रता का
व्यक्ति की मौलिक स्वतंत्रता में अपने अस्तित्व और गरिमा को सुनिश्चित करने के लिए मौद्रिक निर्भरता के अधीन न होने का अधिकार शामिल है।
बाज़ार अर्थव्यवस्था में भागीदारी नागरिक का स्वतंत्र विकल्प है और जीवनयापन के लिए अधीनता की बाध्यता नहीं बन सकती। गणराज्य गारंटी देता है कि किसी व्यक्ति को केवल वित्तीय तंत्रों से हटने या बाज़ार-आधारित संचय से इनकार करने के कारण उसके नागरिक अधिकारों, स्वायत्तता या सामाजिक स्थिति से वंचित नहीं किया जा सकता।
I. व्यक्तिगत विकल्प का त्रिस्तरीय ढाँचा
प्रत्येक नागरिक को कानून द्वारा समान रूप से संरक्षित तीन मार्गों के अनुसार अपने जीवन-ढंग का स्वतंत्र चयन करने की अविच्छेद्य क्षमता है:
1° कार्य, उद्यम या योगदानात्मक गतिविधि द्वारा मौद्रिक आय उत्पन्न करना;
2° स्वैच्छिक संयम और भौतिक आत्म-सीमांकन द्वारा अपनी आवश्यकताओं को स्वेच्छा से घटाना;
3° पारस्परिक सहायता, संसाधनों के साझाकरण, साझा संपदाओं के उपयोग और गैर-बाज़ार आत्म-उत्पादन पर आधारित प्रत्यक्ष आर्थिक विकल्पों में भाग लेना।
II. त्रिस्तरीय वित्तीय स्वतंत्रता
सार्वजनिक शक्ति नागरिकों की निर्णय-स्वायत्तता और विवेक की स्वतंत्रता को तीन प्रकार की अधीनता से बचाने वाला कानूनी कवच स्थापित करती है:
1° वित्तीय शोषण से स्वतंत्रता, जिसमें जबरन ऋण, संस्थागत सूदखोरी और जीवनोपयोगी आवश्यकताओं पर सट्टा निषिद्ध है;
2° कार्य-संबंधों में जीविका संबंधी दबाव से स्वतंत्रता, जो अखंडता, नैतिकता या स्वास्थ्य को क्षति पहुँचाने वाली किसी भी गतिविधि से इनकार करने या उसे छोड़ने की वास्तविक क्षमता सुनिश्चित करती है;
3° प्रशासनिक अभिभावकत्व से स्वतंत्रता, जो सामूहिक सुरक्षा को विवेकाधीन या बालसुलभ नियंत्रण की शर्तों से बाँधने को निषिद्ध करती है।
III. वैकल्पिक तंत्रों और साझा संपदाओं की सुरक्षा
कानून गैर-मौद्रिक आर्थिक संरचनाओं, पारस्परिक विनिमय नेटवर्क और स्व-प्रबंधित साझा संपदाओं की मान्यता, कानूनी सुरक्षा और स्थायित्व की गारंटी देता है। कोई विनियमन नागरिकों की बाज़ार प्रवाहों से बाहर अपनी भौतिक स्वायत्तता सामूहिक रूप से संगठित करने की क्षमता में अनुचित बाधा नहीं डाल सकता।
अनुच्छेद160 क्षेत्रीय गतिशीलता का
आवागमन की स्वतंत्रता घुमंतू, क्रमिक या स्थायी जीवन-पद्धति अपनाने के अविच्छेद्य अधिकार की गारंटी देती है। यह अधिकार उन सभी परिस्थितियों में अविच्छेद्य है जो तटस्थ और व्यावहारिक दृष्टिकोण से घुमंतू जीवन चुनने की ओर ले जाती हैं।
I. मौलिक अधिकारों की अपरिवर्तनीयता
स्थायी भौतिक पते का अभाव नागरिक, सामाजिक, कानूनी या आर्थिक अधिकारों के प्रयोग को सीमित नहीं कर सकता।
II. गैर-क्षेत्रीय प्रशासनिक आधार और अवसंरचनाओं तक पहुँच
सार्वजनिक शक्ति गैर-क्षेत्रीय प्रशासनिक आधार के साथ-साथ परिवहन नेटवर्क, ठहराव स्थलों और मूलभूत अवसंरचनाओं तक प्रभावी पहुँच की गारंटी देती है।
अनुच्छेद101 समय की सुरक्षा का
गणराज्य मानता है कि प्रत्येक नागरिक का समय एक मूल्यवान, सीमित और अविच्छेद्य संसाधन है। यह समय-पूँजी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राष्ट्र के विकास की आधारशिला है।
राज्य आर्थिक या सामाजिक चुनौतियों के सामने नागरिकों के प्रयास की अवधि बढ़ाने को प्राथमिक समायोजन चर मानने से स्वयं को रोकता है। कार्य-समय या सामाजिक दायित्वों की अवधि बढ़ाने वाला कोई उपाय तभी विचारणीय होगा जब कठोरता से सिद्ध हो कि गुणवत्ता, संगठन और दक्षता सुधारने के सभी समाधान समाप्त हो चुके हैं।
I. अनुकूलन और मूल्य की सघनता
राज्य का दायित्व है कि वह सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों में प्रबंधन-पद्धतियों की अक्षमता से होने वाली समय की बर्बादी से नागरिकों की रक्षा करे। उसे प्रोत्साहनों या संरचनात्मक नियमों के माध्यम से ऐसी संगठन-पद्धतियों को बढ़ावा देना और लागू करना चाहिए जो बिताए गए समय की अवधि की अपेक्षा उत्पन्न मूल्य की सघनता को प्राथमिकता दें।
II. राष्ट्रीय समय-संसाधन की अखंडता
प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसकी अपनी प्रक्रियाएँ नागरिकों के जीवन-समय पर कभी भी अनुचित भार न बनें। थोपी गई प्रत्येक देरी या दोहराई जाने वाली प्रत्येक प्रक्रिया को राष्ट्रीय समय-संसाधन पर आघात माना जाता है, जिसे राज्य निरंतर घटाने के लिए प्रतिबद्ध है।
अनुच्छेद154 बौद्धिक गतिविधि की संप्रभुता का
गणराज्य प्रत्येक व्यक्ति की इस अविच्छेद्य स्वतंत्रता को सुरक्षित करता है कि वह अपना समय, ऊर्जा और क्षमताएँ नवाचार, अनुसंधान, लेखन, कलात्मक अभिव्यक्ति या स्वतंत्र रूप से चुनी गई किसी भी बौद्धिक, तकनीकी और नागरिक गतिविधि को समर्पित कर सके।
किसी व्यक्ति को प्रशासनिक नियोजन की बाध्यताओं या आर्थिक अधीनता के आरोपित प्रारूपों के अधीन करने के लिए किसी उपयोगी कृति, डिजाइन-कार्य या योगदानात्मक अभिरुचि को छोड़ने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
I. औपचारिक वर्गीकरणों पर वास्तविक गतिविधि की प्राथमिकता
नगर-जीवन में भागीदारी, सामाजिक गरिमा और व्यक्तिगत प्रतिबद्धता का मूल्यांकन योगदानों, परियोजनाओं और कार्यों की वास्तविकता के आधार पर किया जाता है, न कि केवल वेतनभोगी रोजगार, पंजीकृत व्यापार या निगमगत अधीनता के ढाँचों से संबंध के आधार पर। राज्य और समाज स्वायत्त पहलों, संघीय पारस्परिक सहायता और स्वतंत्र सृजन को पारंपरिक आर्थिक गतिविधियों के समान पूर्ण मूल्य देते हैं।
II. अवमूल्यन और संस्थागत पूर्वाग्रहों का निषेध
किसी सार्वजनिक, प्रशासनिक, पुलिस या न्यायिक प्राधिकरण के लिए किसी निगमगत, कर-संबंधी या वाणिज्यिक बीमा रजिस्टर में पंजीकरण के अभाव से अनुपयोगिता, नैतिक अस्थिरता, निष्क्रियता या नागरिक अयोग्यता की धारणा निकालना कठोर रूप से निषिद्ध है। स्वतंत्र योगदानात्मक गतिविधि को केवल निष्क्रियता या वास्तविक हाशियाकरण में घटाने के लिए किसी प्रशासनिक प्रबंधन श्रेणी का अपमानजनक उपयोग नहीं किया जा सकता।
III. प्रतिनिधित्व और सामाजिक आधार की गारंटियों में समानता
किसी भी नियंत्रण, जाँच या न्यायिक निकाय के समक्ष बौद्धिक उत्पादन, आविष्कार, कृतियों, स्वैच्छिक प्रतिबद्धताओं या सिद्ध सामाजिक उपयोगिता का भौतिक प्रमाण पेशेवर उपाधियों या मानकीकृत रोजगार अनुबंधों के समान ही सामाजिक एकीकरण, सम्मान और प्रतिनिधित्व की गारंटी देता है। नागरिक की वैधता उसके प्रस्तुत कार्यों और समुदाय की सेवा में उसकी ठोस कार्रवाई से उत्पन्न होती है।
अनुच्छेद132 संवैधानिक एर्गोनॉमिक्स के सिद्धांत का
एर्गोनॉमिक्स मानव-केंद्रित सार्वजनिक संगठन की आधारशिला है और यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक संरचना, उपकरण या प्रक्रिया मनुष्य के लिए और मनुष्य द्वारा बनाई जाए।
एर्गोनॉमिक्स का उद्देश्य सार्वजनिक धन की बर्बादी रोकना तथा जटिल प्रणालियों के सामने प्रत्येक नागरिक के संज्ञानात्मक भार और सामाजिक कल्याण की रक्षा करना है।
I. सार्वभौमिक और मानदंड-आधारित आवश्यकता
राज्य द्वारा पूर्णतः या आंशिक रूप से वित्तपोषित प्रत्येक प्रक्रिया, अवसंरचना, सेवा, उत्पाद, कार्यविधि या सूचना-माध्यम को एर्गोनॉमिक्स के पाँच मूल मानदंडों—सुरक्षा, आराम, दक्षता, उपयोगिता और उपयोग-सुख—को पूरा करना होगा। सार्वजनिक धन का आवंटन और व्यय इन सिद्धांतों के कठोर पालन पर निर्भर है।
II. आंतरिक और बाह्य अनुप्रयोग का दोहरा क्षेत्र
एर्गोनॉमिक्स का कर्तव्य सभी सार्वजनिक अंतःक्रियाओं को नियंत्रित करता है। यह राज्य सेवाओं और उपयोगकर्ताओं के संबंधों के साथ-साथ सार्वजनिक कर्मचारियों के बीच आंतरिक, संगठनात्मक और कार्य-संबंधों पर भी लागू होता है।
स्तर 2: संगठन
संरचना और कार्यात्मक पदानुक्रम
अनुच्छेद109 उपयोगी पदानुक्रम का
राष्ट्र व्यक्तिपरक, मनमाने या वंशानुगत मानदंडों पर आधारित ऐसे किसी भी पदानुक्रम को अस्वीकार करता है जो साझा हित में वास्तविक योगदान को प्रतिबिंबित नहीं करता।
कानून उत्तरदायित्व तक पहुँच के लिए प्रदर्शन और योग्यता के वस्तुनिष्ठ मानदंड निर्धारित करता है और सुनिश्चित करता है कि सामाजिक संरचना के शीर्ष पर केवल वे लोग हों जिनकी कार्रवाई पूरे सामाजिक शरीर की जीवंतता को सर्वोत्तम बनाती है।
I. योग्यतापूर्ण ऊर्ध्वता का सिद्धांत
केवल वही सामाजिक भेद वैध हैं जो साझा उपयोगिता, सिद्ध प्रतिभा और स्पष्ट प्रयास पर आधारित हों। कार्यों की ऊर्ध्वता किसी भी प्रकार से प्रकृति या मानवीय गरिमा की श्रेष्ठता प्रदान नहीं करती।
II. पद-पूर्वाग्रहों का निष्प्रभावीकरण
राज्य का दायित्व है कि शिक्षा और संस्थागत पारदर्शिता के माध्यम से उन संज्ञानात्मक और सांस्कृतिक तंत्रों को विघटित करे जो किसी तकनीकी या राजनीतिक पद को प्रतीकात्मक कुलीनता की उपाधि या निष्क्रियता के विशेषाधिकार में बदल देते हैं।
III. प्रवाहों का आवर्तन और मूल्यांकन
प्रदर्शन से कटे प्रभुत्वशाली वर्गों के स्थायीकरण को रोकने के लिए उच्च उत्तरदायित्व का प्रत्येक पद कठोर पुनर्मूल्यांकन और अनिवार्य गतिशीलता के अधीन है।
कार्य संरचना को दी जाने वाली अस्थायी सेवा है, व्यक्ति की संपत्ति नहीं।
अनुच्छेद121 राजनीति और उसके नागरिकों के वास्तविक तथा प्रभावी कार्य का
राजनीतिक कार्रवाई और किसी भी सार्वजनिक जनादेश के प्रयोग का एकमात्र आधार सामान्य हित की सेवा है।
प्रत्येक राजनीतिक उत्तरदायी का कर्तव्य है कि वह अपनी ऊर्जा वास्तविकताओं के वस्तुनिष्ठ विश्लेषण और ठोस समाधानों के निर्माण पर आधारित गहन कार्य में लगाए। राजनीतिक कार्य को किसी भी स्थिति में व्यक्तिगत विपणन, करियर रणनीतियों या संगठनात्मक सत्ता-संघर्षों के लिए मोड़ा नहीं जा सकता; उसे ऐसी राजनीतिक भूमिका पुनर्स्थापित करनी चाहिए जिसमें राजनीतिक प्रतिनिधि का मिशन और नागरिक की भागीदारी अपने वास्तविक कार्य में लौटें।
I. अनिवार्य मिशन और तुलनात्मक विश्लेषण की पद्धति
हर निर्वाचित प्रतिनिधि या सार्वजनिक नेता की गतिविधि में सार्वजनिक समस्याओं की पहचान, उनका सटीक वर्गीकरण और नामकरण अनिवार्य है। पूर्ववर्ती कार्यों की तुलना में जो नए विश्लेषणात्मक तत्व जोड़े गए हैं, उन्हें स्पष्ट रूप से सामने रखना आवश्यक है। समाधानों का मूल्यांकन पूर्वनिर्धारित गुणवत्ता और व्यवहार्यता मानदंडों के अनुसार किया जाता है। अंततः, पहले से चल रही परियोजनाओं का विश्लेषण करना और प्रतिस्पर्धी व्यवस्थाएँ बनाने से पहले उनसे जुड़ने तथा उन्हें समृद्ध करने को प्राथमिकता देना अनिवार्य है।
II. संचार की समय और वित्तीय सीमा
व्यक्तिगत प्रचार, करियर, सदस्यता प्रयासों, पद की खोज या दलगत जीवन पर लगाया गया समय व्यक्तिगत कार्य-समय के 5% तक कठोर रूप से सीमित है और उस पर बाध्यकारी वित्तीय सीमा लागू होती है। शेष 95% समय केवल वास्तविक और अनुरेखणीय बौद्धिक कार्य के लिए आरक्षित है।
III. प्रमाण, परिमाण और सीमाओं की पारदर्शिता की आवश्यकता
हर सार्वजनिक स्थिति को कठोर बौद्धिक प्रदर्शन से समर्थित होना चाहिए, जिसमें समस्या की गंभीरता और उपायों के अपेक्षित प्रभाव के सत्यापन योग्य परिमाण शामिल हों। प्रत्येक कार्य को शेष अनिश्चितताओं, अज्ञात तत्वों और पद्धतिगत सीमाओं को ईमानदारी से प्रस्तुत करना चाहिए।
IV. राजनीतिक प्रतिबद्धता का संविदात्मक मूल्य और प्रवर्तनीयता
राजनीतिक उत्तरदायियों द्वारा सार्वजनिक रूप से की गई प्रतिबद्धताओं और वादों का कानूनी संविदात्मक मूल्य होता है। जानबूझकर किया गया उल्लंघन या स्पष्ट रूप से भ्रामक तत्वों पर आधारित प्रतिबद्धता उसके कर्ता की जिम्मेदारी उत्पन्न करती है।
V. राष्ट्रीय परामर्श मंच और तकनीकी सहायता
राज्य सभी विश्लेषणों, आँकड़ों और परियोजनाओं को केंद्रीकृत करने वाला आधिकारिक डिजिटल मंच स्थापित करता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरण योगदानों को व्यवस्थित करते हैं, संश्लेषण निकालते हैं और नागरिकों के लिए खुले तकनीकी विश्लेषण तथा रचनात्मकता कार्यशालाओं को सुगम बनाते हैं।
VI. राजनीतिक आक्रमणों का निषेध और संघर्षों का रूपांतरण
राजनीतिक और दलगत आक्रमण कठोर रूप से निषिद्ध हैं। प्रत्येक मतभेद को प्रस्तावित निष्कर्षों और समाधानों के बीच कठोर तथा दस्तावेजीकृत तुलनात्मक विश्लेषण में बदलना अनिवार्य है।
VII. धोखाधड़ी की रोकथाम, प्रस्तुत कार्यों का नियंत्रण और दंड
तकनीकी शीर्षकों के पीछे दलगत गतिविधियों या करियर संबंधी प्रयासों को छिपाना कठोर रूप से निषिद्ध है। नियंत्रण सार्वजनिक मंच पर जमा वास्तविक प्रस्तुत कार्यों और समय-सारिणियों की पारदर्शिता के आधार पर किया जाता है; उल्लंघन पर वित्तीय दंड और चुनाव लड़ने की अयोग्यता लागू हो सकती है।
अनुच्छेद9 राष्ट्र की रणनीतिक लामबंदी
राष्ट्र की रणनीतिक लामबंदी राज्य का एक संप्रभु दायित्व है: बुद्धिमत्ता और विशेषज्ञता को एकजुट करना, संबंधित पक्षों के बीच समन्वय स्थापित करना तथा संकटों, कठिनाइयों और परिवर्तनों को सुरक्षा, कल्याण और सामूहिक समृद्धि के अवसरों में बदलने के लिए आवश्यक संसाधन जुटाना।
राज्य संकटों, कठिनाइयों और उभरते परिवर्तनों के प्रति सकारात्मक, उद्यमशील और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाएगा। इस दायित्व के लिए बिखरी हुई प्रशासनिक प्रतिक्रियाओं से आगे बढ़कर, परिस्थितियों की माँग के अनुसार, परिणाम देने वाली समन्वित और रचनात्मक सामूहिक कार्रवाई संगठित करना आवश्यक है।
I. सक्रियण के आधार और औपचारिक घोषणा
सक्रियण की सीमाएँ घटनाक्रम की गंभीरता, व्यापकता और गति तथा निष्क्रियता के संभावित परिणामों के आधार पर निर्धारित की जाएँगी। नागरिक विचार-विमर्श, सार्वजनिक जाँच और स्थायी सामूहिक-बुद्धिमत्ता प्रणालियों से प्राप्त चेतावनियाँ उन परिस्थितियों की पहचान में सहायक होंगी जिनमें रणनीतिक लामबंदी आवश्यक है। निर्धारित सीमा पार होते ही राजनीतिक सुविधा की परवाह किए बिना योजना को सक्रिय करना अनिवार्य होगा। अप्रत्याशित परिस्थितियों में भी चेतावनी प्रक्रिया के माध्यम से इसे सक्रिय किया जा सकेगा। राज्य तुरंत सक्रियण की घोषणा करेगा, उत्तरदायी व्यक्तियों को नियुक्त करेगा तथा उद्देश्य, लगाए गए संसाधन और कार्य-सारिणी प्रकाशित करेगा।
II. रचनात्मक लामबंदी और विचार-विमर्श
योजना सक्रिय होने पर राजनीतिक कार्य, विशेषज्ञता, सार्वजनिक प्रशासन और नागरिक विचार-विमर्श की व्यवस्थाओं की समन्वित लामबंदी आरंभ होगी। यह भागीदारी, जाँच और स्वतंत्र अन्वेषण के संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप होगी। नागरिक, शोधकर्ता, उद्यम, संगठन और संबंधित सार्वजनिक सेवाएँ समाधान खोजने में भाग लेंगी।
इस कार्य में ऐसे दृष्टिकोणगत बदलावों की पड़ताल की जाएगी जो एक साथ अनेक लाभ दे सकें: मानव जीवन की रक्षा, सुरक्षा, सामूहिक सुख, सामाजिक उपयोगिता, बचत, नवाचार, समृद्धि और पारिस्थितिक संतुलन की बहाली। प्रशासनिक आदतों या सैद्धांतिक आग्रहों के आधार पर सुधार के किसी गंभीर अवसर को बाहर नहीं किया जा सकता। राज्य व्यक्तिगत गरिमा और स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए पहलों को सुगम बनाएगा तथा उपलब्ध कौशल, ज्ञान और संसाधन जुटाएगा।
III. समय-सीमाएँ और क्रियान्वयन
योजना में रचनात्मक अन्वेषण, मूल्यांकन, निर्णय और क्रियान्वयन के लिए बाध्यकारी समय-सीमाएँ निर्धारित की जाएँगी, जो परिस्थिति की गंभीरता, तात्कालिकता और जटिलता के अनुपात में होंगी। तत्काल सुरक्षा उपायों के साथ-साथ स्थायी समाधानों की खोज और मूल कारणों को दूर करने का कार्य चलेगा। सार्वजनिक प्राधिकरण प्रगति, परिणामों और आवश्यक सुधारों का विवरण देंगे। किसी गंभीर समाधान को छोड़ने या विलंब करने का औचित्य बताना अनिवार्य होगा। बिना उचित कारण योजना सक्रिय न करना, लामबंदी न करना या उसे लागू न करना इस संवैधानिक दायित्व का उल्लंघन होगा।
Note de l'auteur — Exemple d'application face à la guerre menée par la Russie contre l'Ukraine
Une démarche de transformation positive aurait pu consister à faciliter largement l'accueil des citoyens russes souhaitant échapper à la guerre, à la mobilisation ou à la répression, notamment par la création d'un visa spécial lié à la guerre.
Cette ouverture aurait pu poursuivre plusieurs objectifs simultanément : protéger les personnes menacées ; accueillir des compétences scientifiques, techniques, artistiques et entrepreneuriales ; réduire potentiellement le nombre de personnes mobilisables par l'armée russe ; diversifier les origines de l'immigration en France ; et stimuler l'économie par de nouvelles activités et contributions.
L'expérience polonaise d'accueil des Ukrainiens pourrait servir de point de comparaison pour étudier les effets économiques, sociaux et administratifs de telles politiques, en tenant compte des différences entre les populations et les contextes.
L'accueil aurait été accompagné de moyens d'installation, d'accès au travail et de reconnaissance des compétences, ainsi que de contrôles de sécurité individualisés et proportionnés aux risques identifiés.
Un programme de contribution civile aurait également pu permettre aux personnes accueillies de consacrer volontairement une partie de leur temps, selon leurs compétences, aux efforts visant à contribuer à la fin de la guerre : traduction, recherche, aide aux victimes, documentation, soutien à l'information indépendante ou coopération avec la société civile russe, dans le respect de leur liberté de pensée et de la sécurité de leurs proches.
Cet exemple illustre une même philosophie : rechercher des réponses associant sauvegarde humaine, sécurité, utilité collective et dynamisme économique. Les bénéfices envisagés auraient dû être évalués et suivis, mais leur exploration aurait constitué une obligation de l'État.
अनुच्छेद10 नागरिक भागीदारी
राज्य का दायित्व है कि वह सार्वजनिक हित की समस्याओं की पहचान, समझ और समाधान तथा सार्वजनिक कार्रवाई की रूपरेखा बनाने और उसे लागू करने में नागरिकों की स्थायी, सार्वभौमिक और सक्रिय भागीदारी संगठित करे।
लोकतंत्र को चुनावों और कभी-कभार होने वाले परामर्शों तक सीमित नहीं किया जा सकता। अपनी पद्धतियों, प्रौद्योगिकियों और लोकतांत्रिक व्यवहारों में निरंतर सुधार के माध्यम से राज्य प्रत्येक व्यक्ति के ज्ञान, अनुभव और रचनात्मकता को सामूहिक संसाधन में बदलेगा।
I. खुला नवाचार और वितरित बुद्धिमत्ता
राज्य सार्वजनिक नीतियों के निर्माण में नागरिकों, संगठनों, उद्यमों, शोधकर्ताओं और समाज के अन्य पक्षों को सम्मिलित करने वाली खुली नवाचार की स्थायी व्यवस्था संगठित करेगा। वह समाधान खोजने पर अपना एकाधिकार छोड़ेगा और क्षमताओं का संयोजक बनेगा, जो पूरे समाज में फैली बुद्धिमत्ता को जुटा सके, परस्पर जोड़ सके और मान्यता दे सके।
II. क्षेत्रीय नेटवर्क और लोकतंत्र का विस्तार
राज्य स्थानीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर स्थायी भागीदारी व्यवस्थाओं की गारंटी देगा, ताकि समस्याएँ और प्रस्ताव सामने लाए जा सकें, उनकी तुलना हो सके और उन्हें परस्पर जोड़ा जा सके। प्रत्येक क्षेत्रीय स्तर प्रयोग, सहयोग और अपने अधिकार-क्षेत्र के भीतर संयुक्त निर्णय का स्थान होगा। स्थानीय योगदान राष्ट्रीय विचार-विमर्श को समृद्ध करेंगे, लेकिन नागरिकों को सीधे पूरे देश के स्तर पर परामर्श शुरू करने से नहीं रोकेंगे। राज्य संगठनों और पेशेवर संस्थाओं सहित सामूहिक जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी, उनकी स्वायत्तता का सम्मान करते हुए, सहभागी पद्धतियों को प्रोत्साहित करेगा।
III. राष्ट्रीय सामूहिक-बुद्धिमत्ता मंच
राज्य एक खुला, सुव्यवस्थित और सुलभ राष्ट्रीय मंच उपलब्ध कराएगा, जिस पर हर व्यक्ति समस्याओं की सूचना दे सके, आवश्यकताओं की पहचान कर सके, ज्ञान साझा कर सके, समाधान प्रस्तावित कर सके और सामूहिक कार्य में भाग ले सके। योगदानों को एक व्यवस्थित ज्ञान-भंडार में संकलित किया जाएगा, ताकि उन्हें विभिन्न क्षेत्रीय स्तरों पर जोड़ा, समृद्ध, अनुवीक्षित और उपयोग किया जा सके। यह मंच ऐसी नागरिक पहलों को भी स्थान देगा जो नागरिक पहल के संवैधानिक अधिकार के अनुसार सार्वजनिक प्रशासन को कानूनी रूप से बाध्य करने वाले परामर्श आरंभ कर सकें।
IV. नागरिक भागीदारी के चार स्तर
राज्य भागीदारी के निम्नलिखित चार पूरक रूपों की गारंटी देगा और उनका विकास करेगा:
विश्लेषणात्मक: मुद्दों की पहचान और सूचीकरण, कारणों की जाँच, परिस्थितियों की समझ तथा आवश्यकताओं का आकलन।
रचनात्मक: नवीन समाधानों सहित समाधानों की कल्पना करना, उन्हें विकसित करना, उनकी तुलना करना और उनमें सुधार करना।
कार्यान्वयन-संबंधी: स्वीकृत समाधानों को लागू करने की योजना, संगठन और तैयारी में भाग लेना।
परिचालनात्मक: सामूहिक कार्रवाइयों और परियोजनाओं को पूरा करने में ठोस और स्वैच्छिक योगदान देना।
संबंधित मुद्दों की प्रकृति के अनुसार इन स्तरों का उपयोग अलग-अलग या एक साथ किया जा सकेगा।
V. लोकतंत्र को सक्रिय रूप से सुगम बनाना
राज्य केवल सूचना प्रकाशित करने या कोई मंच खोल देने को प्रभावी भागीदारी नहीं मान सकता। उसका दायित्व है कि वह मुद्दों को सार्वजनिक करे, योगदान प्रोत्साहित करे, विशेषज्ञता जुटाए और शैक्षिक पद्धतियों, अनेक संचार माध्यमों पर अभियानों तथा विभिन्न समूहों के अनुरूप व्यवस्थाओं के माध्यम से संवाद सुगम बनाए। यह सुविधा उन लोगों की भागीदारी भी बढ़ाएगी जो सामान्यतः राजनीतिक प्रक्रियाओं से बाहर रह जाते हैं।
VI. अंतरराष्ट्रीय खुलापन
नागरिक भागीदारी को विश्वभर में विकसित ज्ञान, अनुभव और नवाचारों का लाभ मिलेगा। राज्य विदेशों में रहने वाले लोगों के योगदान को, विशेष रूप से स्वचालित अनुवाद के माध्यम से, सुगम बनाएगा और राष्ट्रीय तथा स्थानीय विचार-विमर्श के लिए उपयोगी अंतरराष्ट्रीय विश्लेषण और विशेषज्ञता तक पहुँच की व्यवस्था करेगा।
VII. लोकतांत्रिक पद्धतियों में निरंतर सुधार
राज्य अपनी भागीदारी व्यवस्थाओं की गुणवत्ता, सुलभता और प्रभावशीलता में निरंतर सुधार करने के लिए बाध्य है। यह दायित्व नैतिक, पद्धतिगत, तकनीकी और उपयोग-सुगमता संबंधी आयामों के साथ-साथ उनकी प्रभावशीलता, दक्षता और वास्तविक प्रभाव के मूल्यांकन को भी समाहित करता है। संगठन और मूल्यांकन के नियम एक जैविक कानून द्वारा निर्धारित किए जाएँगे।
अनुच्छेद11 सार्वजनिक विचार-विमर्श आरंभ करने का नागरिक अधिकार
नागरिकों को सार्वजनिक विचार-विमर्श आरंभ करने का अधिकार है, जिससे संबंधित प्रशासन कानूनी रूप से बाध्य होते हैं; इसके लिए केवल राजनीतिक अधिकारियों की पहल या अनुमति पर निर्भर रहना आवश्यक नहीं है।
सुलभ समर्थन संबंधी शर्तें पूरी करने वाली प्रत्येक सामूहिक पहल स्वतः मान्यता प्राप्त सार्वजनिक प्रक्रिया बननी चाहिए। यह अधिकार समस्याओं को गंभीर संकट बनने से पहले उनके शुरुआती महत्वपूर्ण संकेतों पर ही संबोधित करने की सुविधा देता है, और मांग उठाने, हड़ताल करने तथा प्रदर्शन करने की स्वतंत्रताओं को कम नहीं करता।
Ⅰ. नागरिकों द्वारा प्रत्यक्ष पहल
कोई भी नागरिक सामूहिक हित के विषय पर सार्वजनिक विचार-विमर्श का प्रस्ताव रख सकता है, चाहे सार्वजनिक मंच के माध्यम से या स्वतंत्र नागरिक पहल द्वारा। प्रस्ताव को आवश्यक संख्या में समर्थक मिलते ही उसे बिना विवेकाधीन अनुमति या अनुचित विलंब के संस्थागत मान्यता प्राप्त सार्वजनिक विचार-विमर्श का दर्जा स्वतः मिल जाएगा। ऐसी मान्यता से पहल का नियंत्रण सार्वजनिक अधिकारियों को हस्तांतरित नहीं होगा।
Ⅱ. वास्तव में सुलभ समर्थन-सीमाएँ
पहल की शर्तें उसके क्षेत्रीय स्तर, विचार-विमर्श की प्रकृति और उससे उत्पन्न दायित्वों के अनुपात में होंगी। उन्हें इतना ऊँचा नहीं रखा जा सकता कि इस अधिकार का व्यवहार में प्रयोग असंभव हो जाए; न ही उन्हें जनमत-संग्रह या विधायी निर्णय बुलाने की शर्तों के बराबर माना जा सकता है। एक जैविक कानून स्थानीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पहलों के अनुरूप सुलभ सीमाएँ तथा सरल प्रक्रियाएँ सुनिश्चित करेगा।
Ⅲ. अप्रत्यक्ष और निवारक पहल
प्रत्यक्ष पहलों से स्वतंत्र रूप से राज्य सामूहिक समस्याओं के महत्वपूर्ण संकेत पहचानेगा और उनकी गंभीरता, व्यापकता, तात्कालिकता या पुनरावृत्ति के अनुसार उचित विचार-विमर्श आरंभ करेगा। चेतावनियाँ, बार-बार की शिकायतें, याचिकाएँ, मांगें और सामूहिक आंदोलन ऐसे संकेत हैं जो इस कर्तव्य को सक्रिय कर सकते हैं। राष्ट्रीय स्तर के किसी भी प्रदर्शन पर शीघ्र संस्थागत विचार-विमर्श शुरू करना आवश्यक होगा, जब तक कि उपयुक्त प्रक्रिया पहले से जारी न हो। समस्या की गंभीरता जुटे हुए लोगों की संख्या से स्वतंत्र रूप से तत्काल पहल को उचित ठहरा सकती है।
Ⅳ. कानूनी मान्यता और प्रशासनिक प्रतिबद्धता
पहल आरंभ होने पर विचार-विमर्श को सार्वजनिक दर्जा मिलेगा और सक्षम प्रशासन तथा सार्वजनिक निकायों को सक्रिय योगदान देना होगा। इस दायित्व में जिम्मेदार संपर्क व्यक्तियों की नियुक्ति, उपयोगी जानकारी उपलब्ध कराना, आवश्यक जाँच में सहयोग देना और समस्याओं तथा प्रस्तावों की समीक्षा में भाग लेना शामिल है। अधिकारी केवल इस कारण सहयोग से इनकार नहीं कर सकते कि विचार-विमर्श नागरिकों ने शुरू किया है या उससे उनके अपने कार्यों पर प्रश्न उठते हैं।
Ⅴ. संकट की रोकथाम और रणनीतिक लामबंदी से संबंध
राज्य सामूहिक समस्याओं को बड़े संघर्ष में बदलने की प्रतीक्षा किए बिना उनके प्रारंभिक समाधान को प्रोत्साहित करेगा। जहाँ जाँच या विचार-विमर्श से ऐसी परिस्थिति सामने आए जो राष्ट्र की रणनीतिक लामबंदी की कसौटियों पर खरी उतरती हो, वहाँ अधिकारी संबंधित संवैधानिक दायित्वों के अनुसार इस संप्रभु जिम्मेदारी को सक्रिय करेंगे। विचार-विमर्श सार्वजनिक स्वतंत्रताओं के प्रयोग की अनिवार्य पूर्वशर्त नहीं है और न ही आवश्यक आपातकालीन उपायों में बाधा है।
Ⅵ. प्रभावी प्रयोग और कानूनी सुरक्षा
प्रस्ताव प्रस्तुत करने और समर्थन देने की प्रक्रियाएँ सभी के लिए सुलभ होंगी, जिनमें डिजिटल साधनों तक सीमित पहुँच रखने वाले लोग भी शामिल हैं। समर्थन की प्रामाणिकता, व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा और पहल की शर्तों की पारदर्शिता सुनिश्चित की जाएगी। एक जैविक कानून समय-सीमाएँ, संस्थागत दायित्व और इस अधिकार को लागू कराने के अपील-मार्ग निर्धारित करेगा। कोई भी प्रक्रिया अधिकारियों को ऐसी विचार-विमर्श प्रक्रिया मनमाने ढंग से निष्प्रभावी करने की अनुमति नहीं दे सकती जिसने पहल की निर्धारित शर्तें विधिवत पूरी कर ली हों।
अनुच्छेद12 सार्वजनिक विचार-विमर्श में सहायता का अधिकार
नागरिकों को अपनी आवश्यकताओं की पहचान करने, सामूहिक समस्याओं को समझने और अपनी मांगों तथा समाधानों को स्वतंत्र रूप से विकसित करने के लिए राज्य से बौद्धिक, दस्तावेज़ी और पद्धतिगत सहायता प्राप्त करने का अधिकार है।
लोकतंत्र केवल नागरिकों को पहले से तय किए गए प्रश्नों पर बोलने देने तक सीमित नहीं है। उसे उन्हें समस्याएँ खोजने, उनकी परिभाषा पर प्रश्न उठाने, उनके गहरे कारणों की जाँच करने और नई संभावनाएँ तलाशने के साधन भी देने चाहिए, भले ही ऐसी जाँच सार्वजनिक कार्रवाई की कमियाँ उजागर करे।
Ⅰ. समस्याओं को परिभाषित और व्यापक बनाने की स्वतंत्रता
किसी भी विचार-विमर्श को उसके आयोजकों या अधिकारियों द्वारा पहले से निर्धारित प्रश्न, निदान या समाधानों तक सीमित नहीं किया जा सकता। नागरिकों को विचाराधीन समस्याओं पर प्रश्न उठाने, उन्हें नए रूप में प्रस्तुत करने, गहराई से समझने और उनका दायरा बढ़ाने, उनके कारणों और परिणामों की जाँच करने तथा अन्य आवश्यकताओं या उद्देश्यों की पहचान करने का अधिकार है। यह स्वतंत्रता पूरी प्रक्रिया में सुनिश्चित होगी, चाहे पहल नागरिकों ने की हो या सार्वजनिक अधिकारियों ने।
Ⅱ. जाँच और विचार-विमर्श साथ-साथ
विचार-विमर्श आरंभ करने के लिए अंतिम निदान की प्रतीक्षा आवश्यक नहीं होगी। समस्याओं की प्रकृति, गंभीरता और जटिलता के अनुपात में आवश्यक जाँच नागरिक संवाद के साथ-साथ चलेगी। जाँच के निष्कर्ष विचार-विमर्श को समृद्ध करेंगे, जबकि नागरिक योगदान से परिकल्पनाओं में संशोधन, शोध का विस्तार या नई जाँच शुरू हो सकती है।
Ⅲ. बौद्धिक और दस्तावेज़ी सहायता
राज्य विचाराधीन विषयों को समझने के लिए उपयोगी ज्ञान, दस्तावेज़, आँकड़े, अध्ययन, मूल्यांकन और विशेषज्ञता सक्रिय रूप से उपलब्ध कराएगा। वह विविध तथा परस्पर विरोधी विशेषज्ञ मतों तक पहुँच सुगम बनाएगा, स्पष्टीकरण देगा और तर्कसंगत निदान विकसित करने में सहायता करेगा। यह सहायता प्रत्येक संस्थागत मान्यता प्राप्त विचार-विमर्श को, उसकी उत्पत्ति चाहे जो हो, सुनिश्चित की जाएगी और राष्ट्र की रणनीतिक लामबंदी की प्रक्रियाओं पर भी लागू होगी।
Ⅳ. आवश्यकताओं की पहचान और मांगों की गुणवत्ता में सुधार
राज्य तत्काल, गहरी, संरचनात्मक, सामूहिक और भविष्य की आवश्यकताओं की खोज में सहायता करेगा, जिनमें शुरू में व्यक्त न की गई आवश्यकताएँ भी शामिल हैं। वह लक्षणों, कारणों और परिणामों में अंतर करने, परिकल्पनाओं की तुलना करने, प्राथमिकताएँ तय करने और विभिन्न समाधानों का मूल्यांकन करने की पद्धतियाँ उपलब्ध कराएगा। विशेष रूप से इस दृष्टिकोण से गुणात्मक, संगठनात्मक और पद्धतिगत सुधारों की जाँच संभव होनी चाहिए, बजाय इसके कि मांगों को हमेशा अधिक भौतिक या वित्तीय संसाधनों तक सीमित कर दिया जाए।
Ⅴ. स्वयं पर प्रश्न उठाने का राज्य का कर्तव्य
जहाँ विचाराधीन समस्याएँ सार्वजनिक कार्रवाई से संबंधित हों, राज्य अपनी नीतियों, संस्थाओं, सेवाओं और परिणामों के आलोचनात्मक विश्लेषण में योगदान देगा। वह उनके उद्देश्यों, गुणवत्ता, संगठन, पद्धतियों और प्रभावशीलता की समीक्षा सुगम बनाएगा, जिसमें नागरिकों को ऐसी कमियों से अवगत कराना भी शामिल है जिन्हें उन्होंने स्वयं नहीं पहचाना। कोई अधिकारी केवल इसलिए अपनी संस्थागत खराबियों को जाँच से नहीं बचा सकता कि वे प्रारंभिक मांगों के दायरे से बाहर हैं।
Ⅵ. विश्लेषण की स्वतंत्रता और सारांशों की निष्पक्षता
राज्य की सहायता से उसे नागरिकों की वास्तविक आवश्यकताएँ, उनकी मांगों की वैधता या उनके द्वारा अपनाए जाने वाले निष्कर्ष तय करने का कोई अधिकार नहीं मिलेगा। प्रक्रियाएँ बहुलवाद, विश्लेषणों की तुलना, हस्तक्षेपों की पारदर्शिता और हेरफेर, हितों के टकराव तथा प्रतिनिधित्व पर कब्जे की रोकथाम सुनिश्चित करेंगी। सारांश योगदानों, स्थापित ज्ञान, अनिश्चितताओं और असहमतियों को ईमानदारी से दर्शाएँगे तथा अल्प, मध्यम और दीर्घ अवधि की आवश्यकताओं और संभावित समझौतों में अंतर करेंगे। राजनीतिक अधिकारियों के मूल्यांकन और निर्णय अलग से प्रस्तुत किए जाएँगे, बिना विचार-विमर्श के निष्कर्ष बदले।
Ⅶ. सार्वजनिक जवाबदेही और अनुवर्ती कार्रवाई
संबंधित प्रशासन कानूनी रूप से गोपनीय सूचनाओं की सुरक्षा के अधीन जाँच और विचार-विमर्श में प्रभावी योगदान देंगे। वे सुनिश्चित समय-सीमाओं में विश्लेषणों, प्रस्तावों, निर्णयों और अनुवर्ती कार्रवाई का सार्वजनिक विवरण देंगे। इस दायित्व में वास्तविक परीक्षण और कारणयुक्त उत्तर देना आवश्यक है, लेकिन अधिकारियों को प्रस्तावित समाधान अपनाने के लिए बाध्य नहीं किया जाता। एक जैविक कानून सहायता के स्वरूप, स्वतंत्रता की गारंटियाँ, समय-सीमाएँ और अपील के मार्ग निर्धारित करेगा।
अनुच्छेद16 राजनीतिक दल से राजनीतिक परियोजना की ओर
राजनीतिक जीवन का संगठन परियोजनाओं के आधार पर किया जाता है। प्रस्तावों का मूल्यांकन उनके अपने गुणों के अनुसार होता है, न कि उनके लेखकों की पहचान, प्रसिद्धि या राजनीतिक संबद्धता के आधार पर।
प्रत्येक नागरिक सुधार का प्रस्ताव रख सकता है और उसे विकसित करने के लिए स्वतंत्र रूप से अन्य लोगों के साथ जुड़ सकता है। राज्य इस अधिकार के प्रभावी प्रयोग के लिए आवश्यक जानकारी, सहायता और भागीदारी के साधनों की गारंटी देता है।
I। परियोजनाओं की शुरुआत और मूल्यांकन
परियोजनाएँ एक साझा कार्यपद्धति संबंधी मार्गदर्शिका और नैतिक संहिता के अनुसार विकसित की जाती हैं। इनमें उद्देश्य, संसाधन, संभावित परिणाम और मूल्यांकन की प्रक्रियाएँ स्पष्ट की जाती हैं।
परियोजनाओं की प्रस्तुति सार्वजनिक होती है। प्रस्तावों के तुलनात्मक मूल्यांकन के दौरान लेखकों की पहचान छिपाई जाती है, लेकिन वित्तपोषण और हितों के टकराव की जाँच के लिए आवश्यक जानकारी का पता लगाने की व्यवस्था बनी रहती है।
II। सार्वजनिक विचार-विमर्श और अभिसरण
किसी परियोजना के प्रकाशन के साथ सार्वजनिक विचार-विमर्श की अवधि अनिवार्य रूप से आरंभ होती है। इसमें संविधान द्वारा निर्धारित नैतिक, कार्यपद्धतिगत, तकनीकी और उपयोग-सुविधा संबंधी सुरक्षा उपाय लागू होते हैं।
जब कई परियोजनाएँ एक ही विषय से संबंधित हों, तो उन्हें निकट लाने की प्रक्रिया स्वतः आरंभ होती है। प्रस्तावों को समृद्ध बनाने के लिए विभिन्न परियोजनाओं के उपयोगी योगदानों की संयुक्त समीक्षा की जाती है। किसी भी योगदान को शामिल करने या बाहर रखने का कारण सार्वजनिक रूप से बताना अनिवार्य है।
विरोध की स्वतंत्रता की गारंटी है। सहमति या अभिसरण की खोज के नाम पर परस्पर असंगत दृष्टिकोणों का जबरन विलय नहीं किया जा सकता और न ही लोकतांत्रिक निर्णय के लिए प्रस्तुत मतभेदों को मिटाया जा सकता है।
III। मतदान और भिन्न दृष्टिकोण रखने का अधिकार
मतदान की व्यवस्था सामान्य नीतिगत दिशाओं और अलग-अलग तय किए जा सकने वाले प्रावधानों के बीच अंतर करने की अनुमति देती है। चुने गए समाधानों के संयोजन को अंतिम स्वीकृति से पहले संगति की जाँच से गुजरना होता है।
भिन्न दृष्टिकोण रखने का अधिकार उन परिवर्तनकारी परियोजनाओं की अलग समीक्षा सुनिश्चित करता है जिन्हें किसी साझा निष्कर्ष में समाहित नहीं किया जा सकता। सार्वजनिक रूप से निर्धारित मूल्यांकन शर्तों के अंतर्गत उनका प्रायोगिक परीक्षण किया जा सकता है।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा स्वीकृत परियोजनाओं के वित्तपोषण, क्रियान्वयन और परिणामों की निगरानी की व्यवस्था करना सार्वजनिक प्राधिकारियों का दायित्व है।
IV। विचारों की स्मृति और परियोजनाओं का विकास
अस्वीकृत प्रस्तावों, उनके योगदानों और उन्हें स्वीकार न करने के कारणों को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध विचार-स्मृति डेटाबेस में सुरक्षित रखा जाता है, ताकि भविष्य के कार्यों में उनका उपयोग किया जा सके।
प्रत्येक परियोजना अपने पूरे जीवनचक्र को समेटती है: परिकल्पना, विकास, क्रियान्वयन, मूल्यांकन तथा आवश्यकता होने पर समाप्ति और पुनर्गठन। प्राप्त परिणामों का उपयोग विधायी प्रावधानों को अद्यतन करने, अप्रचलन की पहचान करने और सार्वजनिक कार्रवाई में निरंतर सुधार के लिए किया जाता है।
अनुच्छेद17 द्विसदनीय व्यवस्था से सहायक युग्म की ओर
विधायी शक्ति एक ही सभा द्वारा प्रयोग की जाती है, जो लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और पेशेवर विशेषज्ञता को जोड़ने वाले सहायक युग्मों के रूप में संगठित होती है।
द्विसदनीय व्यवस्था समाप्त की जाती है। सह-निर्माण निकाय सामूहिक और विभिन्न क्षेत्रों को जोड़ने वाली समीक्षा के माध्यम से परियोजनाओं के विकास में सहायता करता है। वह दूसरा सदन नहीं है और उसके पास राजनीतिक स्वीकृति देने या वीटो लगाने की शक्ति नहीं है।
I। सहायक युग्मों की संरचना
प्रत्येक युग्म में नागरिकों के प्रति जवाबदेह एक निर्वाचित सांसद और कार्यपद्धति तथा तकनीकी सहायता के लिए उत्तरदायी एक योग्य पेशेवर शामिल होता है।
सांसद प्रतिनिधिक जनादेश और संसदीय मतदान के अधिकार का प्रयोग करता है। पेशेवर परियोजनाओं के राजनीतिक गुण-दोष का पहले से निर्णय किए बिना तथा नए समाधानों की समीक्षा रोके बिना उनकी व्यवहार्यता, जोखिम और क्रियान्वयन संबंधी आवश्यकताओं की जाँच करता है।
पेशेवरों के चयन में योग्यता, स्वतंत्रता और हितों के टकराव की रोकथाम सुनिश्चित की जाती है। आवश्यकता पड़ने पर युग्म अतिरिक्त विशेषज्ञों की सहायता ले सकते हैं।
II। नागरिक परियोजनाओं को सहायता
सहायक युग्म नागरिकों को अपनी परियोजनाएँ तैयार करने और विकसित करने में मदद करते हैं। वे सार्वजनिक आँकड़ों, सार्वजनिक सेवाओं की विशेषज्ञता और आवश्यक अध्ययन-संसाधनों तक पहुँच सुगम बनाते हैं।
यह सहायता राजनीतिक संबद्धता या परियोजना प्रस्तुत करने वालों की परिस्थितियों से स्वतंत्र होकर समान शर्तों पर प्रदान की जाती है। इसमें उनकी स्वतंत्र परिकल्पना और प्रस्ताव रखने की स्वतंत्रता का सम्मान किया जाता है।
III। सह-निर्माण निकाय
सह-निर्माण निकाय सार्वजनिक विचार-विमर्श शुरू होने से लेकर परियोजना के विकास की पूरी अवधि तक कार्य करता है।
विषय के अनुसार इसमें संबंधित नागरिक, व्यावहारिक अनुभव रखने वाले लोग, विशेषज्ञ, शोधकर्ता और सार्वजनिक सेवाओं के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। एक स्थायी ढाँचा कार्यपद्धतियों की निरंतरता और किए गए कार्यों के संरक्षण को सुनिश्चित करता है।
यह निकाय प्रस्तावों, उनके परिणामों और अन्य सार्वजनिक नीतियों के साथ उनके संबंधों की विभिन्न दृष्टिकोणों से समीक्षा आयोजित करता है। वह परस्पर पूरक तत्व खोजता है और असंगतियों, अनिश्चितताओं तथा अभी निर्णय की अपेक्षा रखने वाले विकल्पों को स्पष्ट करता है।
IV। कार्यवाही और निर्णयों की पारदर्शिता
निकाय के योगदान और टिप्पणियाँ सार्वजनिक होते हैं। परियोजना प्रस्तुत करने वालों और सहायक युग्मों को कारणयुक्त उत्तर देने होते हैं, जिनमें बताया जाता है कि कौन-से संशोधन स्वीकार किए गए और कौन-से मतभेद बने हुए हैं।
सह-निर्माण से अधिक समृद्ध परियोजना, कई विकल्प या अलग-अलग परियोजनाओं को बनाए रखने का परिणाम निकल सकता है। केवल आम सहमति का अभाव किसी प्रस्ताव को मतदान से बाहर करने का आधार नहीं बन सकता।
स्वीकृति का अधिकार संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार नागरिकों और उनके प्रतिनिधियों के पास रहता है। संवैधानिकता की समीक्षा सह-निर्माण प्रक्रिया से अलग रहती है।
अनुच्छेद143 पूर्वानुमान की बाध्यता का
राज्य स्वभावतः एक निवारक कर्ता है।
उसका निरंतर कर्तव्य है कि वह अव्यवस्थाओं का पूर्वानुमान करे, समाज की संरचनात्मक कमजोरियों की पहचान करे और सामाजिक, पर्यावरणीय, स्वास्थ्य, मनोवैज्ञानिक तथा आर्थिक हानियों को उत्पन्न होने से पहले रोकने के लिए अग्रिम कार्रवाई करे।
पूर्वानुमान संबंधी प्रयासों की अनुचित अपर्याप्तता सार्वजनिक शक्तियों की जिम्मेदारी उत्पन्न करती है।
अनुच्छेद172 राज्य की बुद्धिमत्ता के रूप में सार्वजनिक कर्मचारी का
किसी भी कर्मचारी को अंधी नौकरशाही के यांत्रिक निष्पादक की स्थिति तक सीमित नहीं किया जा सकता। सार्वजनिक कर्मचारी राष्ट्र की बौद्धिक और निर्णयात्मक पूँजी हैं। राज्य का मूल कर्तव्य है कि उनकी विवेक, विश्लेषण और दूरदर्शी दृष्टि की क्षमताओं को सार्वजनिक नीतियों की रचना और मूल्यांकन में लगाया जाए।
I. भौतिक दिनचर्या से मुक्ति
राज्य अपनी कार्य-पद्धतियों की निरंतर पुनर्रचना करता है और अधिकारियों को सभी दोहरावदार या विमुखकारी कार्यों से मुक्त करने के लिए प्रतिस्थापन तकनीकों का उपयोग करता है। इससे प्राप्त समय और संसाधनों की बचत को पूरी तरह सार्वजनिक चिंतन के उन्नयन, क्षेत्रीय विशेषज्ञता और जटिल समस्याओं के समाधान में पुनर्निवेशित किया जाता है।
II. प्रतिभाओं और योगदानों का गतिशील मानचित्रण
प्रशासन मानव संसाधन प्रबंधन की ऐसी प्रणाली स्थापित करता है जो कर्मचारियों की योग्यताओं, विशिष्ट कौशलों और व्यापक दृष्टि लेने की क्षमता की निरंतर पहचान पर आधारित हो। प्रत्येक कर्मचारी, उसके पद या मूल प्रशासन की परवाह किए बिना, अपनी विशेषज्ञता या चिंतन के क्षेत्र से संबंधित राष्ट्रीय या क्षेत्रीय रणनीतिक विचार-विमर्श में योगदान देने के लिए अधिकृत है।
III. राज्य-चेतना और प्रशासनिक तंत्र के बीच पृथक्करण
राज्य राष्ट्र की सेवा में एक चिंतनशील जीव है, जो उसकी सहायता के लिए बने तकनीकी प्रशासनिक तंत्र से अलग है। कार्य-संगठन और सतत प्रशिक्षण दिनचर्या-आधारित प्रतिक्रियाओं की आदत का सक्रिय रूप से प्रतिरोध करते हैं और कर्मचारियों में आलोचनात्मक दूरी, निर्णय की स्वतंत्रता और उच्च सार्वजनिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करते हैं।
स्तर 3: तंत्र
परिचालन और विधायी प्रक्रियाएँ
अनुच्छेद144 राजनीतिक तटस्थता का
कोई भी संगठन किसी उपाय को केवल उसकी राजनीतिक संबद्धता या वैचारिक रुख के कारण बाधित या अस्वीकार नहीं कर सकता।
प्रत्येक निर्वाचित प्रतिनिधि की कार्रवाई और प्रत्येक राजनीतिक संगठन का संचालन केवल जनता की सेवा या उसके मतदाताओं के लिए वास्तविक उपयोगिता के अधीन है।
I. सार्वजनिक प्रदर्शन की प्राथमिकता
हर सार्वजनिक कार्य या विधायी प्रस्ताव का मूल्यांकन पूर्ण व्यावहारिकता के आधार पर किया जाता है। वैज्ञानिक या तथ्यात्मक रूप से किसी भी वैचारिक विकल्प से अधिक सामान्य लाभ देने वाला उपाय विधिसम्मत रूप से लागू होता है; केवल उसके लेखक की राजनीतिक संबद्धता पर आधारित विरोध शून्य हो जाता है।
II. कारणयुक्त अस्वीकृति और अनुरेखणीयता
प्रत्येक नकारात्मक मत या संशोधन से इनकार को औपचारिक रूप से या तो सामान्य हित को हुई हानि के प्रमाण द्वारा, जो उद्देश्यगत कारण बनता है, अथवा संबंधित दल के मतदाताओं की जीवन-स्थितियों पर प्रत्यक्ष आघात के तथ्यात्मक प्रदर्शन द्वारा, जो दलगत संगति का कारण बनता है, उचित ठहराया जाना चाहिए।
III. पारदर्शिता और कार्यों का एकीकरण
प्रत्येक स्थिति और उसका कारणयुक्त औचित्य स्वतः दल के अपने सदस्यों के लिए आधिकारिक संचार माध्यमों से संलग्न किया जाता है। इन दो आधारों में से किसी एक से समर्थित न होने वाला प्रत्येक इनकार शून्य है और सार्वजनिक जनादेश के दायित्व का उल्लंघन माना जाता है।
अनुच्छेद173 सार्वजनिक अप्रचलन के विशेषाधिकार का
राज्य, उसकी न्यायिक संस्थाएँ और सार्वजनिक मिशन निभाने वाली सभी सेवाओं को पुराने कार्य-तरीकों को बनाए रखने का कोई विशेषाधिकार नहीं है। वे स्थायी अद्यतन के कर्तव्य के अधीन हैं और उन्हें अपनी संगठनात्मक क्षमताओं को निजी क्षेत्र के सर्वोच्च दक्षता मानकों के अनुरूप करना चाहिए।
I. साधनों के निरंतर अद्यतन की बाध्यता
यह सार्वभौमिक दायित्व समन्वय के सर्वाधिक प्रभावी साधनों, कार्य-संरचनाओं और भौतिक संसाधनों को निरंतर अपनाने की माँग करता है।
II. रसद का अनुकूलन और मानवीय निर्णय का संरक्षण
किसी भी अनुचित धीमेपन को समाप्त करने के लिए रसद श्रृंखला और तैयारी संबंधी कार्यों पर व्यवस्थित रूप से अनुकूलन लागू किया जाना चाहिए, साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि मानवीय निर्णय और नागरिक के साथ संबंध के लिए समर्पित समय मात्रात्मक उत्पादकता के तर्क से पूर्णतः सुरक्षित रहे।
अनुच्छेद161 छद्म-लोकतंत्र का
संविधान द्वारा सुनिश्चित अभिव्यक्ति, परामर्श, जन-पहल, याचिका या नागरिक योगदान की प्रत्येक व्यवस्था ईमानदार, कार्यशील और भौतिक रूप से सुलभ होनी चाहिए।
प्रत्येक नागरिक योगदान का मूल्यांकन सबसे पहले उसकी वास्तविक प्रासंगिकता, ठोस उपयोगिता और सामान्य हित में उसके मूल योगदान की खोज पर आधारित होता है।
I. रूप पर प्रासंगिकता की प्राथमिकता
किसी नवोन्मेषी विचार या व्यवहारिक समाधान के अंतर्निहित मूल्य को छिपाने के लिए कोई औपचारिक मानदंड, पूर्वनिर्धारित मूल्यांकन-सारणी या पद्धतिगत बंधन लागू नहीं किया जा सकता।
II. प्रतिबंधात्मक व्यवस्थाओं की शून्यता और दिखावटी प्रक्रियाओं के विरुद्ध संघर्ष
ऐसा प्रत्येक विधायी, विनियामक, प्रशासनिक या तकनीकी प्रावधान शून्य और अमान्य माना जाता है जिसका उद्देश्य या प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष प्रभाव नागरिक भागीदारी को विकृत करना, अनुचित रूप से सीमित करना या उसे व्यवहारतः निष्प्रभावी बनाना हो। प्रत्यक्ष या व्युत्पन्न किसी भी प्रकार के छद्म-लोकतंत्र और भागीदारी के दिखावे के विरुद्ध संघर्ष सभी सार्वजनिक शक्तियों का संवैधानिक दायित्व है।
III. निषिद्ध कृत्रिम उपायों और प्रथाओं की सूची
प्रथम अनुच्छेद में घोषित प्रभावशीलता और प्रासंगिकता की प्राथमिकता के सामान्य सिद्धांत को प्रभावित किए बिना, जिसकी सीमा इस सूची से निर्धारित नहीं हो सकती, निम्न विशेष रूप से लोकतांत्रिक ईमानदारी के स्पष्ट उल्लंघन माने जाते हैं:
A. हस्ताक्षरों की सीमा, क्षेत्रीय वितरण, समय-सीमा या प्रक्रियात्मक औपचारिकताओं को इस प्रकार संयोजित करना कि नागरिक पहल अत्यधिक हतोत्साहित या व्यवहारतः असंभव हो जाए।
B. ऐसा कठोर या मताग्रही मूल्यांकन जो किसी मूल योगदान वाली प्रस्तावना को केवल इसलिए पहले ही अयोग्य ठहरा दे कि वह प्रशासनिक सारणी के पूर्वनिर्धारित मानदंडों पर खरी नहीं उतरती।
C. योगदान-स्थलों तक पहुँच को प्रतिबंधात्मक प्रशासनिक, कर या बैंक पहचान-पत्रों पर निर्भर करना, जिससे किसी निवासी या उपयोगी ज्ञान देने के इच्छुक व्यक्ति के लिए सरल और सार्वभौमिक पहुँच बाधित हो।
D. ऐसे सार्वजनिक परामर्श आयोजित करना जिनमें कारणयुक्त सार्वजनिक प्रतिवेदन, स्वतंत्र मूल्यांकन और परिणामों को विचार-विमर्श करने वाले निकायों के कार्यसूची में अनिवार्य रूप से रखने का बाध्यकारी ढाँचा न हो।
E. दमघोंटू समय-सीमाओं, अवकाश अवधियों में घोषणाओं या स्पष्ट रूप से अनुपातहीन समय-सीमाओं का उपयोग, जिससे लामबंदी, नागरिक विश्लेषण और विरोधी बहस बाधित हो।
F. सूचित मत के लिए आवश्यक कच्चे आँकड़ों, प्रभाव-अध्ययनों और वैकल्पिक परिदृश्यों को रोकना, असमान रूप से देना या आंशिक रूप से प्रसारित करना।
G. प्रश्नावलियों को बंद, द्विआधारी या निर्देशित ढाँचे में रखना, जिससे समस्या पर पुनःप्रश्न, दायरे का विस्तार या सार्वजनिक प्राधिकरण द्वारा पहले से न सोचे गए समाधान प्रस्तुत करना असंभव हो।
H. एल्गोरिदम, छँटाई प्रोटोकॉल या स्वचालित संश्लेषण उपकरणों की अपारदर्शिता जिन्हें सार्वजनिक रूप से ऑडिट नहीं किया जा सकता और जो भिन्न मतों के मनमाने बहिष्कार को बढ़ावा दें।
I. वास्तविक शक्ति-प्रत्यायोजन के बिना परामर्श आयोगों, समानांतर समितियों या सह-चयनित निकायों की बहुलता, जिसका उद्देश्य नागरिक ऊर्जा को खंडित या समाप्त करना हो।
J. सामान्य हित की किसी व्यावहारिक प्रस्तावना को केवल आंतरिक प्रशासनिक सीमाओं, अधिकार-विभाजन या पहले से मौजूद विनियामक अवरोधों के कारण प्रक्रियात्मक रूप से अस्वीकार करना।
IV. विषयवस्तु की जाँच और मानक-अनुकूलन की बाध्यता
प्रशासन का दायित्व है कि वह प्रत्येक नागरिक योगदान में उपयोगी तत्व पहचाने और निकाले। किसी योगदान को रूपगत दोष या संबंधित सेवा की अक्षमता के कारण अस्वीकार नहीं किया जा सकता: प्राप्तकर्ता प्राधिकरण स्वयं उसकी विषयवस्तु का पुनर्वर्गीकरण, वास्तविक योगदान के अनुसार विचार की जाँच और सक्षम सेवा को शीघ्र प्रेषण सुनिश्चित करता है। जब कोई प्रासंगिक समाधान वाली पहल किसी पूर्ववर्ती विनियामक नियम से टकराती है, तो सार्वजनिक शक्ति समाधान के कार्यान्वयन को संभव बनाने के लिए उस मानक के अनुकूलन, अपवादात्मक प्रयोग या निरसन की प्राथमिकता से जाँच करने के लिए बाध्य है।
V. न्यायिक दंड और निष्प्रभावी व्यवस्थाओं का पुनरीक्षण
कोई भी नागरिक या नागरिकों का समूह इस अनुच्छेद का उल्लंघन करने वाली किसी व्यवस्था, परामर्श, अनुचित अस्वीकृति या पाठ को घोषित और निरस्त कराने के लिए संवैधानिक या प्रशासनिक न्यायालय में जा सकता है। कोई वैधानिक भागीदारी तंत्र जो निर्धारित अवधि में अपने पहुँच-मानदंडों की कठोरता के कारण कोई ठोस प्रभाव उत्पन्न न करे, उसकी प्रतिबंधात्मक शर्तें स्वतः अप्रभावी हो जाती हैं और विधायिका द्वारा उसकी सीमाओं का तत्काल पुनरीक्षण किया जाता है।
अनुच्छेद171 राजनीतिक अनुरेखणीयता का
निर्वाचित जनादेश या कार्यपालिका पद धारण करने वाले व्यक्ति द्वारा की गई प्रत्येक प्रतिबद्धता, औपचारिक घोषणा, मतदान, प्रशासनिक दस्तावेज पर हस्ताक्षर या सार्वजनिक स्थिति को तुरंत राष्ट्रीय राजनीतिक अनुरेखणीयता रजिस्टर में दर्ज किया जाता है।
यह रजिस्टर अपरिवर्तनीय, अनुक्रमित अभिलेख है, जो किसी समयगत या तकनीकी प्रतिबंध के बिना सुलभ है।
I. दृश्य-श्रव्य अभिलेखों के प्रमाणीकरण और प्रसंस्करण का
राज्य संस्थागत स्मृति की पूर्णता सुनिश्चित करता है और वर्तमान तथा अतीत की दृश्य-श्रव्य रिकॉर्डिंग को विश्वसनीय पुनर्निर्माण और प्रतिलेखन के सार्वजनिक प्रोटोकॉल के अधीन करता है, जिसमें प्रमाणित स्वचालित होंठ-पठन भी शामिल है। इस प्रकार संसाधित प्रत्येक दस्तावेज के साथ उसकी भौतिक निश्चितता की श्रेणी और सत्यापित समय-मुद्रा जुड़ी होती है, तथा संदर्भ में कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता।
II. निर्णयगत दुर्घटना-विज्ञान प्रक्रिया का
किसी सार्वजनिक नीति की स्पष्ट विफलता, प्रणालीगत संकट या बड़े सामूहिक नुकसान की स्थिति में संस्थागत दुर्घटना-विज्ञान का एक स्वतंत्र आयोग स्वतः संज्ञान लेता है। औद्योगिक तकनीकी जाँच की भाँति वह दर्ज घोषणाओं, निर्णयों, पूर्व चेतावनियों और प्रतिलेखों से कारण-वृक्ष तैयार करता है, ताकि गणना की त्रुटि, बाहरी आकस्मिकता और संगति के जानबूझकर उल्लंघन में अंतर किया जा सके।
III. कार्यपालिका की संगति और जनादेश के पुनर्मूल्यांकन का
किसी पदाधिकारी की प्रारंभिक प्रतिबद्धताओं, क्रमिक सार्वजनिक घोषणाओं और वास्तविक अधिकारगत कार्यों के बीच कोई स्पष्ट और अनुचित अंतर सक्षम नियंत्रण प्राधिकरण के समक्ष उसकी राजनीतिक जिम्मेदारी उत्पन्न करता है। संबंधित पदाधिकारी को अपने निर्णय को निर्धारित करने वाले संदर्भगत परिवर्तन को स्पष्ट करने के लिए कारणयुक्त उत्तर का अधिकार है; अन्यथा पदच्युति या अयोग्यता संबंधी निकायों का स्वतः संज्ञान होता है।
IV. संज्ञानात्मक सुलभता और घोषणाओं की स्पष्टता का
निर्देश या विधायी प्रस्ताव का प्रभाव रखने वाला प्रत्येक राजनीतिक संचार मापनीय बोधगम्यता और तार्किक संगति के मानदंडों को पूरा करेगा। ऐतिहासिक अभिलेखों के पारस्परिक विश्लेषण से स्थापित सार्वजनिक भाषणों के विपरीत उद्देश्यों का छिपाव विचार-विमर्श की ईमानदारी की गणतांत्रिक शपथ का प्रत्यक्ष उल्लंघन है।
अनुच्छेद162 विदेशी अभिव्यक्ति और योगदान के अधिकार का
राष्ट्रीयता, भौगोलिक स्थिति या कानूनी स्थिति के भेद के बिना प्रत्येक मनुष्य को राष्ट्र द्वारा स्थापित विचारों, विश्लेषणों, व्यवहारिक ज्ञान और रचनात्मक आलोचनाओं के सार्वजनिक प्रस्तुति-स्थलों तक स्वतंत्र, प्रत्यक्ष और अप्रतिबंधित पहुँच प्राप्त है।
इन बौद्धिक और संज्ञानात्मक योगदानों का उद्देश्य सामूहिक चिंतन को समृद्ध करना, सार्वजनिक निर्णय को उसके बाहरी प्रभावों के बारे में स्पष्ट करना और साझा सूचनाओं की खुली विरासत बनाना है; इससे राष्ट्रीय निर्वाचक मंडल द्वारा विचारात्मक मतदान के विशिष्ट प्रयोग पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
अनुच्छेद139 सार्वजनिक संकेतकों की अखंडता का
सार्वजनिक संकेतक लोकतांत्रिक पारदर्शिता के गारंटर हैं।
प्रत्येक सार्वजनिक नीति, मूल्यांकन या निर्णय अनिवार्य रूप से ऐसे संकेतकों पर आधारित होना चाहिए जिन्हें संबंधित घटनाओं की अंतर्निहित वास्तविकता को उनकी जटिलता और विशिष्ट सूक्ष्मताओं सहित विश्वसनीय रूप से प्रकट करने के लिए निर्मित किया गया हो।
I. अंतर्निहित प्रासंगिकता की बाध्यता
ऐसे आंशिक, संकुचित या केवल घोषणात्मक संकेतकों का उपयोग कठोर रूप से निषिद्ध है जिनका प्रभाव मुद्दों की धारणा को विकृत करना हो।
II. अखंडता और आँकड़ों के हेरफेर के विरुद्ध संघर्ष
संकेतकों की रचना, प्रसंस्करण और प्रसार को किसी भी हेरफेर, पद्धतिगत साधनीकरण या निर्णायक चरों को छिपाने से संरक्षित किया जाता है। पद्धतियाँ, स्रोत आँकड़े और व्याख्यात्मक सीमाएँ प्रत्येक नागरिक द्वारा पूर्ण रूप से ऑडिट और सत्यापित किए जाने योग्य बनाई जाती हैं।
III. वैधता का ऑडिट और मापदंडों का पुनरीक्षण
कोई भी सार्वजनिक संकेतक जिसका उपयोग निष्प्रभावी, सीमा-प्रभावों से पक्षपाती या वास्तविक धरातलीय प्रभावों से विच्छिन्न सिद्ध हो, तत्काल विरोधी-पक्षीय पुनरीक्षण या कारणयुक्त अवनयन के अधीन होगा।
IV. सूचना-विकृति पर दंड
विकृत आँकड़ों या किसी खराबी को छिपाने के लिए निर्मित मापदंडों का जानबूझकर उपयोग सार्वजनिक कार्रवाई की सत्यनिष्ठा पर प्रत्यक्ष आघात है और उसके कर्ताओं की जिम्मेदारी उत्पन्न करता है।
अनुच्छेद6 बाह्य लोकतंत्र के विषय में
नागरिक परामर्श की प्रक्रियाओं की गारंटी अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं और प्रतिबद्धताओं तक भी दी जाती है।
गणराज्य की विदेश नीति संबंधी कार्रवाई तथा यूरोपीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में उसकी भागीदारी नागरिकों के निरंतर विचार-विमर्श के मूल सिद्धांत पर आधारित है।
I. अंतरराष्ट्रीय मंचों और परामर्शों तक समान पहुँच
सार्वजनिक प्राधिकरण नागरिकों को मौजूदा अधिराष्ट्रीय परामर्श प्रक्रियाओं, विशेषकर यूरोपीय प्रक्रियाओं, में समान पहुँच की गारंटी देते हैं; उनके प्रभावी उपयोग के लिए आवश्यक साधन उपलब्ध कराते हैं और उन्हें वास्तव में लागू करने में सक्रिय योगदान देते हैं।
II. जनता के विचार-विमर्श को कूटनीतिक प्रोत्साहन
राष्ट्रीय संस्थाओं का कर्तव्य है कि वे अंतरराष्ट्रीय संगठनों और सभी कूटनीतिक माध्यमों के जरिए ऐसी खुली विचार-विमर्श प्रक्रियाओं की स्थापना को सक्रिय रूप से बढ़ावा दें जो वैश्विक निर्णयों में जनता को सीधे शामिल करें।
III. वार्ता-अधिदेश का संयुक्त निर्माण और निरंतर पारदर्शिता
प्रत्येक अंतरराष्ट्रीय या यूरोपीय वार्ता-अधिदेश पर सभी नागरिकों के लिए सुलभ सतत सार्वजनिक परामर्श किया जाएगा। फ्रांस का प्रतिनिधित्व करने वाला प्राधिकरण इन विचार-विमर्शों द्वारा निर्धारित दिशानिर्देशों के अनुसार वार्ता करेगा।
IV. नागरिक नियंत्रण, अधिदेश में परिवर्तन और रोकने का अधिकार
वार्ता के किसी भी चरण में, जैविक कानून द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार गठित नागरिक निकाय वार्ताकारों को दिए गए अधिदेश की शर्तें बदल सकता है या सामूहिक दिशानिर्देशों से स्पष्ट असहमति होने पर राष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल की भागीदारी रोक सकता है।
V. अंतिम निर्णय और प्रतिबद्धताओं की लोकतांत्रिक पुष्टि
किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते या संधि पर अंतिम हस्ताक्षर और उसका अनुसमर्थन केवल सक्षम राष्ट्रीय प्राधिकरण करेंगे, बशर्ते पहले यह पुष्टि हो कि पाठ निरंतर परामर्श से निकली आवश्यकताओं के अनुरूप है, अथवा नागरिकों के प्रत्यक्ष मतदान का सहारा लिया जाए।
अनुच्छेद131 विधायी विज्ञान से मानक-प्रदर्शन तक
कानून का निर्माण राष्ट्र की सेवा में उच्च सटीकता वाला एक वैज्ञानिक अनुशासन है.
विधायी विज्ञान को एक जीवंत विज्ञान के रूप में मान्यता दी जाती है, जिसे कानून की प्रभावशीलता, सार्वजनिक कल्याण और नागरिक जीवन की सरलता सुनिश्चित करने के लिए निरंतर विकसित होना चाहिए।
I. विधायी गुणवत्ता और आवश्यकता-संदर्भ
प्रत्येक विधेयक या कानून-प्रस्ताव को संविधान, उसके परिशिष्टों और कार्यान्वयन-पाठों द्वारा निर्धारित सभी विधायी गुणवत्ता-मानदंडों को कठोर और सत्यापन योग्य रूप से पूरा करना होगा। इस संविधान से संलग्न मानदंड-सारणी कानून बनाने के लिए अपेक्षित प्रासंगिकता, कठोरता और व्यवस्थित पूर्णता की न्यूनतम आवश्यकता का उदाहरण है। यह सारणी विधायी विज्ञान द्वारा अपेक्षित सटीकता के स्तर का केवल एक नमूना है।
II. संदर्भ-मानक का अद्यतन और वैज्ञानिक विकास
राज्य विधायी दक्षताओं और विधियों के राष्ट्रीय संदर्भ-मानक का अनिवार्य वार्षिक अद्यतन सुनिश्चित करता है। प्रत्येक वर्ष कानून निर्माण में प्रयुक्त विश्लेषण-उपकरण, प्रारूपण तकनीकें, प्रदर्शन-मूल्यांकन मॉडल और तकनीकी प्रक्रियाएँ संशोधित तथा समृद्ध की जाएँगी ताकि विश्व की सर्वोत्तम वैज्ञानिक और व्यावहारिक खोजों को सम्मिलित किया जा सके।
III. रोकथाम की प्रधानता
रोकथाम प्रत्येक विधायी हस्तक्षेप का प्रथम सिद्धांत है। सुधारात्मक या दंडात्मक उपायों पर विचार करने से पहले किसी कानून के कम-से-कम आधे प्रावधान जोखिमों, संघर्षों और विचलनों की रोकथाम के लिए समर्पित होने चाहिए।
IV. योगदानात्मक मूल्यांकन और डैशबोर्ड
प्रत्येक कानून का मूल्यांकन देश की प्राथमिक समस्याओं के समाधान में उसके योगदान के आधार पर किया जाता है। उसे यह प्रदर्शित करना होगा कि गैर-बाध्यकारी समाधान अपर्याप्त हैं और समाज पर उसके वास्तविक प्रभावों की वास्तविक समय में निगरानी के लिए उसे राष्ट्रीय प्रदर्शन डैशबोर्ड के संकेतकों से सीधे जुड़ना होगा।
V. दक्षता और क्रियान्वयन-क्षमताओं का प्रदान
कानून संसाधनों और बाधाओं को कठोर न्यूनतम तक घटाकर अधिकतम दक्षता चाहता है। नागरिकों और उसके अनुप्रयोग के लिए उत्तरदायी पक्षों को अपेक्षित परिणाम प्राप्त करने की पूर्ण स्वतंत्रता देने हेतु आवश्यक सभी साधन, क्षमताएँ और सहायक अधिकार दिए बिना उन पर दायित्व थोपना निषिद्ध है।
VI. सामान्य सिद्धांत और विखंडन से इनकार
कानून प्राथमिक रूप से व्यापक और पूर्ण सामान्य सिद्धांतों के माध्यम से कार्य करता है और प्रत्येक समूह या परिस्थिति के लिए विशेष नियमों में विखंडन से स्वयं को रोकता है। यदि किसी उद्देश्य को अधिक व्यापक और पूर्ण सामान्य सिद्धांत द्वारा सुनिश्चित किया जा सकता है तो कोई विशिष्ट नियम नहीं अपनाया जा सकता। नियामक शक्ति केवल विशिष्ट डिक्री या तकनीकी आदेश द्वारा उन कार्यान्वयन मानकों को निर्धारित करती है जो कठोर रूप से अनिवार्य हों।
VII. सरलीकरण और मानक-विस्तार में कमी
प्रत्येक नया कानून उसी विषय से संबंधित पुराने कानूनों को पुनर्लेखित, सरल या समाप्त करने का दायित्व उत्पन्न करता है और प्रत्येक नई बाध्यता के बदले कम-से-कम दो मौजूदा बाध्यकारी प्रावधान हटाए जाते हैं। यदि नया पाठ जोड़ने की तुलना में मौजूदा पाठ को संशोधित करना सरल हो तो विधायिका पुराने कानून के पुनरीक्षण को प्राथमिकता देगी। किसी पाठ को अपनाने का परिणाम लागू कानूनों के कुल आयतन में अनिवार्य शुद्ध कमी होना चाहिए।
VIII. सहभागी अभियांत्रिकी और प्रतिकूलता-परीक्षण
कानून के निर्माण में सभी उपयोगी साधनों की भागीदारी आवश्यक है, विशेष रूप से नागरिकों की प्रत्यक्ष भागीदारी, अभियांत्रिकी विज्ञान, क्षेत्रीय पेशेवरों की विशेषज्ञता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपकरण और विदेशी कानूनों का व्यवस्थित विश्लेषण। किसी भी मतदान से पहले पाठ को चकमा देने की विधियों के विशेषज्ञों द्वारा मूल्यांकन-परीक्षण के अधीन किया जाएगा ताकि उसकी कमियों की पहचान और सुधार हो सके।
IX. तत्काल प्रत्यक्षता और परिचालन पूर्णता
प्रत्येक प्रख्यापित कानून प्रकाशन के साथ तुरंत लागू होता है। कार्यान्वयन डिक्री या नियामक अधिनियम का अभाव किसी भी स्थिति में कानून के क्रियान्वयन को रोक, विलंबित या निलंबित नहीं कर सकता। दायित्व उत्पन्न करने वाली प्रत्येक परियोजना को अपनी पूर्ण परिचालन शृंखला परिभाषित करनी होगी, जिसमें सटीक मापन-सीमाएँ, तकनीकी नियंत्रण प्रोटोकॉल, शपथबद्ध प्राधिकारी, प्रमाण की प्रकृति, अपीलों का क्रम और दंड की राशि शामिल हों।
X. वितरित कार्यान्वयन प्रोटोकॉल
केंद्रीय प्रशासन द्वारा कार्यान्वयन-पाठ प्रकाशित करने में विलंब होने पर स्थानीय निकायों, पेशेवर संगठनों और सार्वजनिक सेवा संस्थाओं को कानून के अनुरूप अस्थायी कार्यान्वयन प्रोटोकॉल सार्वजनिक डिजिटल मंच पर जमा करने की अनुमति है। यह जमा प्रक्रिया धरातल पर नियम का तत्काल अनुप्रयोग सुनिश्चित करती है और अंतिम राष्ट्रीय पाठ के त्वरित लेखन को सामग्री प्रदान करती है।
XI. स्वतः निष्प्रभाविता और प्रदर्शन-नियंत्रण
यदि राष्ट्रीय डैशबोर्ड से किए गए मापन दिखाते हैं कि कोई कानून सभी प्रदर्शन-मानदंडों को पूरा नहीं करता या अपने उद्देश्यों को प्राप्त नहीं करता, तो वह निष्प्रभावी हो जाता है और तुरंत प्रभाव उत्पन्न करना बंद कर देता है।
XII. विचारार्थ नवाचार-संग्रह और उन्नत अभियांत्रिकी प्रस्ताव
A. शासन और रणनीतिक अभिमुखता
राष्ट्रीय योगदान-अंश का मापन। वर्तमान कानून में स्थिति: कोई मात्रात्मक अनुपात नहीं। परिचालन दायरा: लाभ-जोखिम अनुपात का अनिवार्य गणितीय मूल्यांकन, जिसमें 98 प्रतिशत से अधिक शुद्ध संतुलन की आवश्यकता तथा राष्ट्र की जीवन-महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं में पाठ के मापनीय योगदान का आकलन शामिल है।
B. कार्रवाई का दर्शन और क्रियान्वयन की गारंटियाँ
न्यूनतम 50 प्रतिशत सीमा के लिए रोकथाम की प्रधानता। वर्तमान कानून में स्थिति: कोई प्रारूपण कोटा नहीं। परिचालन दायरा: सुधार या दंड के उपायों का सहारा लेने से पहले पाठ और प्रावधानों का कम-से-कम आधा भाग जोखिमों और संघर्षों की रोकथाम को समर्पित करने का दायित्व।
क्षमताओं और सहायक कार्य-स्वतंत्रताओं का अधिकार। वर्तमान कानून में स्थिति: गारंटीकृत नहीं। परिचालन दायरा: पक्षों को संरचनात्मक अवरोध के बिना अपने दायित्व निभाने के लिए आवश्यक पहल की स्वतंत्रता, सहायक अधिकार और निर्णय की गुंजाइश एक साथ प्रदान करना।
C. परिचालन क्रियान्वयन और प्रत्यक्षता
तत्काल प्रत्यक्षता और डिक्री द्वारा अवरोध का निषेध। वर्तमान कानून में स्थिति: अस्तित्वहीन; कानून अक्सर अपनी डिक्री के बिना लागू नहीं हो पाता। परिचालन दायरा: प्रत्येक पारित कानून प्रकाशन के साथ तुरंत प्रभावी होता है। मंत्रालयी कार्यान्वयन डिक्री का अभाव किसी भी स्थिति में अधिकारों के प्रयोग या दायित्वों के अनुप्रयोग में बाधा नहीं बन सकता।
दायित्व, मापन, नियंत्रण और दंड सहित परिचालन शृंखला की पूर्णता। वर्तमान कानून में स्थिति: कानून और अनेक डिक्री के बीच विखंडित। परिचालन दायरा: कानून के मूल पाठ में मापदंड और सहनशीलता-सीमाएँ, प्रमाणित मापन उपकरण, शपथबद्ध अधिकारी, समय-मुद्रित डिजिटल प्रमाण, नियमितीकरण की समय-सीमाएँ, दंड-सारणी और समर्पित बजटीय संसाधनों सहित पूरी शृंखला सम्मिलित करने का दायित्व।
वितरित कार्यान्वयन प्रोटोकॉल और पंजीकरण मंच। वर्तमान कानून में स्थिति: केंद्रीय कार्यपालिका के एकाधिकार के कारण अस्तित्वहीन। परिचालन दायरा: निर्धारित अवधि में राज्य का कार्यान्वयन-पाठ न होने पर स्थानीय निकाय, शाखाएँ या क्षेत्रीय संस्थाएँ सार्वजनिक डिजिटल मंच पर अस्थायी कार्यान्वयन प्रोटोकॉल दर्ज कर सकती हैं, जिससे तत्काल अनुप्रयोग सुनिश्चित हो और अंतिम राष्ट्रीय डिक्री के निर्माण को सामग्री मिले।
D. लचीलापन और अभिकल्पना अभियांत्रिकी
पूर्व-प्रतिकूलता परीक्षण और रेड टीमिंग। वर्तमान कानून में स्थिति: पूर्व चरण में औपचारिक नहीं। परिचालन दायरा: मतदान से पहले विधेयक को धोखाधड़ी और चकमा देने की विधियों के विशेषज्ञों की समिति के समक्ष अनिवार्य रूप से प्रस्तुत करना ताकि कमियों की पहचान और पूर्ति की जा सके।
बहु-अभिकर्ता संवर्धित सह-अभिकल्पना। वर्तमान कानून में स्थिति: मॉडलिंग के बिना पारंपरिक परामर्शों के रूप में आंशिक। परिचालन दायरा: नागरिकों, प्रणाली अभियांत्रिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा अंतःक्रियाओं के अनुकरण को जोड़ने वाली सहभागी प्रारूपण-पद्धति।
मैट्रिक्स अपरिवर्तनीयता और मूल सिद्धांत की प्रधानता। वर्तमान कानून में स्थिति: श्रेणीगत और क्षेत्रीय कानूनों की वृद्धि के कारण लागू नहीं। परिचालन दायरा: जब अधिक व्यापक सामान्य सिद्धांत बनाया जा सकता हो तब व्यक्तियों या वस्तुओं की श्रेणियों के लिए विशिष्ट कानून बनाने का निषेध। विधायिका का दायित्व है कि उच्च-स्तरीय नियम को इतना पूर्ण बनाए कि वह सभी विशेष मामलों को समाहित कर सके और केवल क्रियान्वयन मानकों को तकनीकी विशिष्ट डिक्री पर छोड़े।
E. गतिशील सरलीकरण और प्रदर्शन-अनुवीक्षण
मानक-समूह में समग्र शुद्ध कमी। वर्तमान कानून में स्थिति: अनौपचारिक उद्देश्य। परिचालन दायरा: प्रत्येक विधायी हस्तक्षेप का परिणाम संबंधित क्षेत्र में शब्दों और अनुच्छेदों की कुल मात्रा में सत्यापन योग्य शुद्ध कमी होना अनिवार्य है।
राष्ट्रीय डैशबोर्ड द्वारा संचालित स्वतः निष्प्रभाविता। वर्तमान कानून में स्थिति: अस्तित्वहीन। परिचालन दायरा: यदि राष्ट्र के डैशबोर्ड के संकेतक किसी कानून की विफलता या अप्रभावशीलता दर्ज करते हैं तो उसका स्वतः और तत्काल विधिक अंत।
विधायी विज्ञान का वार्षिक संवैधानिक अद्यतन। वर्तमान कानून में स्थिति: लंबे अंतराल पर संशोधित प्रशासनिक मार्गदर्शिका। परिचालन दायरा: विधायी विज्ञान को जीवंत संवैधानिक विज्ञान का दर्जा देना और राज्य की दक्षताओं तथा विधियों के संदर्भ-मानक का वार्षिक अद्यतन अनिवार्य करना।
XIII. विधायी मार्गदर्शिका और सकारात्मक कानून से प्राप्त आधिकारिक राज्य-संग्रह
A. मानक का दायरा और औचित्य
मानक की आवश्यकता और सॉफ्ट लॉ का उपयोग। स्थिति: स्पष्ट। कानूनी आधार: 15 अप्रैल 2009 का ऑर्गेनिक कानून संख्या 2009-403, अनुच्छेद 8। परिचालन दायरा: बाध्यकारी कानून का सहारा लेने से पहले यह प्रदर्शित करने का दायित्व कि चार्टर, सिफारिशें, बाजार-विनियमन या सॉफ्ट लॉ जैसे गैर-मानक साधन स्पष्ट रूप से अपर्याप्त हैं।
B. संरचना और कानूनी सुरक्षा
मानकों का स्तरीकरण और आरक्षित क्षेत्र का सम्मान। स्थिति: स्पष्ट। कानूनी आधार: संविधान के अनुच्छेद 34 और 37। परिचालन दायरा: कानून के लिए आरक्षित मूल सिद्धांतों से लेकर नियामक शक्ति को सौंपे गए क्रियान्वयन तरीकों तक अवरोही पदानुक्रम का सम्मान।
पूर्ण अधिकारिता और नकारात्मक अक्षमता का निषेध। स्थिति: निहित। कानूनी आधार: संविधान के अनुच्छेद 34 से व्युत्पन्न संवैधानिक परिषद का न्यायशास्त्र। परिचालन दायरा: विधायिका द्वारा अस्पष्ट शब्दावली के उपयोग या नागरिकों को दी गई आवश्यक गारंटियों के निर्धारण को प्रशासन को सौंपने का निषेध।
मानक प्रभाव का अभाव और विधायी शब्दाडंबर का निषेध। स्थिति: निहित। कानूनी आधार: मानव और नागरिक अधिकारों की घोषणा का अनुच्छेद 6 तथा विद्यालय अभिमुखीकरण कानून से संबंधित 2004 का संवैधानिक न्यायशास्त्र। परिचालन दायरा: बाध्यकारी कानूनी शक्ति से रहित आशय-घोषणाओं, राजनीतिक इच्छाओं या उद्घोषणाओं का व्यवस्थित निषेध और बहिष्कार।
संक्रमण, गैर-पूर्वव्यापीता और पूर्वसूचना की गारंटी। स्थिति: निहित। कानूनी आधार: कानून के सामान्य सिद्धांत और 2006 के KPMG निर्णय द्वारा राज्य परिषद का न्यायशास्त्र। परिचालन दायरा: प्रभावी होने की तिथियों का कठोर नियमन, पूर्वव्यापीता का निषेध और पक्षों के वैध विश्वास की रक्षा के लिए संक्रमणकालीन व्यवस्थाओं की गारंटी।
C. प्रदर्शन, पद्धति और सरलीकरण
दो-के-बदले-एक नियम के अनुसार नियामक प्रतिपूर्ति। स्थिति: स्पष्ट। कानूनी आधार: 26 जुलाई 2017 का प्रधानमंत्री परिपत्र। परिचालन दायरा: नागरिक समाज या स्थानीय निकायों पर लगाई गई प्रत्येक नई नियामक बाध्यता के लिए कम-से-कम दो मौजूदा मानकों को समाप्त या हल्का करने का दायित्व।
प्रभाव-संकेतक और क्रियान्वयन-अनुवीक्षण। स्थिति: स्पष्ट। कानूनी आधार: 5 जून 2019 का परिपत्र, LOLF और LOLFSS। परिचालन दायरा: धरातल पर परिणामों की प्राप्ति का मूल्यांकन करने के लिए पाठ की अभिकल्पना के समय से ही कम-से-कम पाँच पठनीय और मापनीय प्रभाव-संकेतक सम्मिलित करने का दायित्व।
बाह्य विश्लेषण और तुलनात्मक कानून का अध्ययन। स्थिति: स्पष्ट। कानूनी आधार: 15 अप्रैल 2009 का ऑर्गेनिक कानून संख्या 2009-403, अनुच्छेद 8। परिचालन दायरा: त्रुटिपूर्ण व्यवस्थाओं को पुनः आविष्कृत करने से बचने के लिए विदेशी विधानों और कानूनी इतिहास का अनिवार्य व्यवस्थित विश्लेषण।
गतिविधियों पर प्रतिबंधों की आनुपातिकता। स्थिति: स्पष्ट। कानूनी आधार: यूरोपीय निर्देश 2005/36/CE, 24 अप्रैल 2023 का परिपत्र। परिचालन दायरा: पूर्व औपचारिक परीक्षण यह सुनिश्चित करता है कि किसी पेशे तक पहुँच की विनियमित शर्तें अनुपातहीन बाधाएँ न बनें।
अनुच्छेद133 नियंत्रण-बुद्धिमत्ता की बाध्यता का
सार्वजनिक शक्ति रोकथाम, नियंत्रण और संगठनात्मक पर्यवेक्षण की व्यवस्थाओं की रचना, तैनाती और पुनरीक्षण में बुद्धिमत्ता, दक्षता और अनुकूलनशीलता की बाध्यता के अधीन है।
जब विश्लेषण से पता चले कि कोई प्रबंधन प्रोटोकॉल, प्रशासनिक सीमा या प्रक्रियात्मक बाध्यता अपनी रचना के कारण धोखाधड़ी, गतिविधि का दिखावा, नौकरशाही अतिभार या विचलन उत्पन्न करती है, तो सार्वजनिक शक्ति का कर्तव्य है कि वह उसके तत्काल पुनर्गठन या समाप्ति का आदेश दे।
I. प्रोत्साहनों और अपराध-उत्पादक संरचनाओं के नियंत्रण का
नियंत्रण कार्य का प्रयोग सार्वजनिक और निजी संस्थाओं को संचालित करने वाले संगठनात्मक नियमों के आलोचनात्मक मूल्यांकन तक विस्तृत है। नियंत्रण केवल अनुचित आचरण को दंडित नहीं करता; वह उन विकृत प्रोत्साहनों, शक्ति-असमानताओं और अनावश्यक औपचारिक जटिलताओं की पहचान कर उन्हें निष्प्रभावी करता है जो अनैतिकता, हितों के कब्जे या सेवा की गिरावट को बढ़ावा देती हैं।
II. नियंत्रण की कार्यात्मक द्वैतता का
नियंत्रण कार्य का प्रयोग उद्देश्य के कठोर विभेद के अनुसार किया जाता है:
1° जानबूझकर किए गए आचरण के संबंध में नियंत्रण एक अनुकूलनशील शक्ति है जिसका उद्देश्य छिपाव, धोखाधड़ी और अधिकार-दुरुपयोग की रणनीतियों को तोड़ना है;
2° उच्च जोखिम या उच्च प्रणालीगत जटिलता वाली गतिविधियों में नियंत्रण अभियांत्रिकी-सहयोग के रूप में किया जाता है, जो संरचनाओं के सरलीकरण, कमजोरियों के प्रबंधन, सुरक्षा की पुनरावृत्ति और त्रुटि-सीमाओं के वैज्ञानिक निर्धारण पर केंद्रित होता है; संगठनात्मक ढाँचे की विफलता से उत्पन्न कमियों को स्वचालित रूप से अपराध मानने का कोई तर्क इसमें शामिल नहीं होगा।
V. उच्च दुर्घटना-विज्ञान एवं निदान निकाय के विशेषाधिकारों का
एक उच्च दुर्घटना-विज्ञान एवं निदान निकाय स्थापित किया जाता है, जो बजटीय स्वायत्तता और स्वतंत्र जाँच शक्तियों से युक्त स्वतंत्र संवैधानिक प्राधिकरण है। इसका मिशन किसी भी दुर्घटना, बड़े पैमाने की धोखाधड़ी, नौकरशाही खराबी या सुरक्षा-विफलता का वैज्ञानिक विश्लेषण करना, उसके भौतिक, कानूनी या संगठनात्मक कारणों को अलग करना तथा संबंधित प्रशासन और विधायकों के लिए बाध्यकारी सिद्धांतगत पुनरीक्षण और संरचनात्मक सरलीकरण के आदेश जारी करना है।
VI. खुले प्रयोगशाला और नागरिक योगदानों के एकीकरण का
उच्च दुर्घटना-विज्ञान निकाय में राजनीतिक बुद्धिमत्ता की एक खुली प्रयोगशाला शामिल होती है, जो नागरिकों, शिक्षक-शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों या क्षेत्रीय व्यावसायिकों से प्राप्त किसी भी चेतावनी, अध्ययन, प्रशासनिक निरर्थकता के निष्कर्ष या सुधार प्रस्ताव को प्राप्त करने, जाँचने और मूल्य देने के लिए अधिकृत है। संगठनात्मक नियमों के शुद्धीकरण हेतु सामाजिक निकाय से प्राप्त आँकड़ों का एकीकरण राज्य का स्थायी दायित्व है।
VII. नियंत्रण अधिकारियों की जिम्मेदारी और आचारनीति का
नियंत्रण अधिकार से युक्त कर्मचारी योग्यता, निष्पक्षता, अनुरेखणीयता और आचारनीति के कठोर नियमों के अधीन हैं। पारिश्रमिक या प्रोत्साहन की कोई व्यवस्था दिए गए दंडों की संख्या या उत्पन्न प्रक्रियाओं की मात्रा से नहीं जोड़ी जा सकती। निरीक्षण शक्तियों का प्रयोग सावधानीपूर्वक विनियमित किया जाता है ताकि किसी भी विचलन, मनमानी या अधिकार-अतिक्रमण को रोका जा सके।
अनुच्छेद134 उद्देश्यों और साधनों की प्रासंगिकता का
सार्वजनिक कार्रवाई एक समग्र परियोजना की अभिव्यक्ति है, जो अपने उद्देश्यों की उच्चतर प्रासंगिकता के अनुसार व्यवस्थित होती है।
इसका मूल्यांकन उसकी रचना में लगाई गई दृष्टिकोण-बुद्धिमत्ता के आधार पर किया जाता है, जो रणनीतिक दृष्टि, सामरिक चुस्ती और संबंधपरक विनियमन को जोड़ती है तथा केवल उपकरणों की तकनीकीता और जुटाए गए संसाधनों की मात्रा पर प्रधानता रखती है। राष्ट्र के लाभ हेतु स्पष्ट प्रभाव-लक्ष्यों और मापनीय प्रणालीगत परिणामों को निर्धारित किए बिना कोई तकनीकी, प्रशासनिक या बजटीय परिवर्तन आरंभ नहीं किया जा सकता।
I. उत्कृष्ट अभिकल्पना की प्राथमिकता और साधनों की मितव्ययिता
सार्वजनिक धन, प्रशासनिक क्षमताओं और कानूनी बाध्यताओं के आवंटन में उचित अनुपात उत्कृष्ट अभिकल्पना से उत्पन्न होता है। सार्वजनिक कार्रवाई अवसंरचना की अति, नियमों के संचय, क्षयकारी बल-प्रयोग या केवल तकनीकी माध्यमों के प्रतिस्थापन की तुलना में उच्च वैचारिक घनत्व, अभियांत्रिकी की कठोरता, प्रक्रियाओं की उपयोग-सुविधा और निवारक हस्तक्षेप को प्राथमिकता देती है।
II. चिंतनशील और द्विदिश नियंत्रण का सिद्धांत
सार्वजनिक कार्रवाई की क्रियान्वयन-श्रृंखला उपयुक्तता के ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर नियंत्रण के सिद्धांत के अनुसार संगठित होती है। प्रत्येक परिचालन स्तर चुनी गई दृष्टिकोण-बुद्धिमत्ता की परीक्षा का निकाय है। किसी उपाय के अनुप्रयोग में पाई गई लापरवाही, उपयोग-सुविधा की अक्षमता या अनुचित जटिलता प्रारंभिक अभिकल्पना की अमान्यता की धारणा उत्पन्न करती है और पदानुक्रम के शीर्ष को पाठ या परियोजना का पुनरीक्षण करने के लिए बाध्य करती है।
III. उपयुक्तता की गारंटी और निरर्थकता पर दंड
निम्न में से कोई भी सार्वजनिक व्यवस्था वैचारिक लापरवाही से दूषित मानी जाती है और उसकी मानक वैधता या बजटीय वैधता समाप्त होती है:
1° जिसमें प्रयुक्त साधन, तकनीक या उपकरण को स्वयं उद्देश्य बना दिया गया हो;
2° जिसकी परिचालन व्यवस्थाएँ और प्रक्रियात्मक बोझ समाधान की जाने वाली समस्या की सरलता की तुलना में अनुपातहीन हों;
3° जो मूल कारणों की अनदेखी, पूर्वानुमान की कमी या खराबी के निवारक परिहार के अभाव द्वारा दृष्टिकोण-बुद्धिमत्ता की कमी दर्शाती हो;
4° जो असंतुलन के मूल कारणों पर राजनीतिक और प्रणालीगत नियंत्रण के स्थान पर उसके प्रभावों के लेखांकन-प्रबंधन को रखती हो।
IV. अंतर्निहित परामर्श और प्रदर्शनगत अखंडता
कानूनों और प्रशासनिक कार्यों की अनुरूपता का नियंत्रण बुद्धिमत्ता की निरंतरता और सुरक्षा-उपायों की पारस्परिकता के आधार पर किया जाता है। समग्र प्रदर्शन उस अंतर्निहित परामर्श से उत्पन्न होता है जिसमें भौतिक आधार दृष्टिकोण-बुद्धिमत्ता की प्रासंगिकता को सत्यापित करता है, और श्रृंखला की किसी भी कड़ी पर उपयुक्तता का टूटना पूरे कार्य को अमान्य कर देता है।
अनुच्छेद135 स्थायी गुणात्मक नियंत्रण और बजटीय साधनों की जाँच का
बजटीय सुविधा की सहज प्रवृत्ति समाप्त किए बिना सार्वजनिक कार्रवाई में प्रासंगिकता नहीं हो सकती।
I. स्थायी मूल्यांकन का सिद्धांत
पिछले अनुच्छेद में निर्धारित प्रासंगिकता और मितव्ययिता की आवश्यकताओं का पालन सुनिश्चित करने के लिए राज्य प्रशासन और सार्वजनिक सेवाओं की विधियों तथा संगठन का निरंतर मूल्यांकन किया जाता है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य समान वित्तीय और भौतिक संसाधनों के भीतर प्रदान की गई सेवा की गुणवत्ता, प्रक्रियाओं की सरलता और कठिनाइयों की रोकथाम को निरंतर बेहतर बनाना है।
II. किसी भी साधन-माँग की पूर्वशर्त
बजटीय ऋण में कोई वृद्धि, रोजगार का कोई सृजन या अतिरिक्त भौतिक साधनों का कोई आवंटन इस गुणात्मक मूल्यांकन के दस्तावेजीकृत निष्कर्ष पर आधारित हुए बिना न माँगा जा सकता है और न दिया जा सकता है। पहले यह प्रदर्शित करना आवश्यक है कि विधियों में सुधार, प्रक्रियाओं का सरलीकरण और मौजूदा संसाधनों का पुनर्विन्यास आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
III. परिस्थितिजन्य माँगों की अस्वीकार्यता
इस निरंतर मूल्यांकन के ढाँचे से बाहर की गई बजटीय साधनों या कर्मचारियों की कोई माँग, अथवा केवल ऐसी अचानक कठिनाई के आधार पर की गई माँग जिसे पूर्व कार्यों द्वारा दस्तावेजीकृत नहीं किया गया हो, स्वतः अस्वीकार्य है।
IV. प्रबंधन-दोष की धारणा
किसी सार्वजनिक सेवा की गिरावट या संसाधनों की कमी का ऐसा दावा जिसे नियमित मूल्यांकनों में संकेतित नहीं किया गया हो, पूर्वानुमान या संगठन की कमी से उत्पन्न माना जाता है। इससे संबंधित सेवा के प्रबंधन का तत्काल पुनरीक्षण, समान बजटीय सीमा के भीतर, आवश्यक हो जाता है।
अनुच्छेद136 रणनीतिक बुद्धिमत्ता की बाध्यता और चिंतन-रूपरेखाओं की संगति का
मताग्रही निष्पक्षता और उच्च रणनीतिक बुद्धिमत्ता सार्वजनिक कार्रवाई की पूर्वशर्तें हैं। निर्णय को वैचारिक पक्षपात से मुक्त करके राजनीति विचार की स्वतंत्रता की रक्षा करती है और राज्य की वास्तविक दक्षता की परिस्थितियाँ सुनिश्चित करती है।
सार्वजनिक नीतियों का निर्माण रणनीतिक बुद्धिमत्ता और दीर्घकालिक दृष्टि से निर्देशित होता है। राष्ट्र की मूल दिशाओं की परिभाषा हर समय भौतिक साधनों की तैनाती और क्रियान्वयन की तात्कालिकता पर प्राथमिकता रखती है।
I. प्रणालीगत चिंतन और पक्षों की बहुलता
सार्वजनिक कार्रवाई की रचना समाज की विविध क्षमताओं को जोड़ने वाले समग्र और एकीकृत दृष्टिकोण पर आधारित होती है। वह निर्णय के प्रत्येक क्षेत्र को अलग इकाई के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और मानवीय पारिस्थितिकी तंत्र के अविभाज्य घटक के रूप में समझती है।
II. निर्णय-रूपरेखाओं की स्पष्टता
राज्य के निर्णयकारी निकाय उन चिंतन-रूपरेखाओं, तर्क-पद्धतियों और प्रतिनिधित्व-मॉडलों को स्पष्ट और पारदर्शी बनाने के लिए बाध्य हैं जिन पर उनके विकल्प आधारित हैं। किसी सार्वजनिक निर्णय की वैधता उसके बौद्धिक निर्माण की कठोरता और स्पष्टता पर आधारित होती है।
III. आध्यात्मिक एकीकरण और राज्य का मेटा-मॉडल
सार्वजनिक कार्रवाई नैतिक और मानसिक उन्नयन की ऐसी अपेक्षा से प्रेरित होती है जो किसी भी धार्मिक विचार से मुक्त हो। वह ऐसे समग्र मॉडल में स्थित होती है जो ज्ञान और शासन के सभी क्षेत्रों में राज्य के चिंतन की परस्पर संबद्धता, संगति और निरंतरता सुनिश्चित करता है।
अनुच्छेद177 नियम से उत्पन्न उत्तरदायित्व
विधायी दोष से ग्रस्त किसी नियम को तैयार या अनुमोदित करने वाले लेखक और निर्णयकर्ता प्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी होते हैं।
किसी भी नियम की रचना उसके लेखकों पर यह संवैधानिक कर्तव्य डालती है कि वे उसकी अभिकल्पना के लिए उपयोगी सभी वैज्ञानिक, अनुभवजन्य, सामाजिक और तकनीकी संसाधनों की खोज, परामर्श और समावेशन करें।
I. गुणात्मक प्रदर्शन
मानक के साथ ऐसा दस्तावेज होना चाहिए जो प्रदर्शित करे कि सभी विकल्पों का अध्ययन किया गया है और अंतिम निर्णय उपलब्ध ज्ञान की स्थिति के अनुसार सबसे उपयुक्त समाधान है।
II. विधायी दोष का निर्धारण
किसी कानून को खराब रूप से अभिकल्पित माना जाता है यदि यह सिद्ध हो कि उसके लेखकों ने जानबूझकर प्रासंगिक संसाधनों को बाहर रखा, उसके प्रभावों के पूर्व अध्ययन की उपेक्षा की, या आँकड़े एकत्र करने में स्पष्ट अक्षमता के साथ कार्य किया। स्थापित तथ्यों की अनदेखी या अनुचित जल्दबाजी नियम के निर्माता की कानूनी त्रुटि मानी जाती है।
III. मानकगत लापरवाही की आरोपणीयता और प्रतिपूर्ति
यह त्रुटि उनके पद के लिए तत्काल अयोग्यता और नए मानकों के लेखन में भाग लेने पर प्रतिबंध उत्पन्न करती है।
अनुच्छेद105 कार्यान्वयन के न्यायसंगत अधिकार का
राज्य को किसी राजनीतिक विचार की गतिशील अखंडता की गारंटी देनी चाहिए, ताकि उसका परिचालनात्मक मूर्त रूप उसकी प्रारंभिक शक्ति को बदलने के बजाय उसे बढ़ाए।
कोई भी सार्वजनिक मानक अपने अधिनियमन से लेकर उसकी पूर्णता तक अपनी सिद्धि-क्षमता में कमी नहीं सह सकता।
I. प्रस्तावक की कार्यकारी जिम्मेदारी
प्रस्ताव का लेखक उसके पूरे कार्यान्वयन के दौरान कार्यान्वयन-श्रृंखला की निष्ठा का गारंटर बना रहता है।
II. प्रतिरोधों का तत्काल सुधार
विचार के मूल मूल्य में ह्रास उत्पन्न करने वाली प्रत्येक संरचना या प्रत्येक पक्ष तत्काल सुधार करने के लिए बाध्य है।
III. प्रणालीगत सहक्रिया और प्रवर्धन
कार्यान्वयन का प्रत्येक चरण गुणक प्रभाव वाली कार्रवाइयों के संयोजन और संसाधनों की अनुकूलता द्वारा समग्र दक्षता बढ़ाएगा।
अनुच्छेद152 व्यापक संयम का
गणराज्य संयम को राष्ट्र के प्रबंधन का मूल नियम बनाता है।
गणराज्य अपने विकास मॉडल को स्वायत्तता, होमियोस्टैटिक संतुलन और साझा संपदाओं के कठोर संरक्षण पर आधारित करता है। वह उस उत्पादकतावादी तर्क को अस्वीकार करता है जो निरंतर नए उत्पादन-प्रवाह उत्पन्न करता या भूमि, ऊर्जा और कच्चे माल की खपत को अनिश्चितकाल तक बढ़ाता है। सामूहिक कार्रवाई का लक्ष्य अभावों का अंत और मूल संतुलनों की स्थायित्व है; राष्ट्र की सुरक्षा और जीविका सुनिश्चित हो जाने पर सार्वजनिक शक्ति विस्तार रोकने के दायित्व का पालन करती है और जीवन-परिवेशों के विश्राम की रक्षा करती है।
I. सूचना की पारिस्थितिकी और ज्ञान का मूल्यवर्धन
सूचना और ज्ञान रणनीतिक संसाधन हैं, जिनका स्वस्थ प्रबंधन सामूहिक निर्णयों की शुद्धता निर्धारित करता है। राज्य सूचना-प्रदूषण, संज्ञानात्मक अतिभार और अनावश्यक या अव्यवस्थित आँकड़ों की वृद्धि के विरुद्ध संघर्ष की गारंटी देता है। मौजूदा ज्ञान-संग्रहों की कठोर संरचना, ज्ञान की अंतर-संचालनीयता और उसकी सार्वभौमिक सुलभता की एर्गोनॉमिक्स को अनावश्यक पुनरावृत्त आँकड़ों के उत्पादन की अंधी दौड़ पर प्राथमिकता दी जाती है।
II. समय और मानवीय क्षमता की अक्षुण्णता
मानवीय बर्बादी का उन्मूलन राष्ट्र का मूल कर्तव्य है। बाध्य निष्क्रियता, कृत्रिम माँगों द्वारा सामूहिक ध्यान का क्षरण, निष्फल प्रक्रियाओं द्वारा जीवन-समय का अधिग्रहण और वास्तविक उपयोगिता से रहित कार्यों को बनाए रखना साझा हित पर प्रत्यक्ष आघात माना जाता है। सामाजिक और आर्थिक संगठन नागरिकों पर थोपी गई घर्षण को न्यूनतम करता है और व्यक्तिगत उन्नति, स्वास्थ्य, नागरिक संबंध तथा सृजन के लिए उनका समय मुक्त करता है।
III. दक्षता-लाभों का पुनःआवंटन
बेहतर वास्तुशिल्पीय, तकनीकी या संगठनात्मक डिजाइन से प्राप्त दक्षता-लाभों को समग्र अतिउपभोग बढ़ाने या व्यक्तियों और संसाधनों पर माँग की गति तेज करने के लिए मोड़ा नहीं जा सकता। उन्हें प्राथमिक रूप से राष्ट्र के भौतिक पदचिह्न को घटाने, पारिस्थितिक तंत्रों के पुनर्जीवन और व्यक्तियों पर कार्यभार कम करने में लगाया जाता है।
स्तर 4: गतिशीलताएँ
सूचना-प्रवाह और सामूहिक बुद्धिमत्ता
अनुच्छेद7 संवाद करना जानने के अधिकार और कर्तव्य के बारे में
समाज प्रत्येक व्यक्ति को मानवीय संचार की कलाओं की पूरी समृद्धि सीखने, खोजने और उसमें निपुण होने का अधिकार देता है; साथ ही राज्य, राजनीतिक नेतृत्व और सार्वजनिक संस्थानों पर नागरिकों के साथ संबंधों में इन कलाओं की दक्षता विकसित करने का दायित्व डालता है।
मानवता ने विभिन्न संस्कृतियों और युगों में अर्थ पहुँचाने, समझने, साझा करने और निर्मित करने के असाधारण विविध तरीके विकसित किए हैं। कौशल की यह विरासत आज परंपराओं, व्यवसायों, विज्ञानों और सामाजिक प्रथाओं में बिखरी हुई है। इसे पुनर्जीवित करना, इसका अध्ययन करना, इसे समृद्ध बनाना और सबके लिए सुलभ करना आवश्यक है।
I. संचार के सभी रूप
संचार केवल बोलना, लिखना या तर्क देना नहीं है। मनुष्य वाणी और श्रवण, कथा और संवाद, स्वर और मौन, दृष्टि और संकेत, शरीर और गति, चित्र और प्रतीक, वस्तु और वस्त्र, ध्वनि और लय, स्थान और दूरी, स्थल और वास्तुकला, समय और चुने हुए अवसर, कार्य और उदाहरण, संबंध और अनुष्ठान, भावना और इंद्रियों, स्मृति और चिह्नों तथा प्रस्तुति और मंचन के माध्यम से संचार करता है।
संचार का उद्देश्य सूचना देना, समझाना, समझ पैदा करना, प्रश्न करना, सीखना, ज्ञान पहुँचाना, कहानी सुनाना, याद रखना, स्वागत करना, सुनना, सलाह देना, सहमत कराना, असहमति जताना, बातचीत से समझौता करना, शांत करना, मेल-मिलाप कराना, सहयोग करना, जाँच करना, निर्णय लेना, संबंध बनाना, ज्ञान का निर्माण करना या सामूहिक बुद्धिमत्ता उत्पन्न करना हो सकता है। ये क्षमताएँ साधारण भी हो सकती हैं और कई संचार माध्यमों को एक साथ जोड़ने वाली जटिल कलाएँ भी बन सकती हैं।
II. संचार करना जानने का अधिकार
प्रत्येक नागरिक को संचार की इस शक्ति को क्रमशः सीखने का अधिकार है। इसलिए शिक्षा केवल भाषा, भाषण, लेखन या संचार प्रौद्योगिकियों के उपयोग तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उसे स्वयं को व्यक्त करने, दूसरों को समझाने, संदेश ग्रहण करने और समझने, अर्थ खोलने, प्रश्न करने, विचारों का सामना कराने, जाँच करने, सहयोग करने और दूसरों के साथ मिलकर निर्माण करने के विविध तरीकों को आजमाने और उनमें दक्ष होने के अवसर देने चाहिए।
शिक्षा यह पहचानना भी सिखाती है कि कोई संचार व्यक्ति पर किस प्रकार प्रभाव डालने की कोशिश करता है; सूचना, व्याख्या, मनाने के प्रयास और हेरफेर में अंतर कैसे किया जाए; परस्पर विरोधी संदेशों की तुलना कैसे की जाए; और अपने स्वतंत्र विवेक को कैसे सुरक्षित रखा जाए।
III. संचार करना जानने का दायित्व
नागरिक के इस अधिकार के अनुरूप सत्ता पर भी उतना ही व्यापक दायित्व है। राजनीतिक प्रतिनिधियों, प्रशासन और सार्वजनिक संस्थानों को नागरिकों को सुनने, उनकी परिस्थितियाँ समझने, समझाने, वास्तविक समझ विकसित करने, परामर्श करने, संवाद करने, जानकारी पहुँचाने, विषयों पर चर्चा आयोजित करने, समाधान खोजने और सामूहिक बुद्धिमत्ता संगठित करने के लिए आवश्यक संचार कलाओं को जानना, विकसित करना और अपनाना चाहिए।
सूचना देना हमेशा संचार करना नहीं होता, और संचार करना हमेशा समझ पैदा करना नहीं होता। इसलिए संस्थान को अपने श्रोताओं की वास्तविक समझ सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिए और व्यक्तियों, परिस्थितियों तथा उद्देश्यों के अनुरूप संचार के रूप चुनने चाहिए। इस शक्ति का उपयोग नागरिकों के स्वतंत्र विवेक को कमजोर करने के लिए नहीं किया जा सकता: कोई संस्था संचार की कला में जितनी अधिक दक्ष हो, उसे अपने इरादे, अनिश्चितताएँ, तर्क और प्रभाव डालने के तरीके उतने ही स्पष्ट करने चाहिए।
IV. संचार कलाओं की विश्व विरासत
संचार की कलाएँ मानवता की जीवित विरासत हैं। इन्हें समकालीन ज्ञान में भी और इतिहास तथा विश्व की विविध संस्कृतियों में विकसित प्रथाओं में भी खोजा जाना चाहिए: मौखिक परंपराएँ, संवाद और विचार-विमर्श के रूप, कथा और स्मृति की कलाएँ, शारीरिक और इंद्रियगत अभ्यास, मध्यस्थता, समारोह, प्रस्तुतियाँ, प्रतीक प्रणालियाँ, सहयोग के रूप और सामूहिक ज्ञान-निर्माण की विधियाँ।
इन ज्ञान-परंपराओं की अंधानुकरण के लिए नहीं, बल्कि मानव अनुभव के विशाल भंडार के रूप में आवश्यकता है, जिन्हें समझा, तुलना की, प्रयोग में लाया, अनुकूलित किया और नए रूपों में लगातार विकसित किया जाना चाहिए।
V. संचार के लिए स्थान
संचार की शक्ति के अभ्यास के लिए स्थान भी चाहिए। वास्तुकला और नगर-योजना को ऐसे विविध अवसर और स्थल बढ़ाने चाहिए जहाँ लोग मिल सकें, सुन सकें, संवाद कर सकें, विचार प्रस्तुत कर सकें, बहस कर सकें, ज्ञान बाँट सकें, प्रस्तावों की तुलना कर सकें, विवाद सुलझा सकें या सामूहिक रूप से विचार कर सकें। सड़क पर प्रदर्शन और बंद कमरे में बैठक सामूहिक अभिव्यक्ति की वास्तुकला का पूरा स्वरूप नहीं हो सकते। संचार की कला विकसित करने वाला समाज संचार के नए स्थान भी रचता है।
VI. अभिव्यक्ति से आदान-प्रदान तक
अंततः, अभिव्यक्ति का अवसर देना पर्याप्त नहीं है यदि उस संचार को ग्रहण करने की कोई व्यवस्था न हो। संस्थानों को ऐसी प्रक्रियाएँ बनानी चाहिए जिनसे नागरिकों की बातें, प्रश्न, प्रस्ताव और ज्ञान सुने जाएँ, आगे पहुँचाए जाएँ, परस्पर जाँचे जाएँ और, जहाँ विषय की प्रकृति उचित ठहराए, उनका उत्तर दिया जाए।
इस प्रकार संचार करना जानने का अधिकार और संचार करना जानने का दायित्व एक ही आकांक्षा के दो पहलू हैं: मानवता द्वारा खोजी गई संचार क्षमताओं का पूरा विस्तार नागरिकों और सार्वजनिक सत्ता, दोनों को वापस उपलब्ध कराना, तथा उन्हें नई क्षमताएँ खोजते रहने में समर्थ बनाना।
अनुच्छेद174 राष्ट्रीय मॉडलिंग का
राज्य एक दृश्य मॉडलिंग इंटरफ़ेस उपलब्ध कराता है जिससे राष्ट्र के संचालन को एक समग्र अभियांत्रिकी तंत्र के रूप में समझा जा सके। यह एर्गोनॉमिक मंच सभी सार्वजनिक आँकड़ों को अंतःक्रियात्मक ग्राफ़िक प्रस्तुतियों में बदलता है और पूरे क्षेत्र में गतियों तथा अंतःक्रियाओं की जटिलता को पठनीय बनाता है।
I. वास्तविक समय में प्रदर्शन
इंटरफ़ेस समाज से गुजरने वाले गतिशील प्रवाहों को प्रदर्शित करता है, चाहे वे जनसांख्यिकीय आंदोलनों में परिवर्तन हों, सार्वजनिक स्वास्थ्य आँकड़ों का विकास, परिवहन अवसंरचनाओं पर भार या ऊर्जा वितरण।
II. विस्तृत प्रदर्शन
नागरिक देश के प्रत्येक घटक के व्यवहार को उस स्तर की सूक्ष्मता से देखता है जो जटिल प्रणालियों के डिजाइन में प्रयुक्त डिजिटल मॉडल के तुल्य है।
III. प्रणालीगत सहसंबंधों का प्रदर्शन
यह विभिन्न प्रकृति के मानकों को एक-दूसरे पर आरोपित करने की सुविधा देता है ताकि उनकी परस्पर निर्भरताएँ सामने आएँ। कार्यस्थल स्वास्थ्य संकेतकों के उतार-चढ़ाव को किसी आर्थिक क्षेत्र के विकास के साथ दृश्य रूप से जोड़ा जा सकता है, या आंतरिक प्रवासन गतिशीलता पर नियोजन नीति के प्रभाव का विश्लेषण किया जा सकता है, ताकि वास्तविक कारणात्मक संबंध पहचाने जा सकें।
IV. हस्तक्षेप की संभावना
यह नागरिकों, विशेषज्ञों और निर्णयकर्ताओं को एक ही साझा संदर्भ मॉडल पर कार्य करने देता है। सभी परिकल्पनाओं का अनुकरण कर सकते हैं, राज्य के समस्त तंत्र पर किसी परिवर्तन के प्रभाव को देख सकते हैं और समन्वित तथा पारदर्शी ढंग से राजनीतिक समाधान तैयार कर सकते हैं।
अनुच्छेद180 सक्रिय लोकतंत्र का सिद्धांत
गणराज्य की संप्रभुता प्रत्येक नागरिक को सार्वजनिक निर्णय को समझने, मूल्यांकन करने और सुधारने की सुनिश्चित क्षमता पर आधारित है।
राज्य, संस्थाओं और सभी राजनीतिक पक्षों का संवैधानिक दायित्व है कि वे इस भागीदारी को पूर्णतः प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक बौद्धिक, भौतिक और प्रशिक्षण-संबंधी साधन उपलब्ध कराएँ।
I. प्रणालीगत स्पष्टता और बाधाओं के निष्प्रभावीकरण का
राज्य का कर्तव्य है कि लोकतांत्रिक चुनाव को हर प्रकार की अपारदर्शिता या कृत्रिम जटिलता से बचाए। किसी नागरिक को सार्वजनिक तंत्रों, राष्ट्रीय मुद्दों या प्रस्तावित कार्यक्रमों की समझ से वंचित नहीं किया जा सकता। सार्वजनिक शक्तियों को भागीदारी की बाधाएँ—विशेषतः दलगत वक्तव्यों की अव्यवस्था, विवादों की अधिकता और विशेषज्ञता तक पहुँच की असमानता—निष्प्रभावी करनी होंगी। प्रत्येक सार्वजनिक संचार पूर्ण बोधगम्यता की आवश्यकता को पूरा करेगा।
II. सक्षमता-वर्धक साधनों और नागरिक प्रशिक्षण का
सूचित भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए संस्थाएँ तटस्थ मॉडलिंग और तुलना उपकरण विकसित कर उपलब्ध कराती हैं। राज्य नागरिक और विश्लेषणात्मक प्रशिक्षण का सार्वभौमिक अधिकार स्थापित करता है, जिससे प्रत्येक व्यक्ति सार्वजनिक नीतियों को समझने के लिए आवश्यक कौशल प्राप्त कर सके। इन व्यवस्थाओं का कार्य वास्तविकता की जटिलता को उसकी शुद्धता या गहराई बदले बिना उपयोगी आँकड़ों में रूपांतरित करना है।
III. राजनीतिक जनादेश के सहयोगात्मक रूपांतरण का
यह सहायता-दायित्व निर्वाचित प्रतिनिधियों और राजनीतिक संगठनों पर कठोरता से लागू होता है। प्रत्येक राजनीतिक पक्ष का कर्तव्य है कि वह दलगत संघर्षों से ऊपर उठकर सामूहिक बुद्धिमत्ता का सहायक बने। उसे पारदर्शी सूचना और खुले कार्य-ढाँचे देने होंगे ताकि कोई भी नागरिक प्रस्तावों की प्रासंगिकता और रचनात्मकता बढ़ाने में योगदान दे सके। राजनीतिक संवाद का लक्ष्य वितरित बुद्धिमत्ता द्वारा समस्याओं का समाधान होना चाहिए।
IV. लोकतांत्रिक समय की प्राथमिकता का
राष्ट्र के प्रतिनिधियों द्वारा दलगत टकराव में लगाया गया समय नागरिकों के साथ सहयोगात्मक कार्य के समय के अधीन है। निर्वाचित प्रतिनिधियों का दायित्व है कि वे सह-सृजन और नागरिक अभियांत्रिकी के स्थान संचालित करें, क्योंकि जनता का योगदान किसी राजनीतिक विचार को व्यवहार्य समाधान में बदलने की अनिवार्य शर्त है।
V. जवाबदेही और सद्भावना के मूल्यांकन का
किसी निर्वाचित प्रतिनिधि या संस्था की नागरिक इच्छा को शिक्षित करने, साधन देने और समाहित करने की क्षमता उसके जनादेश के मूल्यांकन का प्रमुख मानदंड है। किसी परियोजना को स्पष्टता की इस प्रक्रिया में प्रस्तुत करने से इनकार, मीडिया की हलचल के पीछे मुद्दों को छिपाने की इच्छा, या सक्षमता-वर्धक साधन देने में अक्षमता संस्थागत सद्भावना का उल्लंघन है। ऐसे उल्लंघन संबंधित परामर्शों को शून्य करते हैं और लोकतांत्रिक विनियमन संस्थाओं के समक्ष उनके कर्ताओं की जिम्मेदारी उत्पन्न करते हैं।
अनुच्छेद146 उम्मीदवारों की सुगम तुलना का
राज्य प्रत्येक नागरिक को एक संरचित, व्यापक, विरोधी दृष्टिकोणों को समाहित करने वाली और निष्पक्ष सूचना-व्यवस्था तक पहुँच की गारंटी देता है, जिससे राजनीतिक व्यक्तित्वों, उनकी व्यक्तिगत विशेषताओं और उनकी परियोजनाओं का मूल्यांकन किया जा सके।
I. राज्य नागरिक परीक्षण-मंच के रूप में निर्मित सार्वभौमिक जीवंत तुलना-व्यवस्था लागू करता है। यह प्रणाली केवल वादों को साथ रख देने से आगे बढ़कर राजनीतिक प्रस्तावों की संरचना, परिचालन दृढ़ता और वास्तविक व्यवहार्यता का पद्धतिगत विश्लेषण करती है।
II. संस्थागत व्यवस्था और नागरिक अंतःक्रिया
स्वतंत्र सार्वजनिक प्राधिकरण परीक्षण-मंच के निरंतर प्रयोग की निगरानी करता है।
संस्थागत प्रसारण-स्थलों और आधिकारिक प्रसारण-समय को अनिवार्य रूप से इन अक्षों के अनुसार व्यवस्थित किया जाता है, जिससे विषय-वस्तु की स्पष्ट व्याख्या आवश्यक हो और सतही विवादों की ओर विचलन रोका जा सके।
तत्काल स्पष्टीकरण और समान दृश्यता का अधिकार प्रत्येक उम्मीदवार को अप्रमाणित तथ्यों पर आधारित अस्थिर करने के प्रयासों से बचाता है।
एक निष्पक्ष, संवादात्मक और सुगम डिजिटल मंच प्रत्येक नागरिक को मूल्यांकन-मानदंडों को संचालित करने, वस्तुनिष्ठ आँकड़ों की तुलना करने और पूर्ण स्वतंत्रता से अपना संप्रभु निर्णय निर्मित करने देता है।
III. जाँच और तुलनात्मक परीक्षण के अक्षों तथा मानदंडों के उदाहरण
A. मानवीय आयाम और व्यक्तिगत क्षमता के अक्ष
आशय और अर्थ का अक्ष: गहरी प्रेरणाओं की सत्यनिष्ठा, नैतिक अभिप्रेरणा, अनुसरण किए गए दार्शनिक या आध्यात्मिक उद्देश्य तथा दलगत हितों पर सामान्य हित को दी गई प्राथमिकता।
प्रणालीगत क्षमता का अक्ष: जटिल संदर्भों की समझ, व्यावहारिक अनुभव, बौद्धिक कठोरता और रणनीतिक निर्णय की स्पष्टता।
ऊर्जा और सहनशक्ति का अक्ष: शारीरिक और मानसिक जीवंतता, प्रतिकूलता के सामने लचीलेपन की शक्ति और सत्ता का भार दीर्घकाल तक वहन करने की क्षमता।
सदाचार और व्यक्तिगत संगति का अक्ष: पूर्व कार्यों, घोषित मूल्यों और वर्तमान प्रतिबद्धताओं के बीच सत्यापित अनुरूपता तथा हितों के टकराव के सामने आदर्श आचरण।
B. कार्यक्रमगत अभियांत्रिकी के अक्ष और तुलनात्मक परीक्षण-मंच की कार्यप्रणाली
दबाव में क्रैश-टेस्ट का अक्ष: कार्यक्रम को भू-राजनीतिक संकट, ऊर्जा-विच्छेद, स्वास्थ्य आपातकाल या वित्तीय तनाव जैसे अनुकरणित बाहरी झटकों के अधीन रखकर अप्रत्याशित परिस्थितियों में मॉडल की संरचनात्मक मजबूती मापने वाला प्रतिरोध-परीक्षण।
संरचना के लेबलिंग और अनुरेखण का अक्ष: वास्तविक योगदानकर्ताओं, प्रभाव-वृत्तों, हित-समूहों और राजनीतिक प्रस्ताव के लेखकों का पारदर्शी मानचित्रण, जिससे परियोजना की सटीक संरचना प्रकट हो।
अनुरूपता और वक्तृत्वगत पैकेज हटाने का अक्ष: शुद्ध विपणन-सज्जा के तत्वों को पद्धतिगत रूप से हटाकर किसी उपाय के आकर्षक नाम की तुलना उसकी वास्तविक कानूनी, तकनीकी और बजटीय वास्तविकता से करना।
व्यवहार्यता और उपयोग-सुगमता का अक्ष: प्रशासनिक वास्तविकताओं के सामने धरातल पर ठोस लागू होने की क्षमता तथा नागरिकों द्वारा सीधे समझे और अपनाए जाने के लिए सुधारों की पठनीयता का मूल्यांकन।
लोकतांत्रिक मरम्मत-क्षमता और मतदानोत्तर सेवा का अक्ष: आवधिक पुनरीक्षण धाराओं, स्वयं परिभाषित सफलता-सूचकों और कार्यकाल के दौरान पाए गए अवांछित दुष्प्रभावों की स्थिति में त्वरित सुधार-तंत्रों की उपस्थिति।
C. शासन, संगठन और पद्धति के अक्ष
सहयोगी पद्धति और सामूहिक बुद्धिमत्ता का अक्ष: विरोधी मत सुनने, विविध प्रतिभाओं को जोड़ने, विवेकपूर्ण ढंग से अधिकार सौंपने और मजबूत सहमति बनाने की क्षमता।
अधिकार के प्रयोग और साझेदारी का अक्ष: विकेंद्रीकरण की इच्छा, निर्णयों में पारदर्शिता का अभ्यास और राज्य के विशेषाधिकारों के किसी भी अधिनायकवादी अधिग्रहण से इनकार।
क्रियान्वयन-पद्धति का अक्ष: सार्वजनिक नीतियों के प्रबंधन की कठोरता, कार्यान्वयन समय-सारिणी पर नियंत्रण और तंत्रगत जड़ता को पार करने की क्षमता।
D. सिद्धांतगत परिप्रेक्ष्य और ऐतिहासिक आधार के अक्ष
दृष्टि-विस्तार का अक्ष: दीर्घकालीन बड़े परिवर्तनों का पूर्वानुमान करने की क्षमता, चाहे वे सभ्यतागत, तकनीकी, जलवायु संबंधी या जनसांख्यिकीय हों।
स्मृति और तुलनात्मक गहराई का अक्ष: परियोजना की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ऐतिहासिक उदाहरणों से तुलना, जिससे पिछली सफलताओं और विफलताओं से सीखे गए पाठों को मापा जा सके।
प्राथमिक परिवर्तनों का अक्ष: उम्मीदवार द्वारा स्वीकार किए गए संरचनात्मक कार्यक्षेत्रों और निर्णायक बदलावों की स्पष्ट पहचान।
E. आलोचनात्मक मुक्ति और संज्ञानात्मक जाल-विरोधी अक्ष
चपलता और नवाचार का अक्ष: नए आँकड़ों के सामने अपनी निश्चितताओं पर प्रश्न उठाने की क्षमता, वास्तविक नवाचार-क्षमता को आश्वस्तकारी पुनरावृत्ति की रूढ़िवादी प्रवृत्ति से अलग करते हुए।
वाक्पटुता और सत्यनिष्ठा के बीच विवेक का अक्ष: मंचीय वक्तृत्व-प्रतिभा को परिचालन या नैतिक दृढ़ता से पद्धतिगत रूप से अलग करना।
जड़ता को उजागर करने का अक्ष: चुनावी अवसरवाद या अनुरूपतावाद के कारण टाले गए कॉरपोरेट हितों, वर्जनाओं और संस्थागत अवरोधों को प्रकाश में लाना।
तनाव में प्रतिक्रिया का अक्ष: जटिल दुविधाओं और संकट-परिस्थितियों के सामने नैतिक तथा निर्णयात्मक व्यवहार का अवलोकन।
F. प्रक्रियात्मक सावधानी, बहस के शुद्धीकरण और शोर घटाने के अक्ष
दंडात्मक प्रमाण के कठोर प्रशासन का अक्ष: सार्वजनिक संदर्भ-व्यवस्था में अफवाहों या न्यायिक प्रक्रिया से बाहर के आरोपों को शामिल करने का निषेध। निर्दोषता की धारणा का सम्मान करते हुए केवल औपचारिक कार्यवाहियाँ और अंतिम दोषसिद्धियाँ दर्ज की जाती हैं।
विफलता से सीखने के मूल्यांकन का अक्ष: अतीत की असफलताओं और परीक्षाओं को अर्जित अनुभव तथा विकसित परिपक्वता की दृष्टि से देखना, न कि स्वतः बहिष्कृत करने वाले कलंक के रूप में।
निजी जीवन की अभेद्यता का अक्ष: प्रमाणित हित-संघर्ष या कानून के उल्लंघन को छोड़कर निजी क्षेत्र और सार्वजनिक मूल्यांकन के बीच कठोर पृथक्करण।
निष्ठापूर्ण संदर्भीकरण का अक्ष: काटे गए या मूल संदर्भ से अलग किए गए वक्तव्यों के कालविरुद्ध राजनीतिक उपयोग से इनकार।
अनुच्छेद129 अखंड और तार्किक शासन का
राज्य का कर्तव्य है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को तर्क में होने वाली किसी भी जानबूझकर या अनजाने विकृति से बचाए।
राष्ट्र की संप्रभुता जनता की सूचित सहमति पर आधारित है, जो सही सूचना, तर्कसंगत विश्लेषण और सद्भावनापूर्ण सार्वजनिक विचार-विमर्श से निर्मित होती है।
I. सार्वजनिक तर्क परिषद
एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय के रूप में सार्वजनिक तर्क परिषद स्थापित की जाती है। परिषद तर्क-दोषों और राजनीतिक हेरफेर की सूची तैयार करने, बनाए रखने और प्रकाशित करने के लिए उत्तरदायी है। यह सूची सूचना और तर्क की विकृति के संज्ञानात्मक या रणनीतिक तंत्रों का दस्तावेजीकरण करती है। इसमें सार्वजनिक विमर्श और नीति-निर्माण में पहचाने गए तार्किक कुतर्कों, संज्ञानात्मक पूर्वाग्रहों तथा वक्तृत्व और मनोवैज्ञानिक हेरफेर की विधियों का व्यापक वर्गीकरण शामिल होगा।
II. परिषद की संरचना
परिषद में ऐसे शोधकर्ता, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक, सांख्यिकीविद् और विधिवेत्ता शामिल होते हैं जो अपनी सत्यनिष्ठा के लिए मान्य हों। सदस्यों की नियुक्ति सार्वजनिक परामर्श के बाद एक गैर-नवीकरणीय कार्यकाल के लिए होती है, जिससे राजनीतिक दलों और वर्तमान सरकारों से उनकी स्वतंत्रता सुनिश्चित हो।
III. राजनीतिक निर्णयों का प्रशिक्षण और मूल्यांकन
संस्थाएँ, दल और उम्मीदवार अपने संचार में इस सूची का संदर्भ लेने के लिए बाध्य हैं। राज्य सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों और वरिष्ठ अधिकारियों के लिए आलोचनात्मक चिंतन का अनिवार्य प्रशिक्षण स्थापित करता है। प्रत्येक प्रमुख प्रस्ताव के लिए तर्क की दृढ़ता पर प्रभाव का विश्लेषण परिषद को प्रस्तुत किया जाता है, जो सार्वजनिक मत जारी करती है।
IV. पारदर्शिता और उत्तरदायित्व
यह सूची विद्यालयों और मीडिया में प्रसारित एक सार्वजनिक शैक्षिक संसाधन है। यह राजनीतिक वक्तव्यों की विश्वसनीयता के नागरिक मूल्यांकन का आधार बनती है।
V. सद्भावना के उल्लंघनों की सूची
सार्वजनिक मामलों के संचालन में सद्भावना के सिद्धांतों का बार-बार उल्लंघन और तथ्यों का सिद्ध हेरफेर, जैसा परिषद द्वारा दस्तावेजीकृत हो, गंभीर दोष माना जाता है। यह सूचना सार्वजनिक की जाती है और राजनीतिक उत्तरदायियों की पात्रता में विचार की जा सकती है।
अनुच्छेद145 प्रणालीगत स्पष्टता का
संस्थाओं का कर्तव्य है कि वे अपनी कार्रवाई की प्रणालियों का ग्राफ़िक, सुलभ और समग्र रूप प्रस्तुत करें, जिससे नागरिक सार्वजनिक तर्कों को समझ सकें और उनके संरचनात्मक सुधार के लिए ठोस कार्रवाई कर सकें।
संस्थाओं, उनकी निर्णय प्रक्रियाओं और उनकी अंतःक्रियाओं की बोधगम्यता एक संवैधानिक बाध्यता है।
I. सार्वजनिक संगठन का ग्राफ़िक रूपांतरण
राज्य के अंग, प्रशासन और सार्वजनिक निकाय अपने संगठन, निर्णय-मार्गों और कार्रवाई-प्रवाहों को सभी के लिए सुलभ ग्राफ़िक और गतिशील मॉडल के रूप में प्रस्तुत करने के लिए बाध्य हैं।
II. संज्ञानात्मक विज्ञान और एर्गोनॉमिक्स का एकीकरण
इन दृश्य प्रस्तुतियों में संज्ञानात्मक विज्ञान, सूचना एर्गोनॉमिक्स और जटिल प्रणालियों की मॉडलिंग के उन्नत सिद्धांत शामिल होने चाहिए।
III. निर्णय-श्रृंखलाओं और कार्यप्रवाहों की स्पष्टता
वे केवल पदानुक्रमिक नामावली तक सीमित न रहकर वास्तविक निर्णय-श्रृंखलाओं, कार्यात्मक तर्कों, मूल्यांकन मानदंडों और कार्यप्रवाहों को स्पष्ट करती हैं।
IV. एकीकृत सार्वजनिक इंटरफ़ेस और निरंतर अद्यतन
ये सभी मानचित्र एक एकीकृत सार्वजनिक इंटरफ़ेस पर उपलब्ध कराए जाते हैं, जो समग्र स्तर से संचालन इकाइयों तक सहज नेविगेशन सुनिश्चित करता है। संस्थाएँ संरचनात्मक अनुकूलन के निरंतर उद्देश्य से इन मॉडलों को लगातार अद्यतन करती हैं।
V. उपयोग और सुधार का नागरिक अधिकार
प्रत्येक नागरिक को इन दृश्य मॉडलों का स्वतंत्र उपयोग करने, अपारदर्शिता या अक्षमता के क्षेत्रों की सूचना देने और समर्पित हस्तक्षेप माध्यमों द्वारा संस्थागत संरचना में सुधार के प्रस्ताव प्रस्तुत करने का अधिकार है।
अनुच्छेद142 राजनीतिक ढाँचे की उत्पादकता का
राजनीतिक कार्य की अमूर्त प्रकृति और अंतर्निहित व्यक्तिपरकता को निष्क्रियता या संस्थागत परजीविता का बहाना नहीं बनाया जा सकता।
राष्ट्र मानता है कि प्रत्येक सार्वजनिक उत्तरदायी उच्च वास्तुशिल्पीय और वैचारिक डिजाइन से लेकर तत्काल तकनीकी और संचालनात्मक समाधान तक जटिलता के विभिन्न स्तरों पर कार्य कर सकता है, किंतु यदि वह यह दायित्व ग्रहण करता है तो उसे इस उत्पादकता का प्रमाण देना होगा।
I. क्षमताओं की सर्वव्यापी मान्यता
संस्थागत संगठन को इन विविध भूमिकाओं को महत्व देना चाहिए, बिना दीर्घकालिक वैचारिक चिंतन और क्षेत्रीय भौतिक निष्पादन के बीच गरिमा का कोई कृत्रिम पदानुक्रम बनाए।
II. स्वतंत्र परिपक्वता और ऊष्मायन विधियों की सुरक्षा
वैचारिक, विधायी या प्रणालीगत निर्माण के लिए मानसिक शांति और संज्ञानात्मक स्वतंत्रता की परिस्थितियाँ आवश्यक हैं। चिंतनशील भ्रमण, सांस्कृतिक अवगाहन, मनन और एकांत के चरण वैध और आवश्यक कार्य-पद्धतियाँ हैं। गहन चिंतन पर बंद भौतिक उपस्थिति या कृत्रिम नौकरशाही समय-सारिणी की कोई बाध्यता नहीं लगाई जा सकती।
III. दोपहर के भोजन की सुरक्षा और भोजन के समय सामूहिक कार्य का निषेध
दोपहर का भोजन शारीरिक पुनर्जीवन, संज्ञानात्मक विच्छेद और अविच्छेद्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता का समय है। भोजन के समय बैठकें, सामूहिक विचार-विमर्श सत्र या औपचारिक कार्य गतिविधियाँ आयोजित करना, बुलाना या थोपना कठोर रूप से निषिद्ध है। सार्वजनिक भोजन का अनौपचारिक सौदेबाजी, बंद समूहवाद या उत्पादकता के प्रदर्शन के लिए उपयोग निषिद्ध है।
IV. प्रस्तुत कार्यों के मूल्य-घनत्व द्वारा उत्पादकता का मापन
सार्वजनिक कार्रवाई की उत्पादकता का मूल्यांकन उपस्थिति के समय या सूक्ष्म कार्यों की मात्रा से नहीं, बल्कि सार्वजनिक मंच पर जमा प्रस्तुत कार्यों के मूल्य-घनत्व से किया जाता है।
वैचारिक स्तर पर यह मूल नियमों, निवारक मॉडलों और दीर्घकाल में उच्च प्रभाव वाली प्रणालीगत संरचना के निर्माण में प्रकट होती है।
तकनीकी स्तर पर यह समस्याओं के ठोस समाधान, रसद संबंधी निर्णयों और संचालनात्मक अभियांत्रिकी के प्रस्तुत कार्यों में व्यक्त होती है।
इस वास्तविक उत्पादन का आकलन प्रत्येक पक्ष के लिए कार्य-स्थितियों और आवंटित साधनों को निरंतर अनुकूलित करने में उपयोग होता है।
V. सूचना-उपज और सामूहिक समय की सीमा
सार्वजनिक धन से वित्तपोषित प्रत्येक सामूहिक निकाय, कार्य बैठक या आयोग की अवधि उसके एजेंडा के अनुपात में कठोर रूप से सीमित होगी। उसे तुलनात्मक विश्लेषण, निर्णय अभिलेख या विचार-संश्लेषण जैसे औपचारिक और उपयोगी प्रस्तुत कार्य अनिवार्य रूप से उत्पन्न करने होंगे और उन्हें तत्काल सार्वजनिक करना होगा।
VI. गोपनीयता का नियमन और अनिवार्य औचित्य
कार्य या विचार-विमर्श की गोपनीयता, विशेषतः कूटनीतिक वार्ताओं या रणनीतिक सुरक्षा में, पारदर्शिता के सिद्धांत का असाधारण अपवाद है। गोपनीयता के प्रत्येक उपयोग को एक आधिकारिक सार्वजनिक घोषणा द्वारा उचित ठहराया जाएगा, जिसमें उसका दायरा, सामान्य हित के उद्देश्य, अनुमानित अवधि और उत्तरदायी प्राधिकरण निर्दिष्ट हों।
अनुच्छेद168 आर्थिक विकास का
समुदाय द्वारा आर्थिक संस्थाओं को प्रदान किया गया विधिक व्यक्तित्व मानव गरिमा के सम्मान में उनके सक्रिय योगदान के अधीन है, जो राष्ट्र की संज्ञानात्मक और शारीरिक क्षमता के उन्नयन और संरक्षण द्वारा व्यक्त होता है; मानव क्षमताओं का विकास ही आर्थिक समृद्धि का एकमात्र वैध और टिकाऊ प्रेरक माना जाता है।
I. मानवीय थकावट के हस्तांतरण का निषेध
ऐसी कोई भी वित्तीय संरचना या विनिवेश रणनीति असंवैधानिक है जिसका प्रत्यक्ष या इच्छित प्रभाव मानवीय थकावट की लागत को सार्वजनिक बजट या राष्ट्रीय एकजुटता पर स्थानांतरित करना हो और इस प्रकार व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो।
II. राज्य की दूरदर्शी भूमिका और प्रतिस्थापनकारी बाध्यता का निषेध
उत्पादक संस्थाओं के अल्पकालिक दृष्टिकोण के सामने दीर्घकाल का संरक्षक होने के नाते केवल राज्य का दायित्व है कि वह नवाचार के विकल्प के रूप में समय या बजट संबंधी बाध्यता के उपयोग को निषिद्ध करे; सार्वजनिक शक्ति का प्रदर्शन नागरिकों की मुक्तिदायी जटिलता और संप्रभु गरिमा को बढ़ाने की उसकी अपरिहार्य क्षमता से मापा जाता है।
अनुच्छेद4 मानवीय समृद्धि के बारे में
गणराज्य विश्व की भाषाई विविधता और कलात्मक संवेदनशीलता को सार्वभौमिक संज्ञानात्मक विरासत तथा मानव स्थिति के ज्ञान का अमूल्य आधार मानता है.
I. भाषाई विविधता
गणराज्य भाषाई विविधता की रक्षा और विकास करता है तथा प्रत्येक भाषा को वास्तविकता को समझने, विचार को व्यवस्थित करने और मानवीय अनुभव को संप्रेषित करने का विशिष्ट माध्यम मानता है।
II. कलात्मक संवेदनशीलता
कला और रूप, ध्वनि, गति तथा प्रतीकों को ग्रहण करने की क्षमता को ज्ञान, अभिव्यक्ति और मानव विकास के साधन के रूप में मान्यता दी जाती है।
III. संरक्षण और आदान-प्रदान
राज्य शिक्षा, अनुवाद, शोध, अभिलेखन और संस्कृतियों के बीच आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करता है।
ARTICLE18 मानव और पर्यावरणीय प्रगति के लिए प्रौद्योगिकीय प्रतिपूर्ति
प्रत्येक बड़ी प्रौद्योगिकीय शक्ति का सामूहिक प्रगति में योगदान देने का उत्तरदायित्व है।
गणराज्य यह सुनिश्चित करता है कि उसकी प्रौद्योगिकीय क्षमताओं का एक न्यूनतम हिस्सा सामाजिक और पर्यावरणीय सुधार के लिए समाधानों के अनुसंधान और कार्यान्वयन में लगाया जाए। मानवता और समस्त जीव-जगत के संरक्षण के लिए समाज के प्रौद्योगिकीय संसाधनों के एक हिस्से को स्थायी रूप से जुटाने हेतु प्रौद्योगिकीय प्रतिपूर्ति का सिद्धांत स्थापित किया जाता है।
I. प्रौद्योगिकीय योगदान का दायित्व
महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकीय क्षमताओं वाली बड़ी सार्वजनिक और निजी संस्थाओं को अपने प्रौद्योगिकीय संसाधनों का एक न्यूनतम हिस्सा सार्वजनिक हित के कार्यों के लिए समर्पित करना होगा।
यह दायित्व संस्थाओं के आकार, उनकी आर्थिक एवं प्रौद्योगिकीय क्षमताओं तथा उन्हें प्राप्त बड़े पैमाने पर कार्य करने के लाभों को ध्यान में रखकर निर्धारित सीमाओं से लागू होगा। व्यक्ति, शिल्पकार और छोटे संगठन इससे मुक्त होंगे।
योगदान कंप्यूटिंग समय, अवलोकन, उत्पादन, प्रयोग, संचालन संबंधी क्षमता अथवा किसी अन्य उपयोग में लाए जा सकने वाले प्रौद्योगिकीय संसाधन के रूप में दिया जा सकता है।
संबंधित प्रौद्योगिकीय क्षमताओं का 2% न्यूनतम संदर्भ कोटा निर्धारित किया जाता है, जिसकी कार्यविधि प्रत्येक प्रौद्योगिकी के अनुरूप होगी। पहले से किए गए योगदान इस न्यूनतम सीमा में गिने जाएँगे; सीमा पूरी होने पर अतिरिक्त योगदान देना आवश्यक नहीं होगा।
II. योगदान की शर्तें और समन्वय
योगदान को मान्यता तभी मिलेगी जब उसे सार्वजनिक हित के अनुसंधान और कार्यों के समन्वय हेतु स्थापित साझा व्यवस्था में दर्ज किया गया हो।
एक स्वतंत्र प्राधिकरण की जिम्मेदारी में संचालित यह व्यवस्था मौजूदा कार्यों का अभिलेख रखेगी तथा कमियों, परस्पर पूरक प्रयासों और अपर्याप्त रूप से खोजे गए क्षेत्रों की पहचान करेगी, ताकि समस्त प्रयासों का सर्वोत्तम उपयोग हो सके।
यह व्यवस्था योगदानों की प्रासंगिकता का आकलन करेगी, आवश्यकता पड़ने पर वैकल्पिक दिशाएँ सुझाएगी और अनुसंधान तथा नवाचार की स्वतंत्रता में बाधा डाले बिना उन्हें एक सुसंगत सामूहिक प्रयास का हिस्सा बनाएगी।
III. सामाजिक और पर्यावरणीय उद्देश्य
जुटाई गई क्षमताएँ विशेष रूप से निम्नलिखित में योगदान देने वाले समाधानों के अनुसंधान, प्रयोग और कार्यान्वयन की ओर निर्देशित होंगी:
– ऊर्जा की खपत, प्रदूषणकारी उत्सर्जन और अपशिष्ट को कम करना।
– पारिस्थितिक तंत्रों, जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण एवं पुनर्स्थापन करना।
– जीवन-स्थितियों, स्वास्थ्य, सुरक्षा और मानव कल्याण में सुधार करना।
– उन सामाजिक और पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान करना जिन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है।
योगदानों का मूल्यांकन उनकी उपयोगिता, वैज्ञानिक कठोरता और प्रासंगिकता के आधार पर किया जाएगा, चाहे तत्काल सकारात्मक परिणाम प्राप्त हों या नहीं।
IV. संसाधनों का साझा उपयोग और अंतरराष्ट्रीय सहयोग
राज्य संबंधित संस्थाओं की क्षमताओं के अनुपात में योगदान की व्यवस्थाएँ सुनिश्चित करेगा और जहाँ संसाधनों को साझा करने से प्रभावशीलता बढ़ती हो, वहाँ प्रौद्योगिकीय संसाधनों के साझा उपयोग को प्रोत्साहित करेगा।
वह सुनिश्चित करेगा कि योगदान वास्तविक और सत्यापन योग्य क्षमता के उपयोग पर आधारित हों तथा उनसे अनुपातहीन खर्च या हानिकारक प्रभाव उत्पन्न न हों।
गणराज्य इस सिद्धांत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनाने और समन्वय व्यवस्थाओं को परस्पर जोड़ने को प्रोत्साहित करेगा, ताकि मानव प्रगति और समस्त जीव-जगत के संरक्षण के लिए स्थायी वैश्विक प्रौद्योगिकीय क्षमता विकसित की जा सके।
अनुच्छेद170 सुनवाई और बल का
प्रत्येक सामाजिक संघर्ष, सामूहिक असहमति या क्षेत्रीय अथवा नागरिक माँगों की स्वतःस्फूर्त अभिव्यक्ति को सबसे पहले संस्थागत पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण सूचना-संकेत माना जाता है।
भौतिक नियंत्रण के साधनों का सहारा लेने से पहले राज्य सक्रिय सुनवाई, क्षेत्रीय आँकड़ों के संग्रह और विकेंद्रीकृत विचार-विमर्श स्थलों के साधन तैनात करने के लिए बाध्य है।
I. बल की वैधता के प्रमाण-भार का उलटाव
सार्वजनिक बलों द्वारा भौतिक बाध्यता और दमनकारी साधनों का उपयोग अपवादात्मक उपाय तथा मध्यस्थता-संबंध के टूटने का संकेत माना जाता है। बल-प्रयोग के प्रत्येक स्तर को तकनीकी और दस्तावेजीकृत प्रमाण द्वारा स्पष्ट रूप से उचित ठहराना होगा कि वार्ता, सुविधा और रचनात्मक तनाव-न्यूनन के माध्यम पहले ही समाप्त हो चुके थे।
II. कार्रवाई के साधनों का कार्यात्मक विभाजन
राज्य और स्थानीय शक्तियों का विभाजन दक्षता की कठोर श्रेणी के अनुसार किया जाता है:
केंद्रीय निर्णयकारी निकाय पूर्वानुमान, प्रणालीगत मॉडलिंग और शिकायतों के संरचनात्मक समायोजन का कार्य करते हैं; वे मूल समस्या के उपचार के स्थान पर पुलिस प्रतिक्रिया नहीं दे सकते।
क्षेत्रीय और निकटस्थ संस्थाओं के पास संवाद संचालन, आपात परामर्श और सक्रिय सामाजिक समूहों के साथ प्रत्यक्ष मध्यस्थता की विशिष्ट क्षमताएँ होती हैं।
व्यवस्था बनाए रखने वाली शक्तियाँ व्यक्तियों और स्वतंत्रताओं की सुरक्षा के जनादेश के अंतर्गत कार्य करती हैं; उनका संचालन सिद्धांत हिंसक टूटन की अपेक्षा समय देना, दिशा देना और संपर्क से बचना प्राथमिकता देता है।
III. स्वतंत्र नियंत्रण और दमनकारी विचलन का दंड
सार्वजनिक तनावों के विनियमन के लिए एक स्वतंत्र प्राधिकरण, जिसमें आधे सदस्य लॉटरी द्वारा चुने गए नागरिक समाज के प्रतिनिधि और आधे न्यायिक अधिकारी हों, वास्तविक समय और बाद में सार्वजनिक प्रतिक्रियाओं की उपयुक्तता का मूल्यांकन करता है। संवाद की जानबूझकर कमी या परामर्श से इनकार के कारण दमनकारी साधनों की असंगत तैनाती उस कार्रवाई का आदेश देने वाले नागरिक निर्णयकर्ताओं की संस्थागत जिम्मेदारी उत्पन्न करती है।
IV. लेखा-परीक्षण और प्रणालीगत प्रत्युत्तर की बाध्यता
जिस प्रत्येक संकट में बाध्यकारी साधनों के हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ी हो, उसके तीस दिनों के भीतर संवादात्मक विफलता की सार्वजनिक रिपोर्ट प्रकाशित की जाती है। यह दस्तावेज सूचना-अवरोधों की गाँठों की पहचान करता है, टकराव से पहले की सुनवाई संबंधी कमियों का विश्लेषण करता है और भविष्य के निर्णय चक्रों के लिए अनिवार्य अनुकूलन निर्धारित करता है।
अनुच्छेद117 सतर्कता के कर्तव्य और गंभीर सीमाओं के सक्रियण का
राज्य का कर्तव्य है कि वह प्रमुख आर्थिक, सामाजिक, पर्यावरणीय या तकनीकी जोखिम अथवा विचलन संकेतकों के लिए मात्रात्मक और पारदर्शी चेतावनी-सीमाएँ सार्वजनिक रूप से निर्धारित करे।
स्वतंत्र विशेषज्ञों के परामर्श से निर्धारित ये सीमाएँ स्पष्ट, मापनीय और सभी के ज्ञान के लिए सुलभ होनी चाहिए।
I. पूर्वानुमान और स्थायी चेतावनी प्रणाली का
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नागरिक भागीदारी से समर्थित पूर्वानुमान और चेतावनी प्रणाली इन संकेतकों की निरंतर निगरानी करती है। किसी सीमा पर पहुँचते ही प्रणाली बिना अपवाद स्वतः सार्वजनिक चेतावनी जारी करती है। यह चेतावनी केवल समस्या की सूचना नहीं देती; वह संदर्भ सीमा से सटीक अंतर और देखे गए विचलन के संभावित प्रणालीगत परिणाम भी स्पष्ट करती है।
II. रचनात्मक आपात प्रक्रिया का
गंभीर सीमा पार होने पर राज्य को तत्काल रचनात्मक आपात प्रक्रिया आरंभ करनी होती है। यह प्रक्रिया पारंपरिक राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का स्थान लेती है और इस संविधान में परिभाषित सक्रिय सामूहिक कार्रवाई को शुरू करती है। अनिवार्य उद्देश्य समस्या के अपरिवर्तनीय बनने से पहले प्रवृत्ति उलटने के लिए जनता की प्रतिभा को सक्रिय करना है, जिससे सतर्कता की आवश्यकता प्रणाली के निरंतर सुधार की शक्ति बन जाए।
अनुच्छेद183 उचित समय-सीमा का
समयबद्धता सार्वजनिक और संविदात्मक कार्रवाई का एक सारभूत आयाम है।
कोई भी सार्वजनिक या निजी संस्था प्रक्रियाओं में अंतर्निहित अथवा उपयोगकर्ताओं पर लागू समय-सीमाओं की अवहेलना करके भौतिक हानि या मनोवैज्ञानिक संकट नहीं पहुँचा सकती। समय-सीमा का अनुचित उल्लंघन व्यक्ति की अखंडता पर हुए आघात के आधार पर उसके कर्ता की वस्तुनिष्ठ जिम्मेदारी उत्पन्न करता है।
अनुच्छेद184 सारवादी घृणा के विरुद्ध
सारवादीकरण एक दोहरी संज्ञानात्मक विकृति है जिसमें एक ओर पूरे समूह को कुछ व्यक्तियों के कार्यों तक सीमित कर दिया जाता है और दूसरी ओर किसी व्यक्ति को उसके समूह की पूर्वनिर्मित छवि तक सीमित कर दिया जाता है।
तर्क की यह विकृति वस्तुनिष्ठ विश्लेषण के स्थान पर मिश्रण स्थापित करके सार्वजनिक कार्रवाई की तार्किकता को दूषित करती और सामाजिक एकता को कमजोर करती है। कानून इस तंत्र के पूर्ण अस्वीकार पर न्याय और नागरिक शांति को आधारित करता है। किसी नीति, आरोप या सार्वजनिक निर्णय को उचित ठहराने के लिए इस निरंतर सामान्यीकरण और श्रेणी-आरोपण की प्रक्रिया का उपयोग निषिद्ध है। राज्य सुनिश्चित करता है कि जिम्मेदारियों, पहचानों और व्यवहारों का मूल्यांकन किसी भी अनुचित सामान्यीकरण से मुक्त रहे, ताकि लोकतांत्रिक विमर्श की अखंडता बनी रहे।
I. सामान्यीकरण द्वारा सामूहिक दोषारोपण का निषेध
कोई भी प्राधिकरण या सार्वजनिक विमर्श का पक्ष किसी समुदाय, पेशे या सामाजिक समूह के समस्त सदस्यों पर उसके कुछ सदस्यों में देखी गई गलतियाँ, व्यवहार या इरादे आरोपित नहीं कर सकता। कानून अलग-अलग विशिष्ट मामलों का उपयोग करके व्यापक आरोप या शत्रुता गढ़ने, उचित ठहराने और फैलाने को दंडित करता है।
II. श्रेणी-आरोपण द्वारा व्यक्तिगत हानि का निषेध
पूरक रूप से, किसी नागरिक के वास्तविक या अनुमानित सामाजिक, सांस्कृतिक या भौगोलिक वर्ग से संबंध के कारण उसमें दोष, इरादे या अपराधिता की पूर्वधारणा नहीं की जा सकती। व्यक्ति का मूल्यांकन और जिम्मेदारी कठोर रूप से व्यक्तिगत रहती है; किसी समूह से जुड़ी कोई सांख्यिकी या समग्र छवि उसके विरुद्ध कानूनी रूप से प्रयुक्त नहीं की जा सकती।
III. संज्ञानात्मक सार्वजनिक व्यवस्था का संरक्षण
सामाजिक मुद्दों के विश्लेषण को विकृत करने, सामूहिक लक्ष्य निर्धारित करने या विरोध बढ़ाने के लिए सारवादीकरण के इन दोनों रूपों का जानबूझकर उपयोग नागरिक शांति पर प्रत्यक्ष आघात है। संस्थाएँ गणराज्य की सभी परामर्श, मध्यस्थता और निर्णय प्रक्रियाओं से ऐसी भ्रामक तर्क-पद्धतियों को हटाना सुनिश्चित करती हैं।
अनुच्छेद102 नागरिक की बौद्धिक और रचनात्मक शक्ति का
गणराज्य मानता है कि लोकतंत्र की जीवंतता नागरिकों की आलोचनात्मक निर्णय क्षमता, तर्कसंगत बहस करने की योग्यता और हेरफेर के प्रयासों का प्रतिरोध करने की क्षमता पर आधारित है।
राज्य ऐसी नीतियाँ और संस्थाएँ लागू करेगा जो सद्भावना की रक्षा करें, आलोचनात्मक चिंतन को बढ़ावा दें, संवाद और रचनात्मकता को प्रोत्साहित करें तथा जीवन और सामाजिक प्रणालियों में अर्थ के पुनःसमावेशन की गारंटी दें; इसका उद्देश्य सुखद और प्रभावी विकास है जो शांति और पर्यावरण की रक्षा करे।
अनुच्छेद103 विचार की प्रधानता
प्रत्येक व्यक्ति को सामान्य हित के विचार व्यक्त करने और प्रस्तावित करने का अविच्छेद्य अधिकार है।
किसी विचार के अंतर्निहित मूल्य का मूल्यांकन उसके लेखक की पहचान, स्थिति या मूल से स्वतंत्र रूप से किया जाना चाहिए।
अनुच्छेद104 मानवीय क्षमता की सुरक्षा
राष्ट्रीय प्रशिक्षण राष्ट्र की शक्ति और भविष्य की आधारशिला है। इसे एक पवित्र अमूर्त विरासत और सार्वजनिक जीव की जीवनदायी क्रिया के रूप में मान्यता दी जाती है।
इस आधार पर ज्ञान-अर्जन की प्रक्रिया अक्षुण्ण है। राष्ट्र प्रत्येक शिक्षार्थी की बौद्धिक और तकनीकी क्षमता के संरक्षण को तत्काल बजटीय विचारों से ऊपर रखता है, क्योंकि अस्थिरता के कारण कौशल की बर्बादी देश की अखंडता पर आघात है।
व्यावहारिक अनुप्रयोग और दायित्व
राज्य राष्ट्रीय प्रशिक्षण के मार्ग में लगे प्रत्येक व्यक्ति को केवल अपने अध्ययन में संलग्न रहने के लिए आवश्यक भौतिक, जैविक और मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों की गारंटी देता है। यह सुरक्षा ऐसे जीवन-स्तर की सुनिश्चितता के रूप में व्यक्त होती है जो जीविका के लिए लाभकारी कार्य करने की आवश्यकता से मुक्त करे।
राज्य पर परिणाम की बाध्यता है कि वह अध्ययन स्थलों के निकट सम्मानजनक आवास, गुणवत्तापूर्ण भोजन और स्वास्थ्य-सेवाओं तक पूर्ण पहुँच प्रदान करे, ताकि शिक्षार्थी का समय पूरी तरह उसकी क्षमताओं की प्रगति के लिए सुरक्षित रहे। किसी व्यक्ति की क्षमताओं के पूर्ण उपयोग में बाधा डालने वाली प्रत्येक भौतिक रुकावट को राष्ट्रीय प्रदर्शन की रक्षा के मिशन में राज्य की विफलता माना जाता है।
अनुच्छेद115 क्षमता-आधारित समाज और सामाजिक दायरे के विस्तार का
राष्ट्र, अपनी जनता की पूर्ण मान्यता और विश्वास प्राप्त करने के उद्देश्य से, मानव क्षमता के व्यापक मूल्यांकन का वचन देता है।
वह मानता है कि राष्ट्रीय शिक्षा का मूल मिशन केवल शैक्षणिक और तकनीकी ज्ञान अर्जित कराने से आगे बढ़कर प्रत्येक व्यक्ति का पूर्ण विकास सुनिश्चित करना है, और यह भी मानता है कि सार्वजनिक या निजी सभी पेशेवर क्षेत्रों में भर्ती केवल शैक्षणिक डिग्रियों के स्वामित्व पर आधारित नहीं हो सकती।
I. राष्ट्रीय शिक्षा के उद्देश्यों और साधनों का विस्तार
राष्ट्रीय शिक्षा के उद्देश्यों का विस्तार किया जाता है ताकि निम्न के विकास और मान्यता को स्पष्ट रूप से शामिल किया जा सके:
बुद्धिमत्ता अपने सभी रूपों में: संज्ञानात्मक, भावनात्मक, व्यावहारिक, सृजनात्मक, अंतर्ज्ञानी, पारस्परिक और अंतर्वैयक्तिक बुद्धिमत्ताओं सहित।
सृजनात्मकता और नवाचार: समस्या-समाधान तथा समकालीन विश्व की चुनौतियों के अनुकूलन की अंतर्निहित क्षमताओं के रूप में।
संवेदनशीलता, सहानुभूति और नैतिक चेतना: उत्तरदायी नागरिकता और सामाजिक एकता के आधार।
अंतर्विषयी कौशल: जैसे संचार, सहयोग, आलोचनात्मक चिंतन, लचीलापन, स्वायत्तता और अनुकूलन-क्षमता।
इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए शिक्षा-प्रणाली अपनी शिक्षण-पद्धतियों और अधिगम-संदर्भों में विविधता लाने के लिए प्रतिबद्ध होती है, ताकि विद्यार्थियों की अंतर्निहित क्षमताएँ बढ़ें और परंपरागत रूप से मान्यता प्राप्त योग्यताओं के समान मूल्य और उपयोगिता वाली विविध योग्यताओं को न्यायसंगत मान्यता मिले।
II. भर्ती मानदंडों का विस्तार
राज्य व्यक्ति की समस्त क्षमताओं की न्यायसंगत मान्यता को प्रोत्साहित करता है। इस आधार पर भर्ती प्रक्रियाओं में ऐसी मूल्यांकन-पद्धतियाँ अनिवार्य रूप से शामिल होंगी जो गैर-शैक्षणिक क्षमताओं को पूर्ण और वस्तुनिष्ठ रूप से प्रमाणित करें:
अंतर्विषयी कौशल: संचार, टीम-कार्य, नेतृत्व, अनुकूलनशीलता, आलोचनात्मक चिंतन और तनाव-प्रबंधन।
व्यावहारिक अनुभव और कौशल: अनौपचारिक मार्गों, संघीय सहभागिता या व्यक्तिगत परियोजनाओं से अर्जित।
बहुविध बुद्धिमत्ताएँ और विशिष्ट प्रतिभाएँ।
निरंतर सीखने की क्षमता और लचीलापन।
इस कार्यान्वयन की गारंटी के लिए व्यवस्थाएँ स्थापित की जाएँगी: राष्ट्रीय प्रमाणन ढाँचे, नवोन्मेषी मूल्यांकन उपकरण, उच्च शिक्षा पाठ्यक्रमों में गैर-शैक्षणिक क्षमताओं का एकीकरण और मानव संसाधन पेशेवरों का सतत प्रशिक्षण। इस समग्र व्यवस्था का उद्देश्य जनता की योगदान-क्षमता में व्यापक एकीकरण को सुदृढ़ करना है, जो पूरे राष्ट्र के लिए लाभकारी हो।
अनुच्छेद141 अधिकारों और कर्तव्यों का
मौजूद और अनुपस्थित अधिकारों तथा कर्तव्यों की सूचना तक प्रत्यक्ष पहुँच जनता की बेहतर रक्षा और भागीदारी की गारंटी है।
I. पारस्परिकता और सहसंबंध का सिद्धांत
संवैधानिक व्यवस्था मान्यता प्राप्त अधिकारों और सामाजिक निकाय के प्रत्येक सदस्य तथा समुदाय पर लागू कर्तव्यों के बीच पारस्परिकता और कठोर सहसंबंध के मूल सिद्धांत पर आधारित है।
II. अनुक्रमित और सुलभ राष्ट्रीय सूची
मौलिक अधिकारों और कर्तव्यों की एक अनुक्रमित, सुलभ, व्यापक राष्ट्रीय सूची बनाई जाती है और उसे सभी नागरिकों के लिए बोधगम्य रूप में प्रकाशित किया जाता है। प्रत्येक घोषित अधिकार को उस नागरिक, भौतिक, आर्थिक या नैतिक कर्तव्य से स्पष्ट रूप से जोड़ा जाता है जो उसकी वास्तविकता और स्थायित्व सुनिश्चित करता है।
III. लाभों तक पहुँच की आनुपातिकता
सामाजिक और पर्यावरणीय अधिकारों से उत्पन्न लाभों तक पहुँच संबंधित कर्तव्यों के पालन के अनुपात में, जैविक कानून द्वारा निर्धारित शर्तों के अनुसार, और मानव व्यक्ति की अंतर्निहित गरिमा को क्षति पहुँचाए बिना होती है।
IV. अनुप्रयोग और जैविक मूल्यांकन की व्यवस्थाएँ
एक जैविक कानून तकनीकी नामावली, सूची के आवधिक मूल्यांकन की व्यवस्थाएँ और इन अधिकारों तथा कर्तव्यों के संतुलित अनुप्रयोग से उत्पन्न सामाजिक प्रदर्शन को मापने के साधन निर्धारित करता है।
अनुच्छेद147 प्रणालीगत सुनवाई और प्रशासनिक निष्पक्षता
नागरिकों पर सामाजिक, भौतिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव से संबंधित आँकड़ों को मिलाए बिना किसी सीमित तकनीकी क्षेत्र के अलगाव में कोई सार्वजनिक निर्णय नहीं लिया जा सकता।
राज्य का कर्तव्य है कि वह जनसंख्या की स्थिति की सटीक और निरंतर समझ बनाए रखे।
I. विशेषज्ञताओं की अंतर-संचालनीयता और प्रशासनिक अंधता का अंत
इस उद्देश्य के लिए प्रशासन की विभिन्न परतों और विशेषज्ञता-प्रणालियों के लिए पारस्परिक संचालन अनिवार्य है।
II. तकनीकी सहानुभूति और युक्तिसंगत औचित्य
संस्थागत न्याय तथ्यों में वस्तुनिष्ठ और उसकी ग्रहणशीलता में व्यक्तिनिष्ठ दोनों होना चाहिए। प्रशासन निर्णयों की पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए तकनीकी साधनों का उपयोग करता है, जिससे प्रत्येक नागरिक सार्वजनिक कार्रवाई के युक्तिसंगत औचित्य को समझ सके। स्पष्टीकरण की यह अभियांत्रिकी निराशा को रोकती है, निराधार दावों को सीमित करती है और सामूहिक निर्णयों की शांतिपूर्ण स्वीकृति सुनिश्चित करती है।
अनुच्छेद148 सामूहिक चेतना की सहायता और मूल कारणों की खोज
किसी सार्वजनिक माँग के सामने संस्थाओं को व्यवस्थित पुनर्परिभाषा करनी चाहिए ताकि सामाजिक अशांति के मूल कारण तक पहुँचा जा सके और वास्तविक आवश्यकताओं को वस्तुनिष्ठ आधार से रहित आशंकाओं से अलग किया जा सके।
I. माँगों और चिंताओं का पुनर्प्रसंस्करण
राज्य भय, माँगों या सामूहिक चिंताओं को केवल संतुष्ट या दमन किए जाने वाले आँकड़ों के रूप में नहीं देखता। उसका दायित्व ज्ञान-सहायता के रूप में कार्य करना है।
II. तर्कशीलता द्वारा मानसिकताओं का विकास
सार्वजनिक शक्ति का दायित्व है कि वह नागरिकों को सामूहिक चिंताओं का पुनर्विश्लेषण करने के लिए आवश्यक विश्लेषणात्मक साधन प्रदान करे। राजनीतिक कार्रवाई स्पष्टीकरण और समझ के माध्यम से भय घटाने का लक्ष्य रखती है, जिससे जनसंख्या चुनौतियों को अधिक उच्च तर्कशीलता से समझ सके। सामूहिक व्यवहारों का प्रबंधन अंधी बाध्यता से नहीं बल्कि चेतना के उन्नयन से किया जाता है।
अनुच्छेद149 सामूहिक क्षमता और सांस्कृतिक एकता
नियोजन, संगठन या शासन की कोई भी परियोजना संबंधित जनसंख्या की ऐतिहासिक और लोक-संस्कृति की उपेक्षा नहीं कर सकती।
I. एकता के साधनों की स्थायी सूची
सार्वजनिक परियोजनाओं की अभियांत्रिकी में एकता के साधनों की सूची अनिवार्य रूप से शामिल होती है। राज्य अवसंरचनाओं या जीवन-नियमों में किसी भी परिवर्तन से पहले अमूर्त संसाधनों, वास्तविक एकजुटताओं और स्थानीय संवेदनशीलताओं का निरंतर मूल्यांकन करता है।
II. ऐतिहासिक और लोक-संस्कृति का एकीकरण
वर्तमान और भविष्य की सामूहिक क्षमताओं की संभावना सामाजिक जड़ों की मान्यता पर आधारित है। इस संस्कृति को नागरिक सहभागिता के मूल पदार्थ के रूप में मान्यता दी जाती है, जिससे देश का विकास उसकी जनता की पहचान पर आधारित रहे।
अनुच्छेद150 सार्वजनिक शांति का
सार्वजनिक शांति, जनसंख्या का भावनात्मक संतुलन और उसकी जीवन-ऊर्जा का संरक्षण संविधान द्वारा संरक्षित मूलभूत संपदाएँ हैं।
राज्य, सार्वजनिक पक्षों और राजनीतिक संगठनों का दायित्व है कि वे शांत, रचनात्मक और लोकतांत्रिक विवेक के अनुकूल सामाजिक वातावरण के लिए कार्य करें।
II. भय और चिंता के दुरुपयोग का निषेध
किसी भी सार्वजनिक उत्तरदायी या निर्वाचित पद के उम्मीदवार के लिए भय का राजनीतिक उपयोग करना, निराधार चिंता उत्पन्न करना या दलगत अथवा चुनावी उद्देश्यों से भयकारी कथाएँ फैलाना औपचारिक रूप से निषिद्ध है। किसी खतरे की चेतावनी देने वाला प्रत्येक संचार वस्तुनिष्ठ और सत्यापन योग्य मानदंडों से समर्थित तथा समाधान के ठोस मार्गों के साथ होना चाहिए। राजनीतिक पक्षों द्वारा निराधार नाटकीयता और दुष्टोपियाई दृष्टियों का प्रसार लोकतांत्रिक विमर्श की स्वस्थता के विरुद्ध दोष है।
III. व्यापक सामाजिक विकृतियों की रोकथाम और संवैधानिक निगरानी
राज्य मीडिया, सट्टात्मक या वैचारिक अव्यवस्थाओं से उत्पन्न व्यापक सामाजिक विकृतियों और सामूहिक मनोविकारों की रोकथाम सुनिश्चित करता है। संवैधानिक निगरानी उन प्रणालीगत विचलनों की पहचान करती है जो निराशा, सामूहिक चिंता या सामूहिक आक्रामकता को बढ़ाते हैं, ताकि उनके विरुद्ध समय देने और पुनर्संतुलन के तंत्र लागू किए जा सकें।
IV. बाह्य प्रभावों और मानसिक लागतों का मूल्यांकन
वित्त कानून और सार्वजनिक लेखांकन के नियम सुधारों के नकारात्मक बाह्य प्रभावों, मानसिक और सामाजिक लागतों तथा सामान्य हित की परियोजनाओं से उत्पन्न आंतरिक जीवन-गुण और गुणात्मक कल्याण का मूल्यांकन अनिवार्य रूप से सम्मिलित करते हैं।
V. केवल मात्रात्मक नीतियों का निषेध
ऐसी प्रत्येक सार्वजनिक नीति निषिद्ध है जो समुदाय के मानसिक और नैतिक स्वास्थ्य की कीमत पर केवल मात्रात्मक संकेतकों पर आधारित हो।
अनुच्छेद151 विमुखता के विरुद्ध संघर्ष का
किसी व्यक्ति को ऐसी संगठनात्मक व्यवस्था, प्रक्रिया या तकनीकी प्रणाली के अधीन नहीं किया जा सकता जो उसकी मानसिक अखंडता में गिरावट, दिशाबोध की हानि या कार्यात्मक अधीनता उत्पन्न करे।
I. सार्वजनिक संस्थाएँ प्रशासनिक विसंगतियों, निरर्थक प्रक्रियाओं और अनुचित नौकरशाही बाधाओं की निरंतर पहचान, निर्धारण और समाप्ति के दायित्व के अधीन हैं।
II. सार्वजनिक शक्ति द्वारा घोषित सिद्धांत, मूल्य और सुधार प्रभावशीलता तथा ठोस उपयोगिता की कठोर सीमा के अधीन हैं। ऐसा मूल्य जो नागरिकों के दैनिक जीवन में ठोस और मापनीय सुधार में परिवर्तित न हो, कानूनी या प्रशासनिक बाध्यता का औचित्य नहीं बन सकता।
III. अल्पतंत्र या संस्थागत कब्जे से उत्पन्न विमुखता रोकने के लिए कानून सार्वजनिक निर्णयों को संचालित करने वाले भौतिक और नैतिक हित-संबंधों पर पूर्ण पारदर्शिता लागू करता है। हितों और प्रभावों का गतिशील मानचित्रण निजी लाभ या समूहवादी हितों पर साझा हित की निरंतर प्राथमिकता सुनिश्चित करता है।
IV. प्रत्येक व्यक्ति को अपने समय के अभयारण्य और व्यक्तिगत समय के सुनिश्चित हिस्से का अविच्छेद्य अधिकार है, जो उत्पादक, डिजिटल या वाणिज्यिक हस्तक्षेप से संरक्षित हो। निजी जीवन-समय का अवैध अधिग्रहण या उल्लंघन व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर प्रत्यक्ष आघात है।
V. राज्य तृतीय-स्थलों, स्थानीय स्वायत्तता संरचनाओं और सहकारी पहलों के माध्यम से सामाजिक और नागरिक योगदानों के विकेंद्रीकरण को प्रोत्साहित करता है। वह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक नागरिक अपनी सामाजिक उपयोगिता, स्थानीय संबंधों पर नियंत्रण और राज्य द्वारा सामान्यीकरण की किसी बाध्यता से बाहर अपने निजी क्षेत्र को बनाए रखने की स्वतंत्रता रखे।
स्तर 5: उद्भव
अनुकूलन और प्रणालीगत परिवर्तन
अनुच्छेद185 निर्णायक परिमाण का
किसी प्रमुख सामाजिक समस्या या राष्ट्र की संरचनात्मक खराबी को हल करने के उद्देश्य से प्रस्तुत प्रत्येक विधेयक या सुधार-प्रस्ताव को केवल तभी अपनाया जाना चाहिए जब उसने व्यापक और इष्टतम कार्रवाई की अनिवार्यता, जिसे IAMO संक्षेप से निर्दिष्ट किया गया है, के पालन को प्रदर्शित कर दिया हो।
यह अनिवार्यता प्रभावशीलता के ऐसे परिमाण का दायित्व स्थापित करती है जो तीन अविभाज्य आधारों पर टिका है: गुणात्मक आवश्यकता, मात्रात्मक आवश्यकता और राष्ट्रीय सहभागी प्रक्रिया।
I. गुणात्मक आवश्यकता: विश्लेषण, सृजनात्मकता और प्रासंगिकता
कार्रवाई को निम्न चरणों के माध्यम से सर्वोच्च गुणवत्ता की खोज द्वारा निर्देशित किया जाना चाहिए:
विश्लेषण की गुणवत्ता: आरंभकर्ता प्राधिकरण को लक्षित समस्या का अधिकतम पूर्णता और गहराई वाला विश्लेषण प्रस्तुत करना होगा। यह विश्लेषण सामान्य ज्ञान से आगे जाकर खराबी के संरचनात्मक मूल कारणों की पहचान करेगा।
सृजनात्मकता का दायित्व: प्रस्तावित व्यवस्थाएँ और उपाय नवोन्मेषी होने चाहिए तथा केवल क्रमिक समायोजन के बजाय संरचनात्मक परिवर्तन का प्रभाव सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त साहस प्रदर्शित करना चाहिए।
प्रासंगिकता का मापन: प्रत्येक समाधान का इस आधार पर कठोर मूल्यांकन किया जाएगा कि वह पहचानी गई समस्या का इष्टतम उत्तर देने में कितना सक्षम है, ताकि उसकी अनुमानित प्रभावशीलता अपेक्षित पूर्ण प्रदर्शन-स्तर तक पहुँचे।
II. मात्रात्मक आवश्यकता: समग्र प्रतिबद्धता की सीमा
गुणक प्रभाव सुनिश्चित करने और आधे-अधूरे उपायों की अपर्याप्तता से बचने के लिए समग्र सुधार को न्यूनतम समग्र प्रतिबद्धता सीमा, अर्थात SEG, तक पहुँचना होगा। यह सीमा उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एक साथ लागू की गई पृथक और समन्वित कार्रवाइयों या व्यवस्थाओं की कुल संख्या के अनुरूप है। यह सीमा एक सौ योग्य पहलों से कम नहीं हो सकती।
III. लोकतांत्रिक और सहभागी प्रक्रिया
किसी भी सुधार का निर्माण केवल कुछ प्रतिनिधियों का कार्य नहीं हो सकता। सबसे पूर्ण विश्लेषण और सबसे साहसी समाधान विकसित करने के लिए इसमें व्यवस्थित रूप से पूरे राष्ट्र की भागीदारी होनी चाहिए।
निरंतर परामर्श: विश्लेषण और समाधान-निर्माण की प्रक्रिया को राष्ट्रीय निरंतर परामर्श प्रणाली द्वारा पोषित किया जाना चाहिए। यह व्यवस्था सामाजिक निकाय के विचारों और निदानों का स्थायी संग्रह सुनिश्चित करती है।
वैधता की शर्त: निरंतर परामर्श प्रणाली के अंतर्गत की गई राष्ट्रीय भागीदारी व्यापक और इष्टतम कार्रवाई की अनिवार्यता को पूरा माना जाने के लिए आवश्यक शर्त है।
अनुच्छेद138 शिक्षणशील कार्य का
शिक्षणशील कार्य सामाजिक संगठन की मूल आवश्यकता है और बौद्धिक एकजुटता के तंत्र के रूप में कार्य करता है।
राज्य नागरिक को सर्वव्यापी और निरंतर सीखने की गारंटी देता है।
I. दैनिक जीवन में शैक्षिक संप्रेषण
दैनिक, वाणिज्यिक या संबंधपरक कार्यों के क्षेत्र में सार्वजनिक और निजी पक्षों का कर्तव्य है कि वे छोटे शैक्षिक अंश के रूप में ज्ञान संप्रेषित करें। यह शिक्षण सहायक ज्ञान से संबंधित होता है, खाली समय में सहज रूप से समाहित किया जाता है और निर्धारित सीमाओं का पालन करता है ताकि नागरिकों को मानसिक अतिभार के बिना ज्ञान दिया जा सके।
II. परियोजनाओं और प्रबंधन में शिक्षण का एकीकरण
परियोजनाओं, नियोजन और प्रक्रियाओं के क्षेत्र में शिक्षणशील कार्य नेतृत्व और प्रबंधन श्रृंखला की जिम्मेदारी है। प्रबंधन का दायित्व है कि शिक्षण को प्रक्रियाओं, कार्य-पद्धतियों और प्रशासनिक कार्यविधियों के भीतर ही समाहित करे। यह संप्रेषण परियोजना के प्रत्यक्ष विषय तक सीमित नहीं रहता; यह संबंधित पक्षों के बौद्धिक उन्नयन हेतु सहायक और परिधीय ज्ञान सिखाने का अवसर भी है।
III. पूर्ण सत्यनिष्ठा और हेरफेर का निषेध
चाहे दैनिक शैक्षिक अंश हो या शिक्षणशील प्रबंधन प्रक्रिया, ज्ञान-संप्रेषण में पूर्ण सत्यनिष्ठा आवश्यक है। किसी भी प्रकार का हेरफेर, बौद्धिक धोखाधड़ी या छिपाव कठोर रूप से निषिद्ध है।
अनुच्छेद165 पारस्परिक अनुकूलन का
राष्ट्र प्रत्येक नागरिक को अपनी क्षमताओं को विकसित करने और विश्व के परिवर्तनों के अनुकूल होने के लिए आवश्यक संसाधनों की गारंटी देता है, साथ ही जीवन-पद्धतियों और विकास की गतियों की विविधता को अपने प्रणालीगत संतुलन की प्रथम शर्त के रूप में स्थापित करता है।
तकनीकी या सामाजिक प्रगति कोई मानकगत मताग्रह नहीं है। गणराज्य संवेदनशीलताओं, योग्यताओं और व्यक्तिगत आकांक्षाओं की बहुलता को जीवंत समस्थिति का आधार मानता है, जिसके भीतर प्रत्येक मानवीय कार्य समग्र व्यवस्था की लचीलापन और सामंजस्य में योगदान देता है।
I. स्थिति चुनने की स्वतंत्रता और बाध्यता का निषेध
किसी व्यक्ति को अपनी मनोवैज्ञानिक सेहत, शारीरिक अखंडता या जीवन-चयन की कीमत पर तकनीकी परिवर्तनों या आधुनिक गतियों को अपनाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। बिना किसी दर्जा-ह्रास के स्थिति चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए राज्य निम्न संवैधानिक गारंटियाँ लागू करता है।
II. मूलभूत सेवाओं तक पहुँच की तटस्थता
किसी भी नागरिक, नागर या प्रशासनिक अधिकार को उन्नत तकनीकी उपकरणों के स्वामित्व या उनके अनन्य उपयोग पर निर्भर नहीं किया जा सकता। गैर-डिजिटल और प्रत्यक्ष पहुँच के मार्ग स्थायी और समान गरिमा वाले बने रहते हैं।
III. सामाजिक-आर्थिक हाशियाकरण से संरक्षण
तकनीकी संयम, सूचना-प्रवाह से पीछे हटने या वैकल्पिक गतिविधि-पद्धति का जानबूझकर चयन भौतिक सुरक्षा-जाल से वंचित करने या संस्थागत कलंकित करने का आधार नहीं बन सकता।
IV. स्वैच्छिक सक्षमता का स्थायी साधन-समूह
विश्व के परिवर्तनों में सम्मिलित होना चाहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए सार्वजनिक शक्ति एक सार्वभौमिक और तुरंत सक्रिय की जा सकने वाली व्यवस्था बनाए रखती है:
संज्ञानात्मक लचीलापन: मेटासंज्ञानात्मक प्रशिक्षण, सूचना-प्रवाहों पर आलोचनात्मक नियंत्रण और संगणकीय तर्कों को आत्मसात करना।
शारीरिक संरक्षण: मानसिक भार से सुरक्षा, पर्यावरणीय उपयोग-सुविधा और शारीरिक विश्राम-अवधियों का सम्मान।
सहकारी अभियांत्रिकी: पीढ़ियों के बीच पारस्परिक मार्गदर्शन और कमजोरियों को निष्प्रभावी करने के लिए ज्ञान का साझा उपयोग।
प्रयोग का अधिकार: संरक्षित पुनर्परिवर्तन-अवधियाँ, जो संसाधनों में व्यवधान के बिना प्रयास और त्रुटि का अधिकार सुनिश्चित करती हैं।
भावी प्रयोग-स्थल: स्वतंत्र और आर्थिक दबाव से मुक्त अधिगम के लिए उभरती तकनीकों तक प्रत्यक्ष और निःशुल्क पहुँच।
V. उचित स्थान का मूल्यांकन
सार्वजनिक नीतियाँ व्यक्तिगत आकांक्षाओं, प्राकृतिक प्रतिभाओं और सामूहिक उपयोगिता के बीच उपयुक्तता का समर्थन करती हैं, ताकि प्रत्येक नागरिक अपने अनुरूप सहभागिता और जटिलता के स्तर पर स्वयं को पूर्ण कर सके।
VI. संकेतकों और गारंटियों की जैविक परिभाषा
एक जैविक कानून सामाजिक समस्थिति की निगरानी के संकेतक, जीवन-पथों के गैर-भेदभावपूर्ण मूल्यांकन की व्यवस्थाएँ और निरंतर अनुकूलन की अनिवार्यताओं से संरक्षित जीवन-क्षेत्रों की अलंघनीयता की गारंटियाँ निर्धारित करता है।
अनुच्छेद108 मैक्रोसाइकियाट्री: राज्य के मनोवैज्ञानिक उत्तरदायित्व के लिए
मैक्रोसाइकियाट्री यह मानती है कि किसी व्यक्ति की तरह कोई देश भी अपनी चेतना और तर्क-पद्धतियों में संरचनात्मक रूप से बीमार हो सकता है।
गणराज्य मैक्रोसाइकियाट्री को मानसिक स्वास्थ्य के सामूहिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक निर्धारकों के वैज्ञानिक अध्ययन के रूप में मान्यता देता है। I. अपनी जनता के मानसिक स्वास्थ्य की जिम्मेदारी संरचनात्मक रूप से बीमार देश न तो समृद्ध हो सकता है और न अपनी सर्वोत्तम अवस्था में आगे बढ़ सकता है। राज्य जनसंख्या के मनोवैज्ञानिक संतुलन पर अपनी संरचनाओं, कानूनों और विमर्शों के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव की जिम्मेदारी स्वीकार करता है, यह मानते हुए कि किसी राष्ट्र की विकृति में उसकी संस्थाओं की विफलता और उसकी जनता की पीड़ा दोनों शामिल हैं।
I. अपनी जनता के मानसिक स्वास्थ्य की जिम्मेदारी
राष्ट्रीय मैक्रोसाइकियाट्रिक अनुसंधान संस्थान की स्थापना की जाती है। इस स्वतंत्र वैज्ञानिक संस्था का दायित्व सामाजिक विकृतियों का मानचित्रण करना, सार्वजनिक नीतियों का उनके मनोवैज्ञानिक प्रभाव के आधार पर लेखापरीक्षण करना और राष्ट्र की स्मृतिगत तथा सांस्कृतिक आत्मालोचना को स्थापित करना है। संस्थान को देश की मानसिक बीमारियों का निदान करने का अधिकार है ताकि वह नेताओं को उन सामूहिक खराबियों के बारे में स्पष्ट कर सके जो सभ्यतागत विकास में बाधा डालती हैं।
II. इस अनुशासन की शुरुआत
सरकार राज्य-तंत्र में निहित जोखिम कारकों को निष्प्रभावी करने के उद्देश्य से बिना शर्त रोकथाम का दृष्टिकोण लागू करती है। सामूहिक अलगाव के नए रूपों के उद्भव को रोकने के लिए प्रत्येक प्रमुख विधायी कार्यक्रम को संस्थान की पूर्व स्वीकृति आवश्यक है।
V. रोकथाम
राज्य इन सामाजिक विकृतियों के व्यक्तिगत और शारीरिक परिणामों के संपूर्ण उपचार की गारंटी देता है। वह मनोचिकित्सकीय और मनोवैज्ञानिक देखभाल तक सार्वभौमिक और बिना शर्त पहुँच का वित्तपोषण करता है, व्यक्तिगत उपचार को प्रणालीगत खराबी की मरम्मत मानते हुए और साथ ही राष्ट्र की सामूहिक चेतना को स्वस्थ करते हुए।
फ्रांसीसी मामले का उदाहरण:
बुद्धि और पूँजी के बीच निष्फल विभाजन: सामाजिक प्रगति (प्रतीकात्मक रूप से वामपंथ से जोड़ी गई) और आर्थिक प्रदर्शन (दक्षिणपंथ से जोड़ा गया) के बीच प्रणालीगत द्वंद्व को समझने में सामूहिक अक्षमता। व्यक्ति इस द्विआधारी मताग्रह को आत्मसात कर लेता है, जिससे वह मानने लगता है कि बौद्धिक प्रतिबद्धता भौतिक सफलता को बाहर कर देती है, या इसके विपरीत, जबकि राष्ट्र को सर्वोत्तम रूप से आगे बढ़ने के लिए दोनों ध्रुवों की गहरी आवश्यकता है।
अनुच्छेद118 विचारधारा तथा अवधारणा-निर्माण के अधिकार और कर्तव्य का
गणराज्य प्रत्येक नागरिक के व्यक्तिगत विवेक के निर्माण और प्रयोग के मौलिक अधिकार को मान्यता देता है, जो उसकी लोकतांत्रिक भागीदारी की अविभाज्य आधारशिला है।
यह अधिकार आलोचनात्मक चिंतन और सामाजिक तथा राजनीतिक वास्तविकता की स्वतंत्र अवधारणा-निर्माण क्षमता द्वारा प्रयोग किया जाता है। लोकतांत्रिक जीवन में भागीदारी को पहले से मौजूद विचारों के उपभोग या केवल सत्ता सौंपने तक सीमित नहीं किया जा सकता; यह सतत सृजन का कार्य है, जिसमें प्रत्येक नागरिक से अपेक्षा की जाती है कि वह प्राप्त अवधारणाओं का पुनर्विश्लेषण करे और साझा अर्थ के निर्माण में सक्रिय योगदान दे।
I. राज्य के बौद्धिक सुविधा-कर्तव्य का
राज्य का अनिवार्य मिशन इस अधिकार के प्रभावी प्रयोग के लिए आवश्यक परिस्थितियों की गारंटी देना है। वह ऐसी शिक्षा को बढ़ावा देता है जो बौद्धिक जिज्ञासा, पहल की भावना और स्वयं सोचने की पूर्ण जिम्मेदारी विकसित करे। वह सूचना-स्रोतों की बहुलता और निर्णय प्रक्रियाओं की पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित करता है, ताकि प्रत्येक नागरिक प्रणालीगत मुद्दों को समझ सके और अपनी स्वयं की सूचित राय विकसित कर सके।
II. विवेक की स्वतंत्रता और वैचारिक स्वायत्तता का
किसी व्यक्ति को किसी बाहरी प्राधिकरण द्वारा थोपी गई अवधारणाएँ या विचारधाराएँ अपनाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। पहले से स्थापित अवधारणा के प्रति निष्क्रिय समर्पण गणराज्य की भावना के विपरीत माना जाता है। नागरिकता सक्रिय अवधारणा-निर्माण की क्षमता और उच्च राजनीतिक प्रदर्शन की गतिशीलता को सीमित करने वाले प्रत्येक मताग्रह के अस्वीकार से परिभाषित होती है।
अनुच्छेद114 सौंदर्य को बौद्धिक परिपूर्णता के रूप में
गणराज्य प्रत्येक नागरिक को ऐसे भौतिक या अमूर्त परिवेश का अधिकार देता है जिसकी रचना व्यक्तिगत विकास और आलोचनात्मक चिंतन को बढ़ावा दे।
गणराज्य घोषित करता है कि सौंदर्यात्मक अपेक्षा उच्च राजनीतिक प्रदर्शन की मूल शर्त है।
I. पूर्ण कृति की अपेक्षा
प्रत्येक उपलब्धि—चाहे क्षेत्र की वास्तुकला हो, कानून का लेखन, सुरक्षा व्यवस्था की रचना, सार्वजनिक कर्मचारियों की प्रस्तुति, बैठक का संचालन, राजनीतिक भाषण या सामूहिक भोजन की सामग्री—एक पूर्ण कृति के रूप में साकार होनी चाहिए।
II. अनुमान और अधूरेपन का निषेध
राज्य अपने हस्तक्षेप के सभी क्षेत्रों में अस्थायीपन, प्रारूप और अनुमानात्मक अपूर्णता को निषिद्ध करता है।
III. प्रयोग की स्थिति
अपवाद के रूप में प्रयोग को अधिकार और प्रगति के साधन के रूप में मान्यता दी जाती है, बशर्ते उसे स्पष्ट रूप से प्रयोग घोषित, सीमित और उसी रूप में उपयोग किया गया हो। प्रयोग की अवस्था से स्थायी उपलब्धि की ओर प्रत्येक संक्रमण पूर्ण सौंदर्यात्मक और तकनीकी संगति अनिवार्य करता है।
IV. नागरिक, कृति का संप्रभु निर्णायक
नागरिक को प्रत्येक कृति की पूर्णता का संप्रभु निर्णायक बनाया जाता है। राज्य का कर्तव्य है कि नागरिकों, व्यावसायिकों, कलाकारों और विशेषज्ञों को सम्मिलित करते हुए आलोचना का स्थायी और विविध नेटवर्क संगठित करे, जिसका मिशन प्रत्येक व्यवस्था की औपचारिक शुद्धता और आध्यात्मिक उद्देश्य का परीक्षण करना हो। इस आलोचना के निष्कर्ष सार्वजनिक और बहस के अधीन होते हैं, जिससे रचनाकारों पर पूर्ण पारदर्शिता की बाध्यता आती है। संगति की कोई कमी या अनुचित अपूर्णता आध्यात्मिक और तकनीकी उद्देश्य की विफलता मानी जाती है और नागरिक को कृति के सुधार की माँग का अधिकार देती है।
स्तर 6: पारितंत्र
वैश्विक पर्यावरण के साथ अंतःक्रिया
अनुच्छेद181 पसीने के अधिकार का — रक्त के अधिकार और भूमि के अधिकार के मुकाबले
क्षेत्रीय समुदाय में एकीकरण और नागरिक अधिकारों की पात्रता व्यक्तिगत प्रयास, जोखिम उठाने और साझा हित में प्रभावी योगदान से उत्पन्न हो सकती है; इसे पसीने का अधिकार कहा जाता है।
यह सिद्धांत सामूहिक मूल्य के सक्रिय सृजन और दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को नागरिक वैधता के प्रत्यक्ष स्रोत के रूप में स्थापित करता है, अन्य सभी क्षेत्रीय संबंध-पद्धतियों के समान स्तर पर।
I. समुदाय की सेवा में व्यक्तिगत प्रतिबद्धता के आधार का
जो भी व्यक्ति निरंतर और सत्यापन योग्य रूप से अपनी शारीरिक, बौद्धिक या तकनीकी क्षमताएँ क्षेत्र के निर्माण, संरक्षण या जीवनदायी संचालन में लगाता है, वह पूर्ण नागरिक अधिकारों का अधिकारी बनने की पात्रता प्राप्त करता है। यह पात्रता स्वीकार किए गए त्याग, कार्रवाई की निरंतरता और समुदाय के लिए सिद्ध उपयोगिता से उत्पन्न होती है तथा निष्क्रिय लाभ या स्थिति-आधारित अधिकार के तर्क से अलग है।
II. क्षेत्रीय प्रयास के निर्धारक मानदंडों का
पसीने के अधिकार के अंतर्गत अधिकार प्रदान करने का मूल्यांकन किए गए कार्यों की कठिनता या निर्णायकता, दूसरों के लिए उठाए गए व्यक्तिगत जोखिम, आवश्यक कौशलों के हस्तांतरण, साझा पारिस्थितिक तंत्रों की पुनर्स्थापना या बड़े सामूहिक संकटों के दौरान प्रदर्शित निष्ठा के आधार पर किया जाता है। इस निवेश का प्रमाण दीर्घ अवधि में देखे गए भौतिक कार्यों और ठोस परिणामों पर आधारित होता है।
III. अर्जित अधिकारों के प्रभावी प्रयोग का
प्रयास के आधार पर मान्यता प्राप्त नागरिक अधिकार विचार-विमर्श, मतदान और क्षेत्र के साझा मामलों के शासन में पूर्ण भागीदारी की क्षमता प्रदान करते हैं। जब किसी व्यक्ति के योगदान की वास्तविकता औपचारिक रूप से स्थापित हो चुकी हो, तब उसे इन अधिकारों तक पहुँच से वंचित नहीं किया जा सकता।
IV. नियंत्रण की गारंटियों और जैविक कानून के संदर्भ का
एक जैविक कानून प्रमाण के लिए आवश्यक पूर्व-अवधि, प्रयास की सामूहिक सत्यापन व्यवस्थाएँ और प्रतिबद्धता की मान्यता से इनकार करने वाले निर्णयों के विरुद्ध उपलब्ध उपाय निर्धारित करता है। वह मूल्यांकन की निष्पक्षता सुनिश्चित करता है और केवल वित्तीय संपत्तियों को स्वचालित रूप से प्रतिबद्धता की उपाधि में बदलने को निषिद्ध करता है।
अनुच्छेद130 व्यावहारिक पवित्रता का
राज्य का दायित्व है कि वह उन तत्वों की पहचान करे, उनका सम्मान करे और उन्हें उन्नत करे जो उसकी क्षमता से परे हैं।
राष्ट्र उन प्राकृतिक शक्तियों और प्रणालीगत गतिशीलताओं की पवित्रता के व्यावहारिक स्वरूप को मान्यता देता है जो उसे बनाती और घेरती हैं, क्योंकि वे ऐसी मूल वास्तविकताएँ हैं जिन पर मानव कार्रवाई का पूर्ण नियंत्रण संभव नहीं है।
I. सम्मान और उन्नयन की बाध्यता
राज्य और समाज इन गतिशीलताओं की अज्ञानता या अवमानना से उत्पन्न जोखिमों को सक्रिय रूप से रोकने के लिए बाध्य हैं…
II. अंतःक्रिया की व्यवस्थाएँ
इस मान्यता और उन्नयन की व्यवस्थाएँ कानूनी मानकों के माध्यम से व्यक्त की जा सकती हैं…
लेखक की टिप्पणी: स्पेन में बाढ़ का उदाहरण इस विचार को स्पष्ट रूप से दर्शाता है: नदी की अंतर्निहित शक्ति की उपेक्षा करते हुए उसका मार्ग बदलने से आपदा हुई। यदि नदी को “पवित्र” माना गया होता—अर्थात ऐसी शक्ति जिसे सम्मान और उन्नयन की आवश्यकता है—तो न केवल आपदा टल सकती थी, बल्कि उसके आसपास एक समृद्ध और सामंजस्यपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र भी विकसित हो सकता था।
अनुच्छेद110 विदेश में फ्रांसीसी नागरिकता का
फ्रांसीसी नागरिकता, जो राष्ट्र की आधारशिला है, ऐसे कर्तव्यों का समूह समाहित करती है जिनका पालन गणराज्य के क्षेत्र में भी और विदेश में भी किया जाता है।
विदेश में फ्रांसीसी नागरिक फ्रांस के प्रतिनिधित्व और उसके मूल्यों के प्रसार में योगदान देता है। वह मेजबान राष्ट्रों के कानूनों, रीति-रिवाजों और संप्रभुता का सम्मान करने तथा अपने कार्यों द्वारा फ्रांस की सांस्कृतिक प्रतिष्ठा और गरिमा में योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध होता है। राज्य जागरूकता कार्यक्रमों तथा सहयोग और आदान-प्रदान की पहलों के समर्थन द्वारा इस नागरिक प्रतिबद्धता में उसका साथ देता है।
I. विदेश में फ्रांसीसी नागरिक की जिम्मेदारी
प्रत्येक फ्रांसीसी नागरिक अपने कार्यों के लिए गणराज्य के कानून के प्रति उत्तरदायी है, चाहे वह किसी भी क्षेत्र में हो। विदेश में फ्रांसीसी नागरिक द्वारा किए गए अपराधों और दुष्कृत्यों पर फ्रांसीसी कानून लागू होता है; फ्रांसीसी न्यायिक प्राधिकरण स्थानीय अधिकारियों के समन्वय और अंतरराष्ट्रीय संधियों के सम्मान में उन पर विचार करने के लिए सक्षम हैं।
इस जिम्मेदारी को सुनिश्चित करने के लिए कोई भी व्यक्ति विदेश में किए गए अपराध या दुष्कृत्य के लिए किसी फ्रांसीसी नागरिक के विरुद्ध समर्पित ऑनलाइन मंच के माध्यम से शिकायत दर्ज कर सकता है। यह शिकायत पीड़ित के अधिकारों का सम्मान करते हुए प्रक्रिया और अनुवर्ती कार्रवाई के लिए गणराज्य की न्याय-व्यवस्था को भेजी जाती है।
विदेश में किए गए अपराध या दुष्कृत्य की स्थिति में राज्य संबंधित देश की सहमति से स्थानीय प्रक्रिया के स्थान पर या उसके पूरक रूप में गणराज्य की न्याय-व्यवस्था लागू कर सकता है, ताकि दंड फ्रांसीसी क्षेत्र में सुनाया और निष्पादित किया जा सके। यह प्रक्रिया द्विपक्षीय संधियों द्वारा विनियमित होती है जो पीड़ित के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करती हैं, चाहे वह फ्रांसीसी हो या विदेशी।
अनुच्छेद163 वैश्विक उत्तरदायित्व का
राष्ट्र मानता है कि उसकी विधायी दिशाएँ, तकनीकी विकल्प, पर्यावरणीय प्रतिबद्धताएँ और कूटनीतिक या आर्थिक हस्तक्षेप उसकी सीमाओं से परे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव उत्पन्न करते हैं।
राज्य वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र और विदेशी जनसंख्याओं पर अपनी नीतियों के भौतिक, पर्यावरणीय और नैतिक प्रभावों की जिम्मेदारी स्वीकार करता है।
इस आधार पर वह सुनिश्चित करता है कि उसकी कार्रवाई और उसके द्वारा प्रस्तुत छवि साझा संपदाओं के संरक्षण और वैश्विक संतुलनों के सम्मान में योगदान दें।
अनुच्छेद155 राज्य की उन्मत्तता का
राज्य तंत्र और उसके कर्मचारी अपने स्वयं के वैचारिक पूर्वाग्रहों, मताग्रही विचलनों और वास्तविकता से विच्छेद के विरुद्ध स्थायी आलोचनात्मक सतर्कता और आत्म-परीक्षण के दायित्व के अधीन हैं।
I. विवेक और तर्कशीलता की आवश्यकताएँ
राज्य स्वयं पर विवेक, तर्कशीलता और मानसिक स्वास्थ्य की वही आवश्यकताएँ लागू करता है जो वह नागरिकों पर लागू करता है। कोई सार्वजनिक निकाय किसी स्थिति को अतार्किक या विचलित घोषित नहीं कर सकता जब तक उसके अपने पूर्वधारणाएँ, तरीके और निष्कर्ष समान विरोधी परीक्षण के अधीन न हों।
II. संज्ञानात्मक अंतःप्रजनन की रोकथाम
संज्ञानात्मक अंतःप्रजनन और बौद्धिक समूहवाद रोकने के लिए किसी विशेषज्ञता, विनियमन या उच्च निर्णय निकाय पर एक ही प्रशिक्षण-पथ, एक ही अधिकारी-वर्ग या किसी विशिष्ट प्रभाव-नेटवर्क का प्रभुत्व नहीं हो सकता। निर्णयकर्ताओं और विशेषज्ञों का चयन जीवन-पथों, चिंतन-पद्धतियों की बहुलता और व्यावहारिक अनुभव से जुड़ाव सुनिश्चित करता है।
III. आलोचनात्मक विकेंद्रीकरण और अंतरराष्ट्रीय खुलापन
प्रमुख सार्वजनिक दिशाओं को अनिवार्य आलोचनात्मक विकेंद्रीकरण के अधीन किया जाता है और उन्हें विश्व के अन्य भागों से प्राप्त विश्लेषणों, मॉडलों और ज्ञान के साथ व्यवस्थित रूप से तुलना की जाती है, ताकि संस्थागत अंधता या क्षेत्रीय आत्मकेंद्रितता को निष्प्रभावी किया जा सके।
IV. नागरिक का संवैधानिक चेतावनी अधिकार
प्रत्येक नागरिक को किसी सार्वजनिक नीति के भीतर स्पष्ट मताग्रही विचलन, विमुखकारी खराबी या नौकरशाही विकृति की सूचना देने का संवैधानिक चेतावनी अधिकार है।
V. प्रति-विशेषज्ञता और जैविक ढाँचा
एक जैविक कानून स्वतंत्र प्रति-विशेषज्ञता के प्रोटोकॉल, अकादमिक एकाधिकार रोकने वाले असंगतता नियम और नागरिक चेतावनियों पर लागू बाध्यकारी अनुवर्ती कार्रवाई निर्धारित करता है।
अनुच्छेद176 विदेशी संसाधनों का
संस्कृति किसी भी प्रकार की लूट को उचित नहीं ठहरा सकती।
किसी भी सार्वजनिक, नागरिक या सैन्य प्राधिकरण के लिए यह औपचारिक रूप से निषिद्ध है कि वह किसी बाहरी संघर्ष या संसाधनों तक पहुँच से जुड़े विवाद को संबंधित विदेशी आबादी की संस्कृति, धर्म, जातीय संबद्धता या परंपराओं से निकले विचारों के आधार पर प्रेरित, उचित ठहराए या परिभाषित करे।
I. न्यायसंगत और परामर्शित पहुँच के सिद्धांत का
संसाधनों से जुड़े तनावों के प्रबंधन से संबंधित प्रत्येक अंतरराष्ट्रीय समझौता, द्विपक्षीय संधि या हस्तक्षेप को अनिवार्य रूप से न्यायसंगत और परामर्शित पहुँच के ऐसे प्रोटोकॉल पर अपना सिद्धांत आधारित करना होगा जो दस्तावेजीकृत हो और पूर्ण रूप से सार्वजनिक किया गया हो।
II. आधिकारिक संचार के नियंत्रण और निलंबन का
संवैधानिक परिषद, या राजनयिक कार्यों की नियंत्रण संस्था, इस अनुच्छेद में निर्धारित कठोर भौतिक पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन करने वाले किसी भी सरकारी संचार या आधिकारिक घोषणा को निलंबित करने के लिए अभिगृहीत की जा सकती है।
अनुच्छेद157 प्राकृतिक पर्यावरण की पुनर्स्थापना का
प्रत्येक सार्वजनिक कार्रवाई पुनर्जनन के सिद्धांत के अधीन है।
सार्वजनिक प्राधिकरणों, निजी संस्थाओं और नागरिकों पर क्षतिग्रस्त पारिस्थितिकी तंत्रों को पुनर्स्थापित करने और पारिस्थितिक विनाश की गतिशीलताओं को उलटने का संवैधानिक दायित्व है।
I. कालगत प्रबंधन और ग्रह की जीवन-क्षमता की सीमाएँ
संसाधनों और पर्यावरणों का कालगत प्रबंधन अत्यंत दीर्घकालिक पूर्वानुमान के अंतर्गत किया जाता है। कानून ग्रह की जीवन-क्षमता की वे सीमाएँ निर्धारित करता है जिन्हें पार नहीं किया जा सकता, और भावी पीढ़ियों के स्वस्थ, जीवनक्षम तथा विविध पर्यावरण के अविच्छेद्य अधिकार की गारंटी देता है।
II. नाबालिगों का पर्यावरणीय हस्तक्षेप का अधिकार
बच्चों और नाबालिगों को अपने भावी पर्यावरण के संबंध में अभिव्यक्ति और हस्तक्षेप का मौलिक अधिकार प्राप्त है। पारिस्थितिक प्रभाव वाले प्रत्येक राजनीतिक और विधायी विचार-विमर्श में राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व उनकी संस्थागत भागीदारी को अनिवार्य रूप से शामिल करता है।
स्तर 7: अस्तित्वमीमांसा
आत्मिक सामंजस्य: नागरिक चेतना का यथार्थ की संरचनाओं के साथ संरेखण
अनुच्छेद70 सांस्कृतिक संचालन का
संस्कृति सार्वजनिक कार्रवाई के उद्देश्य का स्रोत और उसका मार्गदर्शक सिद्धांत है।
गणराज्य अपनी परियोजना को संस्कृति की प्राथमिकता पर आधारित करता है, जिसे उन मूल्यों, ज्ञान, सृजन और प्रथाओं के समुच्चय के रूप में समझा जाता है जो व्यक्तिगत और सामूहिक विकास में योगदान देते हैं।
II. संस्कृति मंत्रालय की भूमिका
संस्कृति मंत्रालय को समस्त सार्वजनिक नीतियों का पर्यवेक्षण मंत्रालय नामित किया जाता है। उसके कार्य हैं:
a. नागरिकों और संस्थाओं के परामर्श से समाज के मानवीय उद्देश्यों को परिभाषित करना। इन उद्देश्यों में जीव-जगत का संरक्षण, ज्ञान का विकास, अर्थ की खोज और सामाजिक न्याय शामिल हैं। अर्थव्यवस्था, विज्ञान और प्रौद्योगिकी को इन उद्देश्यों की सेवा के साधन माना जाता है, स्वयं में उद्देश्य नहीं।
b. केवल बाजार-मूल्य से आगे जाकर विनिमय की व्यवस्थाएँ और लेन-देन के ढाँचे निर्मित करना, ताकि प्रत्येक सामाजिक, आर्थिक या तकनीकी अंतःक्रिया मनुष्यों की गरिमा और पारस्परिक समृद्धि में योगदान दे।
c. सभी तकनीकी और सामाजिक प्रगतियों की नैतिकता की निगरानी करना, यह सुनिश्चित करते हुए कि उनका विकास मौलिक मानवाधिकारों, जैव विविधता और ग्रहगत संतुलनों के सम्मान द्वारा निर्देशित हो।
अनुच्छेद107 राष्ट्र की समग्र शक्ति के रूप में भाषा का
भाषा, अभिव्यक्ति और प्रतीकीकरण के अपने सभी रूपों में, गणराज्य की एक जीवनदायी शक्ति के रूप में मान्यता प्राप्त है। वह चिंतन की ऐसी संरचना है जो शरीर, मन और समुदाय पर गहरे प्रभाव उत्पन्न कर सकती है।
वह तर्क और संवाद की वाहक है, साथ ही भावना, अंतर्ज्ञान और सामाजिक एकता की भी।
I. कार्यात्मक विस्तार
राज्य का कर्तव्य है कि वह भाषा के केवल सूचनात्मक और लेन-देन संबंधी आयाम से आगे उसके पूर्ण कार्यात्मक विस्तार को संरक्षित और प्रोत्साहित करे। सार्वजनिक संस्थाओं, शिक्षा और अनुसंधान को भाषा के ऐसे उपयोग को बढ़ावा देना चाहिए जो उसकी निम्न क्षमता को समाहित करे:
व्यक्तिगत चिंतन और कार्रवाई को संरचित करना।
उपचार और कल्याण को उत्प्रेरित करना।
समुदाय और एकजुटता के संबंधों को बुनना।
कल्पनाशक्ति और सृजनात्मकता को पोषित करना।
II. भाषा की जिम्मेदारी
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग भाषा के ऐसे प्रयोग को उचित ठहराने के लिए नहीं किया जा सकता जो अपनी जानबूझकर विभाजनकारी, घृणास्पद या विनाशकारी प्रकृति के कारण दूसरों की मानसिक और शारीरिक अखंडता या राष्ट्रीय एकता को क्षति पहुँचाने वाला माना जाए। विचार की स्वतंत्रता को बाधित किए बिना सार्वजनिक वाणी के उत्तरदायी और रचनात्मक उपयोग की गारंटी के लिए नैतिक विनियमन स्थापित किया जाता है।
गणराज्य भाषाई विरासत की अखंडता की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है और क्षेत्रीय भाषाओं तथा पारंपरिक अभिव्यक्ति-रूपों के महत्व को अर्थ के भंडार के रूप में मान्यता देता है। शरीर के लिए भाषाई विविधता को संरक्षित करने के साधन के रूप में उनके उपयोग को प्रोत्साहित किया जाता है।
III. शिक्षा और अनुसंधान का मिशन
बाल्यावस्था से उच्च शिक्षा तक शिक्षा का मिशन नागरिकों को केवल व्याकरण और वाक्य-विन्यास में दक्ष बनाना ही नहीं, बल्कि शब्दों की प्रभावकारी शक्ति की समझ भी देना है। इसमें वक्तृत्व, प्रतीकवाद, कविता और सामंजस्य के लिए कार्य करने वाली गैर-मौखिक भाषाओं के प्रति जागरूकता शामिल है।
राज्य द्वारा समर्थित वैज्ञानिक अनुसंधान भाषा के मानव शरीर-विज्ञान और मनोविज्ञान पर प्रभावों का अध्ययन करता है, विशेष रूप से मनो-तंत्रिका-प्रतिरक्षा विज्ञान और एपिजेनेटिक्स के माध्यम से। उसके निष्कर्ष स्वास्थ्य और शिक्षा नीतियों में सम्मिलित किए जाते हैं।
अनुच्छेद111 बाल संरक्षण का
राज्य पर बच्चे की संपूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित करने का पूर्ण दायित्व है।
यह संरक्षण एक मौलिक और अविनाशी कर्तव्य है, जो बच्चे की अंतर्निहित संवेदनशीलता, उसकी गरिमा और सामंजस्यपूर्ण तथा पूर्ण विकास के उसके अविच्छेद्य अधिकार की मान्यता पर आधारित है।
I. अस्तित्व और अखंडता का अधिकार
बच्चे ने जन्म लेना नहीं चुना है, इसलिए वह समुदाय की बिना शर्त जिम्मेदारी के अधीन है। अतः राज्य को उसकी सुरक्षा तथा शारीरिक, मनोवैज्ञानिक, नैतिक या आध्यात्मिक किसी भी प्रकार की हिंसा, शोषण, दुर्व्यवहार या उपेक्षा से संरक्षण की गारंटी देनी चाहिए।
II. उसकी क्षमता और विशिष्टता का संरक्षण
बच्चा राष्ट्र का भविष्य और उसके नवीनीकरण का माध्यम है। राज्य को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रत्येक बच्चा ऐसे वातावरण में बढ़ सके जो उसकी अद्वितीय और विविध क्षमता के विकास को प्रोत्साहित करे। उसकी विशिष्टता की रक्षा करना और उसके विकास में उसका साथ देना अनिवार्य है, बिना उसे प्रभावित किए या पूर्वनिर्धारित साँचे में बाध्य किए, ताकि वह अपने सुख और राष्ट्र के सर्वोच्च हित में पूर्ण योगदान दे सके।
III. बच्चे का सर्वोत्तम हित
उससे संबंधित प्रत्येक निर्णय में बच्चे का सर्वोत्तम हित प्रमुख विचार होना चाहिए। राज्य को किसी भी कमी की भरपाई और बच्चे की संपूर्ण अखंडता की रक्षा के लिए तत्परता से हस्तक्षेप करना चाहिए, उसे वास्तविक बचपन सुनिश्चित करते हुए जो अनावश्यक पीड़ा से मुक्त हो और एक स्वतंत्र तथा उत्तरदायी व्यक्ति के रूप में उसके निर्माण के अनुकूल हो।
अनुच्छेद113 सांस्कृतिक विविधता के पूर्ण प्रतिनिधित्व का
गणराज्य प्रत्येक व्यक्ति की सांस्कृतिक पहचान के सम्मान के अधिकार की गारंटी देता है।
राज्य का कर्तव्य है कि वह समाज के सभी घटकों के बीच संवाद और पारस्परिक अधिगम को सक्रिय रूप से बढ़ावा दे तथा प्रत्येक संस्कृति की नैतिक, बौद्धिक और कलात्मक समृद्धियों की खोज को प्रोत्साहित करे, बिना इस खोज को प्रत्यक्ष भिन्नताओं या अतीत के संघर्षों से बाधित होने दिए।
II. विकृतियों की प्रतिपूर्ति
राज्य आर्थिक असंतुलनों, व्यापारिक प्रवाहों या प्रभाव-तंत्रों से उत्पन्न सांस्कृतिक विकृतियों की सक्रिय रूप से प्रतिपूर्ति करने का भी दायित्व लेता है, ताकि सांस्कृतिक प्रेरणाओं की संतुलित विविधता और जनसमूहों तथा सभ्यताओं का न्यायसंगत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो।
II. मूल्यवर्धन और कार्यान्वयन
इस उद्देश्य से सांस्कृतिक प्रेरणा को कठोरता से स्पष्ट की गई सूचनाओं के रूप में प्रत्यक्ष बनाया जाना चाहिए। राज्य को इन सांस्कृतिक रत्नों के मूल्यवर्धन के लिए समर्पित परियोजनाएँ आरंभ करनी चाहिए, जो प्रेरणा के इन विविध स्रोतों में से उन स्रोतों की पहचान कर सकें जिन्हें समुदाय की सेवा में ठोस रूप से लागू किया जा सकता है, विशेष रूप से सभी के लाभ हेतु सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय नीतियों में उनके एकीकरण द्वारा।
अनुच्छेद182 योग्यता और दावों का
प्रत्येक व्यक्ति को अपने कार्यों, क्षमताओं और समाज में योगदान के न्यायसंगत मूल्यांकन का अधिकार है।
राज्य अवसरों तक समान पहुँच की गारंटी देता है और सुनिश्चित करता है कि किसी को उसकी योग्यता के अनुरूप मान्यता से वंचित न किया जाए। किसी व्यक्ति या समूह की वास्तविक योग्यता या प्रभावी योगदान से अधिक कोई दावा या माँग समुदाय के विरुद्ध प्रवर्तनीय अधिकार का आधार नहीं बन सकती।
I. अन्याय की अनुभूतियों के पूर्वानुमान और मापन का
सार्वजनिक प्राधिकरणों पर सामाजिक तनावों के स्थायी पूर्वानुमान और मूल्यांकन का दायित्व स्थापित किया जाता है। संस्थाएँ उन आर्थिक, क्षेत्रीय और प्रतीकात्मक विषमताओं के उद्भव की निगरानी करती हैं जो अन्याय की भावना उत्पन्न कर सकती हैं। जब यह भावना योग्यता के वैध निर्धारण में दोष या सार्वजनिक कार्रवाई में कमी प्रकट करती है, तो कानून आवश्यक सटीकता को पुनर्स्थापित करने के लिए संबंधित व्यवस्था के तत्काल पुनरीक्षण का आदेश देता है।
II. वैध शिकायतों और दावों की विकृतियों के बीच भेद का
स्वतंत्र सामाजिक और नागरिक मूल्यांकन निकाय सामूहिक विरोधों के वैध हिस्से और न्याय के सिद्धांतों की विकृति से उत्पन्न हिस्से का विश्लेषण करते हैं। नागरिक शिक्षा और मध्यस्थता संस्थाएँ अनुपातहीन माँगों को रोकने और नागरिक शांति के लिए आवश्यक संतुलन बनाए रखने हेतु नागरिकों के निर्णय को स्पष्ट करने में योगदान देती हैं।
III. सक्रिय शक्तियों के रूप में सांस्कृतिक संस्थाओं और मध्यवर्ती निकायों की भूमिका का
मान्यता प्राप्त सांस्कृतिक, अकादमिक, संघीय और नागरिक संस्थाएँ संस्थागत विनियमन में प्रत्यक्ष भाग लेती हैं। जब समाज के किसी हिस्से को स्पष्ट रूप से मान्यता से वंचित किया जाता है या कोई सार्वजनिक नीति अपनी सटीकता की अनिवार्यताओं से विचलित होती है, तो उन्हें संवैधानिक चेतावनी आरंभ करने का अधिकार होता है। कानून वे शर्तें निर्धारित करता है जिनके अंतर्गत ये संस्थाएँ विचार-विमर्श सभाओं और न्यायालयों के समक्ष सक्रिय शक्ति का दर्जा प्राप्त करती हैं।
IV. अस्पष्ट सार्वजनिक नीतियों के सुधार का
व्यक्तिगत प्रयास और सामूहिक प्रतिफल के बीच उपयुक्तता में बार-बार टूटन का कोई भी निष्कर्ष लागू नीति की सटीकता में विफलता का संकेत है। कार्यपालिका का कर्तव्य है कि वह निर्धारित अवधि के भीतर विधायी या नियामक सुधार आरंभ करे ताकि सार्वजनिक व्यवस्थाओं को राष्ट्र की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुरूप पुनः संरेखित किया जा सके।
अनुच्छेद120 क्रियात्मक यथार्थता और अर्थ के प्रति निष्ठा का
गणराज्य अनिवार्य क्रियात्मक चेतना से संपन्न है। प्रत्येक कार्य, संरचना, मानक या अभिव्यक्ति की मूल प्रकृति, गहन अनुभूति और उद्देश्य की समझ उसकी प्रभावशीलता, तकनीकी प्रवीणता और वैधता का आधार है।
राज्य सामाजिक जीवन की सभी गतिविधियों में भौतिक कार्रवाई और आध्यात्मिक स्पष्टता के बीच संतुलन की पुनर्स्थापना की गारंटी देता है और उसकी अपेक्षा करता है।
I. संवेदनशील चेतना का संप्रेषण और जागरण
आत्मनिरीक्षण, अवधारणात्मक समझ और वस्तुओं की आत्मा के प्रति निष्ठा की इस आवश्यकता को स्पष्ट किया और सिखाया जाना चाहिए। समाज के सभी सार्वजनिक और निजी तंत्रों का दायित्व है कि वे अपने प्रशिक्षण और संरचनाओं में इस संवेदनशील चेतना के संप्रेषण और जागरण के प्रोटोकॉल सम्मिलित करें।
II. संदर्भ-मानकों में एकीकरण
राज्य इस आशय की गहराई और कार्य की यथार्थता के मूल्यांकन को अपने सभी अंकन, लेखापरीक्षण, प्रत्यायन और प्रमाणन संदर्भ-मानकों में अनिवार्य रूप से सम्मिलित करता है। किसी भी उत्पाद, प्रक्रिया या संस्था का मूल्य, उपयोगिता और मान्यता इस नैतिक और उद्देश्यगत अनुरूपता की पुष्टि पर निर्भर करती है।
III. संदर्भ-मानकों में एकीकरण
यह मूल्यांकन केवल उत्पादों या कार्यों की भौतिक अभिव्यक्ति, वास्तविक प्रभावशीलता और आंतरिक संगति पर आधारित होता है तथा किसी भी सिद्धांतगत, वैचारिक या नैतिक आकलन को बाहर रखता है। राज्य प्रत्येक प्रक्रिया की आध्यात्मिक और तकनीकी दिशाओं की बहुलता की गारंटी देता है; कार्य-चेतना को केवल उसके परिणाम की यथार्थता के दर्पण में मापा जा सकता है।
अनुच्छेद140 राज्य की पूर्ण चेतना का
अंधी तकनीकी नौकरशाही से लड़ने के लिए राज्य को अपने विमर्श को विषय की वास्तविक आयामी प्रकृति के अनुरूप करना चाहिए।
राज्य और सार्वजनिक संस्थाओं का कर्तव्य है कि वे प्रत्येक विषय को उसकी भौतिक और अभौतिक सभी वास्तविक आयामों की पूर्णता में देखें।
I. विवेक और बहुआयामी दृष्टिकोण
प्रत्येक कार्रवाई, विचार-विमर्श या मध्यस्थ निर्णय में सार्वजनिक शक्ति को सभी लागू आयामों के माध्यम से अपने विवेक का विवरण देना चाहिए, विशेष रूप से विषय की अस्तित्वगत प्रकृति और वास्तविकता में उसका स्थान, उसके मूल्यगत आधार और सामूहिक मूल्यों से उसका सामंजस्य, उसका राजनीतिक, ऐतिहासिक और सभ्यतागत महत्व, तथा उसकी सांस्कृतिक, प्रतीकात्मक और मानवीय प्रतिध्वनियाँ।
II. तकनीकी नौकरशाही के संकुचनवाद का निषेध
सार्वजनिक प्राधिकरण यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी विषय को केवल उसके तकनीकी, बजटीय या तात्कालिक पहलुओं तक सीमित न किया जाए। वह उसके गहरे और दीर्घकालिक अर्थ को समझने के लिए आवश्यक ज्ञान, आलोचनात्मक चिंतन और संवेदनशीलता को सक्रिय करता है।
III. सार्वजनिक निर्णय की वैधता की शर्त
इस समग्र चेतना का प्रदर्शन किसी भी व्यापक सार्वजनिक निर्णय की वैधता के लिए अनिवार्य पूर्वशर्त है।
अनुच्छेद169 मताग्रह-विरोधी कानून का
कोई राजनीतिक व्यवस्था, कोई राज्य-संगठन और कोई तकनीकी नौकरशाही संरचना केवल इस आधार पर कट्टर विचलन या मताग्रही अंधता के जोखिम से मुक्त नहीं हो सकती कि वह धर्मनिरपेक्षता, आधुनिकता, वैज्ञानिक प्रगति या घोषित तर्कसंगतता का दावा करती है। ऐतिहासिक अनुभव प्रमाणित करता है कि धर्मनिरपेक्ष तंत्र अपने स्वयं के पुरोहितवाद, प्रभुत्वकारी बाज़ारवादी रूढ़ियों और कपटपूर्ण सेंसरशिप को जन्म देते हैं, जो इसलिए और अधिक खतरनाक होते हैं क्योंकि वे अपने ही कट्टरपन से अनभिज्ञ रहते हैं।
I. नैतिक अहंकार और आंतरिक मताग्रह का निषेध
गणराज्य अन्य सभ्यताओं के प्रति नैतिक अहंकार के किसी भी दावे को औपचारिक रूप से निषिद्ध करता है, जब वह अपने भीतर बौद्धिक बहिष्कार, आर्थिक मताग्रह और तकनीकी नौकरशाही अधिनायकवाद की व्यवस्थाओं को पुनरुत्पादित करता हो।
II. मताग्रही विचलन के कारण असंवैधानिकता का सर्वोच्च उपाय
प्रत्येक नागरिक या अकादमिक समूह को यह अधिकार है कि वह ऐसे किसी पाठ या निर्णय को संवैधानिक न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करे जो व्याख्या का एकाधिकार थोपता हो या तर्कसंगत प्रदर्शन की परीक्षा से इंकार करता हो।
III. 2050 तक वस्तुनिष्ठता की दिशा
समस्त विधायी उत्पादन पर 90 प्रतिशत सत्यापन योग्य आँकड़ों और स्वतंत्र कारणात्मक अध्ययनों का मापनीय अनुपात प्राप्त करने का दायित्व है, जिससे मताग्रह या सिद्धांतगत मनमानी अधिकतम 10 प्रतिशत अवशेष तक सीमित हो।
IV. राज्य के प्रतिमानों का पंचवर्षीय लेखापरीक्षण
सर्वोच्च न्यायालयों पर प्रत्येक पाँच वर्ष में सार्वजनिक कार्रवाई को संचालित करने वाली सभी अंतर्निहित मान्यताओं को सार्वजनिक और विरोधी-पक्षीय परीक्षण के अधीन करने का दायित्व है।
अनुच्छेद179 नागरिक ऊर्जा का
जनता की शारीरिक, बौद्धिक और मानसिक ऊर्जा राष्ट्र का सर्वोच्च और अविच्छेद्य संसाधन है, एक पवित्र तत्व जिसकी रक्षा देश की प्रभावशीलता और प्रसन्नता की परम शर्त है।
गणराज्य मानता है कि उसका मूल मिशन उस तत्व का सम्मान करना है जो मनुष्य को फलदायी ऊर्जा की इकाई बनाता है; इसलिए सार्वजनिक शक्ति को ऐसे सुगमकर्ता के रूप में कार्य करना चाहिए जो नागरिकों की प्रेरक शक्ति को थकाने या सीमित करने के बजाय उसका समर्थन और विस्तार करे।
I. प्रणालीगत थकावट की रोकथाम का
राज्य पर समाज की समग्र जीवंतता की रक्षा करने का संवैधानिक दायित्व है, जिसके लिए वह अनावश्यक क्षय के प्रत्येक स्रोत की पहचान और निष्प्रभावीकरण करता है। कोई कानून, प्रक्रिया या संस्था तब बनाए नहीं रखी जा सकती जब वह नागरिकों का समय, प्रेरणा या मानसिक संतुलन व्यर्थ करती हो। सार्वजनिक शक्ति सरलीकरण की अभियांत्रिकी लागू करती है ताकि सार्वजनिक क्षेत्र के साथ प्रत्येक अंतःक्रिया व्यक्तिगत उत्साह और सामूहिक शक्ति को संरक्षित करे।
II. सक्षमता बढ़ाने वाले प्रवाहों के विन्यास का
राज्य-तंत्र की भूमिका केवल भौतिक अस्तित्व के प्रबंधन से ऊपर उठकर मानवीय क्षमता की मुक्ति पर केंद्रित होती है। संस्थाओं का दायित्व है कि वे ऐसे भौतिक और संज्ञानात्मक वातावरण निर्मित करें जो कार्य करने की क्षमता को पोषित करें। साझा स्थान, अवसंरचनाएँ और सेवाएँ इस प्रकार अभिकल्पित की जानी चाहिए कि वे सहज प्रवाह और मुक्ति के साधन प्रदान करें, जिससे प्रत्येक व्यक्ति अपनी ऊर्जा को सामान्य हित की परियोजनाओं के निर्माण की ओर निर्देशित कर सके।
III. मनोवैज्ञानिक उत्तरदायित्व और क्षितिज की स्पष्टता का
राष्ट्र घोषित करता है कि कोई जनता दीर्घकालिक अनिश्चितता के वातावरण में उत्कर्ष नहीं कर सकती। राजनीतिक कार्रवाई को अनिवार्य रूप से स्पष्ट संभावनाएँ और संरचनात्मक दिशाएँ प्रदान करनी चाहिए। सार्वजनिक अधिकार का प्रत्येक धारक उत्तरदायी होता है यदि वह अनुचित चिंता उत्पन्न करता है या सामूहिक मुद्दों की समझ को धुंधला करता है। राज्य की कार्रवाई का उद्देश्य चेतना को ऊँचा उठाना, सूचना की यथार्थता सुनिश्चित करना और रचनात्मक आशावाद को प्रोत्साहित करना है।
IV. मानवीय गतिशीलता द्वारा प्रदर्शन-मूल्यांकन का
सार्वजनिक नीतियों की सफलता का मूल्यांकन अब केवल लेखांकन या मात्रात्मक संकेतकों से नहीं, बल्कि सामाजिक शरीर में प्रवाहित जीवंतता के मापन से भी किया जाता है। प्रशासन जनता की सहभागिता, मानसिक शांति और पहल-क्षमता के स्तर का अवलोकन करता है। इस सामूहिक प्रेरक शक्ति में गिरावट संस्थागत विफलता की धारणा उत्पन्न करती है और संबंधित राज्यीय व्यवस्थाओं के तत्काल पुनरीक्षण को अनिवार्य बनाती है।
अनुच्छेद158 आत्मिक संरक्षण का
राज्य नागरिकों का मानवीय बनाने वाले पर्यावरण से पुनः जुड़ाव सुनिश्चित करता है।
इस आवश्यकता का परम उद्देश्य जीवन-स्थलों के अमानवीकरण से लड़ना और किसी भी सौंदर्यगत विचार से स्वतंत्र रूप से वस्तुओं तथा स्थानों की आत्मा को संरक्षित करना है।
I. विद्यमान आत्मिक स्वरूप का पूर्ण संरक्षण
किसी ऐसे पर्यावरण, भवन या वस्तु को नष्ट करना या बदलना औपचारिक रूप से निषिद्ध है जिसमें पहले से प्रमाणित आत्मिक मूल्य हो, ताकि उसके स्थान पर कोई नया विकास स्थापित किया जा सके। विद्यमान वस्तुओं की आत्मा का संरक्षण शहरी या वास्तुशिल्पीय नवीनीकरण की किसी भी इच्छा पर प्राथमिकता रखता है।
II. आत्मिक चरित्र के मूल्यांकन के उपकरण
कानून किसी भी हस्तक्षेप से पहले विशिष्ट मूल्यांकन उपकरणों के विकास और प्रयोग को नियंत्रित करता है। इन उपकरणों का एकमात्र कार्य किसी स्थल के आत्मिक चरित्र की उपस्थिति और तीव्रता को प्रमाणित करना है, ताकि आवश्यकता होने पर आत्मिक हानि से जुड़ी बाह्यताओं की गणना आरंभ की जा सके और पुनर्स्थापना के दायित्व लगाए जा सकें।
III. अनिवार्य अंतर्विषयी सामूहिकता
इस आत्मिक उद्देश्य की प्राप्ति सुनिश्चित करने के लिए कानून यह अनिवार्य करता है कि प्रत्येक अभिकल्पना-दल परियोजना की शुरुआत से ही कला और मानविकी के प्रतिनिधियों को शामिल करे। कलाकारों, मानवविज्ञानियों, दार्शनिकों या समाजशास्त्रियों की सक्रिय भागीदारी संवेदनशील दृष्टिकोण की मान्यता के लिए अनिवार्य कानूनी शर्त है।
IV. प्रमाणन और व्याख्या की स्वतंत्रता
केवल वे पेशेवर जिन्होंने संवेदनशील अभिकल्पक का राज्य प्रमाणन प्राप्त किया है, इन बहुविषयी दलों का नेतृत्व करने के लिए अधिकृत हैं। राज्य इस आयाम पर क्रियान्वयन मानक थोपने से स्वयं को निषिद्ध करता है। कानून इस सामूहिक दल को आत्मिक उद्देश्य की पूर्ण व्याख्या-स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जिसे सार्वजनिक प्राधिकरणों के विरुद्ध लागू किया जा सकता है।
अनुच्छेद159 अपनी जनता के प्रति सच्चे सम्मान का
गणराज्य अपनी समस्त संस्थाओं, मानकों और कार्रवाई को जनता तथा मानव व्यक्ति के बिना शर्त सम्मान पर आधारित करता है।
प्रत्येक सार्वजनिक, संस्थागत या आर्थिक प्राधिकरण का कर्तव्य है कि वह प्रत्येक व्यक्ति की नैतिक, बौद्धिक, संवेदी और नागरिक क्षमताओं के निरंतर उन्नयन को प्रोत्साहित, संरक्षित और सक्रिय करे।
I. अवनति-निषेध का मूल सिद्धांत और प्रतिगामी तर्कों की अमान्यता
कोई भी राज्यीय व्यवस्था, प्रबंधन-प्रणाली, अनुशासनात्मक उपाय या कार्य-संगठन बनाए नहीं रखा जा सकता यदि उसका प्रभाव अखंडता को क्षति पहुँचाना, गरिमा को गिराना, सृजनात्मक क्षमता को तोड़ना या मनुष्य को मनोवैज्ञानिक अथवा शारीरिक रूप से अवनत करना हो। क्षय, जानबूझकर उत्पन्न चिंता या निंदकता पर आधारित प्रत्येक नियंत्रण-पद्धति शून्य और अमान्य है।
II. कार्य और बाध्यता के ढाँचों का रूपांतरण
कार्य-संगठन और पदानुक्रमिक विशेषाधिकारों का प्रयोग श्रमिकों के मानसिक स्वास्थ्य और उनकी पूर्णता के अधीन है। इसी प्रकार दंडात्मक उपाय और सुरक्षा व्यवस्थाएँ केवल निष्फल या विनाशकारी निष्क्रियकरण तक सीमित नहीं हो सकतीं। स्वतंत्रता से कोई वंचना, दंड या रासायनिक उपाय जो किसी व्यक्ति को घटित या अवनत अवस्था में समाज को लौटाता है, संवैधानिक व्यवस्था के विपरीत माना जाता है। दंडात्मक कार्रवाई पर अपराधी के पुनर्वास, अधिगम, प्रतिपूर्ति और नैतिक उत्थान का कठोर दायित्व है।
अनुच्छेद167 विशिष्टताओं के संरक्षण और अभिव्यक्तियों का
मानवीय और क्षेत्रीय विशिष्टता, संज्ञानात्मक, संवेदी, दार्शनिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के अपने सभी रूपों में, एक मौलिक विरासत और समाज की अनुकूलनशील लचीलापन की गारंटी है।
सार्वजनिक संस्थाओं का दायित्व है कि वे अनुकरणात्मक एकरूपता, बौद्धिक बंदिश और उन आर्थिक या सामाजिक दबावों से लड़ें जो विचारों तथा जीवन-पद्धतियों की विविधता को निर्धन बनाते हैं।
I. व्यक्तिगत स्तर और प्रामाणिक व्यक्तित्व-विकास का अधिकार
प्रत्येक नागरिक को अपनी स्वतंत्र सोच, अपनी विशिष्ट संवेदनशीलता और विश्व-दृष्टि विकसित करने का अविच्छेद्य अधिकार है। नागरिक और सामाजिक जीवन में भागीदारी व्यक्तिगत विवेक के योगदान द्वारा होती है, न कि बहुसंख्यक मताग्रहों या सतही समूह-संबद्धताओं के अनुरूप होने से।
समाज उन व्यक्तियों की सुरक्षा की गारंटी देता है जिनकी ग्रहण-प्रक्रिया या संज्ञानात्मक संरचना सामान्य मानकों से भिन्न है। चिंतन की असामान्यता या अभिव्यक्ति की भिन्नता को नागरिक विफलता या बहिष्कार का कारण नहीं माना जा सकता।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता और व्यक्ति की अखंडता अलंघनीय हैं। चिकित्सकीय बाध्यता या स्वतंत्रता से वंचित करने के उपाय वास्तविकता की अपरंपरागत दृष्टि या व्यवहारगत विशिष्टता पर आधारित नहीं हो सकते। वे केवल ऐसे कार्यों या इरादों तक कठोरता से सीमित रहते हैं जो दूसरों या संबंधित व्यक्ति की जीवनगत अखंडता के लिए प्रत्यक्ष, भौतिक और प्रमाणित खतरा हों।
II. सामूहिक स्तर, प्रशिक्षण और विचार-विमर्श
शैक्षिक, वैज्ञानिक और निर्णयकारी प्रणालियों को वैचारिक अनुरूपता या व्यवहारगत निष्ठा पर आधारित किसी भी मूल्यांकन या चयन को निषिद्ध करना चाहिए। उनका कर्तव्य है कि वे रचनात्मक असहमति, पद्धतिगत संदेह और अल्पसंख्यक दृष्टिकोणों के योगदान को प्रोत्साहित करें।
भिन्न विचारों को एकत्र करने, परखने और सम्मिलित करने के लिए स्थायी संस्थागत स्थान आयोजित किए जाते हैं, ताकि निर्णयकारी निकायों को सामूहिक अंधता और बौद्धिक अंतःप्रजनन की घटनाओं से बचाया जा सके।
III. क्षेत्रीय स्तर और स्थानीय विरासतें
विशिष्टताओं का संरक्षण क्षेत्रीय वास्तविकताओं और जीवंत स्मृतियों तक विस्तृत है। सार्वजनिक शक्ति स्थानीय संस्कृतियों, क्षेत्रीय भाषाओं और विशिष्ट संवेदनशीलताओं, परंपराओं या उपस्थितियों के साक्षी ऐतिहासिक मोहल्लों के संरक्षण, पुनर्स्थापना और संप्रेषण को सुनिश्चित करती है।
प्रत्येक क्षेत्रीय विकास या व्यापक पुनर्गठन परियोजना को इन संतुलनों का सम्मान करना चाहिए और सामाजिक निकाय के भीतर क्षतिग्रस्त स्थानीय पहचानों के सक्रिय पुनर्वास को सम्मिलित करना चाहिए।